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आधार कार्ड नागरिकों पर जबरन क्यों थोपा जा रहा है?

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 March 2017, 8:03 IST

एनडीए सरकार समाज कल्याण योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आधार को अनिवार्य करके सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन तो कर ही रही है बल्कि लोगों को उनके कानूनी अधिकारों का लाभ उठाने की राह में रोड़े अटका रही है. विधि शोधार्थी ऊषा रामनाथन व अन्य कार्यकर्ताओं ने कहा है कि सरकार द्वारा एक के बाद एक योजना के लिए आधार नंबर अनिवार्य करना ज्यादती है.

सरकार ने हाल ही 28 फरवरी को एक अधिसूचना जारी कर कहा था कि जिन बच्चों के पास 30 जून तक आधार कार्ड नहीं होगा उन्हें मिड डे मील नहीं मिलेगा! जबकि शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत बच्चों को मिड डे मील देना अनिवार्य है.

सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी राशन के सामान के लिए भी आधार कार्ड अनिवार्य है. साथ ही, मानव तस्करी से बचाई गई महिलाओं के लिए, दिव्यांगों को सहायता के लिए, शैक्षणिक छात्रवृत्तियों के लिए, पेंशन लाभ व अन्य सुविधाओं के लिए भी इसे अनिवार्य कर दिया गया है.

इस बीच, एक ओर जहां यूआईडी प्रोजेक्ट पर सुप्रीम कोर्ट में एक मामला लम्बित है, वहीं कोर्ट ने 2016 में एक आदेश पारित कर अपने पिछले आदेशों पर ही कायम रहने की बात कही है, जिसके अनुसार सरकार आधार को अनिवार्य नहीं कर सकती.

‘खाद्यान्न का अधिकार’ अभियान की दीपा सिन्हा ने कहा, ‘‘बच्चों को खाने के लिए नम्बर लेने या चिन्हित करने की क्या जरूरत? आधार की अनिवार्यता से मिड डे मील की किसी समस्या का समाधान नहीं होने वाला. बहुत से देश स्कूली बच्चों को भोजन उपलब्ध करवाते हैं लेकिन हम भारत में कह रहे हैं कि स्कूलों में भोजन पकाया जाएगा लेकिन कुछ बच्चों को यह भोजन मिलेगा व कुछ को नहीं.

निजता पर हमला

रामनाथन ने कहा, सरकारी दावे के विपरीत यूआईडी लोगों के लिए सुविधा के बजाय दुविधा बन गया है. उन्होंने कहा, यूआईडीएआई बायोमैट्रिक समस्याओं का समाधान भी उपलब्ध नहीं करवाती. कई बार दिव्यांगों को यह परेशानी आती है.
रामानाथन ने केरल में पीडीएस आंकड़ों में हेराफेरी का उदाहरण देते हुए निजता और निजी आंकड़े साझा करने संबंधी चिंताओं पर भी राय व्यक्त की. उन्होंने कहा, ‘‘आधार कार्ड अनिवार्य करने के पीछे कार्पोरेट जगत की हर व्यक्ति से संबंधित जानकारी रखने की मंशा की बड़ी भूमिका है. उद्योगपतियों का उद्देश्य लोगों के बारे में आंकड़े एकत्र करना है ताकि वे अपने व्यापारिक हित साध सकें.

उन्होंने कहा, सरकार कानून की लगातार अवहेलना कर रही है. यूआईडी के तहत पारदर्शिता की धज्जियां उड़ाई जा रही है. आधार से जनता तो ‘पारदर्शी हो रही है लेकिन सरकार छद्म होती जा रही है.

अपवाद

एक प्रेस कांफ्रेंस में वक्ताओं ने कहा, यूआईडी को अनिवार्य बनाना नागरिकों के लिए अपने अधिकारों के लिए आवेदन करना और उन सेवाओं व अधिकारों का लाभ पाना; इन दोनों ही स्तरों पर अपवाद बनता जा रहा है. कुछ महिलाओं ने उदाहरण देकर बताया कि दिल्ली में उन्हें राशन का सामान लेने में किस तरह परेशानी का सामना करना पड़ा.

जगदम्बा कैंप की निवासी अम्बरी देवी ने बताया कि उनके चार बच्चे और मानसिक विक्षिप्त पति उस पर ही आश्रित हैं. उन्होंने बताया कि आधार कार्ड न होने के कारण उनका राशन कार्ड ही नहीं बन पाया. फिर जब उसे आधार नंबर मिला तो उसे बैरंग लौटना पड़ा क्योंकि तब तक राशन कार्ड जारी करने का कोटा समाप्त हो चुका था. लाल गुम्बद की गीता ने भी कुछ ऐसा ही अनुभव साझा किया.

दिल्ली के एक पायलट प्रोजेक्ट के बारे में बात करते हुए सतर्क नागरिक संगठन की अंजलि भारद्वाज ने कहा, इस प्रोजेक्ट के तहत 42 राशन की दुकानों पर पीओएस मशीनें लगाई गईं और उनके संचालन गंभीर समस्याएं सामने आईं. ‘आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जिन 42 दुकानों में पीओएस मशीनें लगाई गई थीं, उनमें से केवल 18 ही दुकानें मार्च तक चालू रह पाईं. ऑडिट करने पर पाया गया कि दुकानदारों ने इसलिए पीओएस मशीनें वापस कर दीं क्योंकि इन मशीनों के जरिये गेहूं वितरण में काफी परेशानी का सामना करना पड़ा.’

सतर्क नागरिक संगठन की अमृता जौहरी ने बताया, ‘आधार के इस्तेमाल के लिए इंटरनेट और बिजली की जरूरत होती है और यह केवल ग्रामीण इलाकों की ही समस्या नहीं है. दक्षिणी दिल्ली, पूर्वी मेहराम नगर में भी ऐसी राशन की दुकानें हैं जिनमें न तो कोई सिग्नल आता है और न ही नेटवर्क. दूसरी ओर अधिकारियों का कहना है कि उन्हें ‘आधार कार्ड योजना’’ को सफल ही दिखाना है. इसलिए उन्होंने वहां ‘‘जामुन के पेड़ पर पीओएस मशीन लटका रखी है. क्या पता काम कर जाए! उन्होंने कहा, जब इतनी विफलताएं सामने हैं तो सरकार इसे स्वीकार क्यों नहीं कर रही?

आंकड़ों का गणित

गौरतलब है भारद्वाज ने बताया कि दिल्ली सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार बायोमीट्रिक पुष्टि पूरी तरह सफल है. जबकि हकीकत यह है कि बहुत से लोगों के बायोमीट्रिक मशीन से मेल नहीं खाते. उन्हें सरकार अपने रिकॉर्ड में ऐसा दिखा देती है कि वे राशन नहीं खरीदते. ऐसे राशनकार्ड धारकों को फर्जी बताकर उनका कार्ड भी निरस्त कर दिया जाता है. फिर वह बचा हुआ राशन बचत की गिनती में दिखा दिया जाता है.

भारद्वाज ने बताया फरवरी 2017 में प्रधानमंत्री ने लोकसभा में बताया था कि पीडीएस के तहत करीब चार करोड़ राशन कार्ड फर्जी पाए गए. लेकिन सार्वजनिक तौर पर इस बारे में कोई जानकारी साझा नहीं की गई और ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई जिन्होंने ये फर्जी कार्ड जारी किए. इसके उलट जनता को ही भुगतना पड़ा.

सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े मैग्सेसे पुरस्कार विजेता बेजवाडा विल्सन ने कहा, यूआईडी न केवल गरीब विरोधी है बल्कि यह समाज के विभिन्न समुदाय की निजता के लिए भी खतरा है. उनकी पहचान हमेशा के लिए रिकॉर्ड में दर्ज हो जाती है.

उन्होंने कहा, ‘हम कचरा बीनने वालों की अपनी पहचान को मिटा देना चाहते हैं लेकिन समाज हमें इसकी इजाजत नहीं देता. मैं अपनी अलग पहचान चुनने की आजादी चाहता हूं. मैं एक कचरा बीनने वाले का बेटा हूं लेकिन यह मेरी पहचान नहीं है. मैं कचरा बीनने वाला नहीं हूं. यह पहचान तुमने मुझे दी है. परन्तु एक नागरिक होने के नाते मुझे अपनी पहचान बताने या छिपाने का अधिकार होना चाहिए.’ वे पूछते हैं, ‘आधार कार्ड नागरिकों पर जबरन क्यों थोपा जा रहा है?'

First published: 10 March 2017, 8:03 IST
 
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