Home » इंडिया » Govt at war with critical thinking, treats criticism as anti-national:
 

आरएसएस को भारत और विश्व का इतिहास नहीं मालूम: प्रोफेसर निवेदिता मेनन

प्रणेता झा | Updated on: 22 February 2017, 8:11 IST

जोधपुर की जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की सहायक प्रोफेसर राजश्री राणावत को पिछले हफ्ते 16 फरवरी को यूनिवर्सिटी ने बर्खास्त कर दिया गया. उनका कसूर महज इतना था कि उन्होंने जेएनयू की प्रोफेसर निवेदिता मेनन को व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया था.

इस पर जेएनयू में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज की प्रोफेसर मेनन ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि इन दिनों टीचर्स के खिलाफ जो अनुशासनात्मक कार्रवाइयां चल रही हैं, कुल मिलाकर मोदी सरकार का ‘अकादमिक आजादी, आलोचनात्मक चिंतन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ पर हमला है. मेनन ने कहा, ‘टीचर्स को वार्ता, सम्मेलन और नाटक जैसी स्तरीय अकादमिक गतिविधियां आयोजित करने के लिए अपराधी ठहराया जा रहा है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘इस बीच सरकार स्टूडेंट्स की उच्च शिक्षा में रोड़ा बन रही है. उनके फंड्स और सीटों में कटौती कर रही है, जैसा कि एमफिल/पीएचडी से संबंधित यूजीसी की पिछले साल 5 मई को जारी सूचना में कहा गया है.’

मेनन ने कहा, 'सरकार समाज विज्ञान पर खासतौर से निशाना साध रही है, क्योंकि इसमें सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर आलोचनात्मक चिंतन को प्रोत्साहित किया जाता है. सरकार आलोचनात्मक चिंतन पर रोक लगाने की कोशिश कर रही है. सरकार या आरएसएस की आलोचना करने पर तुरंत ‘राष्ट्र-विरोधी’ होने का आरोप लगा दिया जाता है.’

प्रो. मेनन पर कश्मीर के अलावा भारत का नक्शा उल्टा दिखाने का आरोप लगाया गया है. पिछले साल कश्मीर के बारे में उनके विचारों को ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहा गया था. मेनन 1 और 2 फरवरी को दो दिवसीय सम्मेलन में ‘हिस्ट्री रिकंस्ट्रूड थ्रू लिटरेचर: नेशन, आइडेंटिटी, कल्चर’ थीम पर व्याख्यान दे रही थीं. एक आलेख में मेनन ने इशारा किया था कि सारी मुख़ालिफत जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर एनके चतुर्वेदी के कहने पर की जा रही है.

नक्शा उलटा कैसे हो सकता है

उन्होंने बताया कि वह नक्शा ‘राइट-साइड-अप ’ (सीधी दिशा में ऊपर) था, जो हिमाल साउथ एशियन मैगजीन में प्रकाशित हुआ था. ग्लोबल साउथ को ऊपर और ग्लोबल नॉर्थ को नीचे दिखाते हुए मेनन कोई राजनीतिक पहलू बताना चाह रही थीं. मेनन ने कहा, ‘ दुनिया का नक्शा किसी चीज को समतल, दो-आयामी सतह की स्केल पर रिप्रजेंट करने का तरीका है. नक्शा प्रोजेक्ट करने की कई तकनीकें हैं, और सभी प्रोजेक्शन आनुपातिक नहीं हैं. किसी नक्शे को कोई भला कैसे ‘अपसाइड डाउन’ (उल्टा) बता सकता है, जब पृथ्वी गोल है?’

नक्शे के प्रोजेक्शन के इतिहास के बारे में बताते हुए वे कहती हैं, ‘एक सबसे आम प्रोजेक्शन मर्केटर प्रोजेक्शन है, जिसमें देशांतर और अक्षांशीय दूरियां आनुपातिक हैं, पर देशों की साइज संतुलित नहीं है. फिर 1960 के दशक में आर्नो पीटर के प्रोजेक्शन में देशों को स्केल पर रखा गया है, पर देशांतर और अक्षांशीय संबंधी विकृतियां रह गईं.’ यह विवादास्पद था क्योंकि इसने बताया कि कितने विशाल उपनिवेश हैं और कितनी छोटी बस्तियां.’

अज्ञानी है आरएसएस

प्रो. मेनन ने कहा कि इसे ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताना आरएसएस की अज्ञानता है. ‘आरएसस को विश्व-इतिहास की जानकारी नहीं है, भारत की भी नहीं, जबकि वे राष्ट्रवादी और देशभक्त होने का दावा करते हैं.’ जहां तक कश्मीर का सवाल है, उन्होंने अपने ब्लॉग काफिला में स्पष्ट किया था कि मेनन ने यह बयान नहीं दिया था कि ‘भारत कश्मीर पर गैरकानूनी कब्जा कर रहा है,’ जैसाकि स्थानीय समाचार पत्रों की हैडलाइंस का दावा था.

राणावत ने उन सेवानिवृत प्रोफेसर को मेनन का परिचय देते हुए महज मेनन के ‘एक साल पहले’ के बयान का हवाला दिया था. उन्होंने कहा, ‘मैंने स्टूडेंट्स से महज इतना कहा था कि वे कश्मीर के संघर्ष के इतिहास और संदर्भ को विस्तार से पढक़र खुद जानें.’

राणावत पर कार्रवाई असंवैधानिक

‘लोग राष्ट्र से पहले होते हैं, जिसकी वजह से राष्ट्र से किस तरह जुडऩा है, के सभी प्रश्न तर्कसंगत होते हैं.’ जिन राणावत की बर्खास्तगी की जांच, समिति में लंबित पड़ी है, उनके लिए मेनन ने कहा, ‘राणावत असाधारण रूप से समर्पित युवा टीचर हैं. सम्मेलन काफी सफल रहा.'

राजश्री ने दक्षिण और वामपंथी विचारधारा के बौद्धिक और राजनीतिक रूप से प्रखर लोगों को आमंत्रित किया था. स्टूडेंट्स ने भी उस सेममिनार में कुछ अच्छे पेपर्स पढ़े. उन्हें कुछ देना ही था, तो इस आयोजन के लिए बधाई देनी चाहिए थी. उनके खिलाफ कार्रवाई अपुष्ट और असंवैधानिक है. टीचर समुदाय पूरी तरह उनके साथ है और हम उनके लिए और समर्थन जुटा रहे हैं.’

फेडरेशन ऑफ सेंट्रल यूनिवर्सिटीज टीचर्स एसोसिएशन और द पीपल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज ने राणावत का पहले ही सार्वजनिक रूप से समर्थन किया है. मेनन, राणावत और प्रोफेसर वीनू जॉर्ज और विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज की गई है. राणावत को 16 फरवरी को बर्खास्त करने के साथ ही उन्हें और जार्ज को कारण बताओ नेटिस दिया गया है.

‘शिक्षकों को अपनी नौकरी बजाने की सजा मिल रही है. जब हम देखते हैं कि हमारा रोजमर्रा का काम हेडलाइंस की सुर्खियों में है, तो हमें मालूम है जरूर कुछ गड़बड़ है. स्टूडेंट्स से बात करने वाला टीचर हेडलाइन नहीं होना चाहिए. यही तो टीचर करता है: हम पढ़ाते हैं.’

लगातार कार्रवाई

जैसा कि राणावत के मामले में हुआ, कई विश्वविद्यालयों में प्रबुद्ध लोगों के खिलाफ विरोध को आरएसएस की अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद भड़का रही है. उदाहरण के तौर पर पिछले सितंबर में हीरयाणा के केंद्रीय विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग के दो शिक्षकों को विश्वविद्यालय ने प्रताड़ित किया था.

मरहूम महाश्वेता देवी की ‘द्रोपदी’ का मंचन करने के लिए पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी. नाटक में सेना को एक जनजातीय महिला से रेप करते बताया गया था. पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के भड़के बिना ही विश्वविद्यालय टीचर्स पर कठोर कार्रवाई कर रहा था.

जनवरी में जेएनयू प्रशासन ने मेनन सहित 5 प्रोफेसरों को चेतावनी चिट्ठी भेजी. उन पर आरोप था कि उन्होंने प्रशासनिक ब्लॉक के सामने एक सार्वजनिक सभा में स्टूडेंट्स को संबोधित किया, जबकि यहां विरोध जाहिर करना प्रतिबंधित है. हैदराबाद विश्वविद्यालय में भी फैकल्टी के सदस्यों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गया है. वे मीडिया से प्रशासन की आलोचना कर रहे थे.

First published: 22 February 2017, 8:11 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी