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15 दिन से भी कम रह गए हैं, सरकार नए सेना प्रमुख का नाम अभी भी क्यों घोषित नहीं कर रही है?

कैच ब्यूरो | Updated on: 11 February 2017, 6:42 IST
(विपिन कुमार/हिन्दुस्तान टाईम्स/गेटी)

केन्द्र सरकार जनरल दलबीर सिंह सुहाग के स्थान पर नए चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ की नियुक्ति में देरी क्यों कर रही है? डिफेंस के गलियारों में यह अटकलें जोरों पर हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वतंत्र भारत के पहले चीफ ऑफ डिफेन्स स्टाफ (सीडीएस) की नियुक्ति कर सकते हैं ताकि वह देश के पहले सीडीएस बनाने का इतिहास रच सकें. 

हालांकि, विश्वस्त सूत्रों के अनुसार यह फैसला अभी सामने नहीं रखा जा सकता है क्योंकि अभी तक नए पद के उत्तरदायित्व और भूमिका को पारिभाषित ही नहीं किया गया है और साथ ही यह भी कि तीनों सेनाओं के प्रमुखों की शक्तियां प्रभावित हो सकती हैं. सीडीएस की नियुक्ति का लक्ष्य योजना बनाने, परिचालन करने और सेना के आधुनिकीकरण के लिए शीर्ष क्रम से जुड़ा हुआ है. 

सरकार को इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर फैसला लेने से पहले कई जटिलताओं को सुलझाने की जरूरत होगी. हालांकि, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक ऐसे पीएम के रूप में देखा जाता है जो सुधारों की बात करते हैं, वह रक्षा प्रतिष्ठानों में सुधार के लिए आगे आए हैं और उन्होंने कई नए बदलाव भी किए हैं.  

सीडीएस का नया पद गठित करने को लेकर कवायद चल रही है और कहा जा रहा है कि तीनों सेनाओं के प्रमुखों से भी इस प्रस्ताव पर चर्चा की जानी है क्योंकि सबके अपने विशेषाधिकार हैं और कोई भी अपने विशेषाधिकारों को कम नहीं होने देना चाहेगा.

हालांकि, इस बात के प्रबल आसार हैं कि सीडीएस की नियुक्ति का फैसला लिया जा सकता है लेकिन सरकार को एक अंतरिम नए सेना प्रमुख की नियुक्ति तो करनी ही होगी.

पीएमओ में फाइल

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में बताया कि सीडीएस की नियुक्ति एक राजनीतिक फैसला होगा और इस बाबत फैसला शेकेटकर कमेटी की रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद ही लिया जाएगा. शेकेटकर कमेटी ने रक्षा व्यय और और रक्षा तैयारियों को लेकर अक्टूबर में रिपोर्ट सौंपी थी. 

पर्रिकर पहले ही कह चुके हैं कि नए सेना प्रमुख की नियुक्ति को लेकर फाइल पीएमओ में है और महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के लिए बनी कैबिनेट कमेटी नए सेना प्रमुख के नाम पर फैसला लेगी.

केन्द्र सरकार भी कथित रूप से यह कह चुकी है कि इस मुद्दे पर निर्णय को मुल्तवी रखा जा सकता है क्योंकि वह नहीं चाहती कि बहुत पहले से नाम की घोषणा से अलग से सत्ता केन्द्र बन जाएं. हालांकि, सरकार के इस कथन से जमीं बर्फ को पिघलाया नहीं जा सका है. 

अब तक यह परम्परा रही है कि नए सेना प्रमुख के उत्तराधिकारी के नाम की घोषणा वर्तमान प्रमुख के सेवानिवृत्त होने से लगभग दो माह पहले कर दी जाती है ताकि नया प्रमुख विधिवत पद संभालने से पहले कामकाज को ठीक से समझ ले. इस समय सेना के कामकाज के सामान्य तरीके से संचालन के लिए उप-प्रमुख को सेना-प्रमुख के रूप में काम करने की अनुमति दी जा सकती है. इससे अलग से पावर सेन्टर्स भी नहीं बनेंगे.

वरिष्ठता का सवाल

सेना प्रमुख पद पर अभी तक सेना प्रमुखों की नियुक्तियां उनकी वरिष्ठता के आधार पर की गईं हैं. इसकी एक स्थापित प्रक्रिया है. इस तर्क से देखा जाए तो ले. जनरल प्रवीण बख्शी इस पद के लिए निश्चित रूप से सरकार की पसंद हो सकते हैं. ले. जन. बख्शी इस समय सेना की पूर्वी कमांड के प्रमुख हैं. उनके जिम्मे अरुणाचल प्रदेश से लेकर कोलकाता तक का इलाका आता है. बख्शी की गिनती इस वक्त सेना के सबसे काबिल और रैंक में सबसे वरिष्ठ अधिकारी के रूप में है.

हालांकि, दक्षिणी कमान के ले. जन. बिपिन रावत (जो बख्शी से जूनियर हैं) को सेना प्रमुख बनाए जाने की चर्चाएं भी हैं. ले. जन. रावत सेना उप प्रमुख हैं. इस समय इस तरह की अफवाहों को बल मिला है कि वरिष्ठता को नजरअंदाज किया जा सकता है. हालांकि, इस बात की भी अटकलें हैं कि सेना उपप्रमुख ले. जन. बिपिन रावत को सेना प्रमुख और बख्शी को सीडीएस बनाया जा सकता है. 

लेफ्टिनेंट जनरल प्रवीण बख्शी आर्म्ड रेजीमेंट के हैं जबकि रावत इंफेंट्री डिवीजन के हैं. और ज्यादातर सेना में इन्फेंट्री के अधिकारी ही सेना प्रमुख बनाए जाते रहे हैं. सेवानिवृत्त होने जा रहे जनरल सुहाग भी इंफेन्ट्री के हैं जो एक जनवरी को रिटायर हो जाएंगे. 

जहां तक वरिष्ठता का सवाल है तो अन्य नियुक्तियों में सरकार के हाल के कदम को एक संकेत के रूप में देखा रहा है. ताजा मामला सीबीआई का है. रूपक दत्ता को गृह मंत्रालय में भेज दिया गया और राकेश अस्थाना को अंतरिम निदेशक बना दिया गया. हालांकि, यह थोड़ा असम्भव लगता है कि सरकार सेना के साथ इस तरह की प्रक्रिया अपनाएगी.

सेना प्रमुख के अलावा भी अन्य कई महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां सरकार को करनी हैं. खुफिया ब्यूरो के निदेशक का पद भरा जाना है, रिसर्च एंड एनिलेसिस विंग (रॉ) के मुखिया की भी नियुक्तियां की जानी जानी हैं. इन पदों के लिए नाम पहले ही भेजे जा चुके हैं. 

संयुक्त कमान की जरूरत

जब से मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभाला है, तभी से वह बेहतर प्रबंधन के लिए सुधार की जरूरत पर जोर देते रहे हैं. अमेरिका समेत अन्य देशों के आधुनिक सैन्य ढांचे में सीडीएस पद पहले से ही मौजूद है. भारत के रक्षा प्रतिष्ठान में और सुधारों की जरूरत है, उसी के तहत सीडीएस पद की परिकल्पना की गई है. खासकर के. सुब्रमण्यम की कारगिल रिव्यू कमेटी रिपोर्ट की रोशनी में. 

ले. जनरल (रिटा) अता हसनैन ने हाल में एक लेख लिखा है कि किस तरह से कारगिल रिव्यू कमेटी की सिफारिशों को अंतरिम रूप से स्वीकारते हुए भारत सरकार ने एचक्यू इंटीग्रेटेड डिफेन्स स्टाफ या एचक्यू आईडीएस का गठन किया था. इस रिव्यू में प्लानिंग, खरीद, खुफिया, ट्रेनिंग और यहां तक कि संयुक्त ऑपरेशनों पर भी सुझाव दिए गए थे.

सेना के एक पूर्व अधिकारी कहते हैं कि जिस तरह से आज के युग में, जब परम्परात युद्ध की शैली को नए जमाने के साथ अपनाए जान की जरूरत है, साथ ही, साइबर संसार में नया खतरा उभरा है, उसे देखते हुए संयुक्त कमान की बड़ी जरूरत है. इसमें किसी एक सेवा को प्रमुखता देने का दावा नहीं किया जा सकता. 

ले. जन. हसनैन लिखते हैं कि समस्या यह है कि प्रयोग करने के लिए 2001 से 2016 तक का समय काफी लम्बा होता है. संयुक्त कमान बनाने के लिए सच्चाई और ईमानदारी से काम नहीं किया गया. 

First published: 17 December 2016, 8:39 IST
 
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