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गरीबों की रेल सब्सिडी में कटौती, मगर मुफ़्त सफ़र करने वाले नेताओं का क्या?

नीरज ठाकुर | Updated on: 29 September 2016, 8:26 IST
QUICK PILL
  • आयोग ने कहा है कि वरिष्ठ नागरिक, शहीदों की विधवाएं, जानलेवा बीमारियों के रोगी और दिव्यांगों जैसी 53 कैटेगरी के यात्रियों को दी जारी रियायतें भारतीय रेलवे पर भारी पड़ रही हैं. 
  • मगर समाचार पत्र की रिपोर्ट के मुताबिक नीति आयोग ने बड़ी चतुराई से उस सब्सिडी का जिक्र नहीं किया, जिसका फायदा सांसद और राजनीति से जुड़े अन्य लोग उठा रहे हैं और जीवनभर मुफ़्त में सफ़र करते हैं. 

कुछ हफ्ते पहले, जब नरेंद्र मोदी सरकार ने राजधानी, दुरोंतो और शताब्दी ट्रेनों के टिकटों के दाम पचास फीसदी बढ़ाए, तब यह दलील दी थी कि इन ट्रेनों का उपयोग विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग करता है. बेशक इस बात पर बहस हो सकती है कि देश में विशेषाधिकार की क्या परिभाषा है, पर सरकार की थिंक टैंक नीति आयोग गैर-विशेषाधिकार प्राप्त रेल यात्रियों से भी सब्सिडी छीन रही है. 

डेक्कन क्रॉनिकल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार नीति आयोग ने उन विभिन्न रियायतों की जांच की है, जो भारतीय रेलवे सामाजिक दायित्व के नाम पर दे रही है. आयोग के अनुसार वरिष्ठ नागरिक, शहीदों की विधवाएं, जानलेवा बीमारियों के रोगी और दिव्यांगों जैसे 53 कैटेगरी के यात्रियों को दी जारी ये रियायतें भारतीय रेलवे पर भारी पड़ रही हैं. 

दिलचस्प बात यह है कि समाचार पत्र की रिपोर्ट के मुताबिक नीति आयोग ने बड़ी चतुराई से उस सब्सिडी का जिक्र नहीं किया, जिसका फायदा सांसद और राजनीति से जुड़े अन्य लोग उठा रहे हैं और जीवनपर्यंत निशुल्क यात्रा करते हैं. नीति आयोग का वर्तमान सरकार पर काफी प्रभाव होने से संभव है सरकार इन परिवर्तनों को आने वाले दिनों में लागू करे. इससे लाखों गरीबों और वंचितों को अपनी जेब से भुगतान करना पड़ेगा. 

चुभने वाले सवाल

इस स्थिति में सरकार को कोई भी फैसला लेने से पहले इन चार प्रश्नों के जवाब देने चाहिए.

1. विशेष अधिकारों का लाभ उठा रहे देश के राजनीतिक वर्ग पर नीति आयोग ने विचार क्यों नहीं किया? 

2. क्या भारत सरकार की रेलें महज मुनाफा कमाने के बिजनेस में है?

3. यदि हां, तो उसका पूरी तरह से निजीकरण क्यों नहीं कर दिया जाए. और यदि सरकार का परम लक्ष्य वास्तव में निजीकरण करना है, तो उन लाखों लोगों की यात्रा संबंधी जरूरतों को कौन देखेगा, जो उसे मार्केट दर पर झेल नहीं सकता? 

4. जो तेजी से सुधार हो रहे हैं, वे टिकटों के दाम बढ़ाने से ज्यादा कुछ नहीं हैं. क्या सरकार विश्वसनीय और आसान सेवाओं की गारंटी लेगी, खासकर भारतीय रेलवे के साथ कोई भी स्पर्धा नहीं होने की स्थिति में? 

हाल में भारतीय रेलवे में सफर करने वाले ज्यादातर लोगों को औसत से कम अच्छी सेवाएं मिल रही हैं, चाहे वह खाना, टिकट की उपलब्धता या समय की पाबंदी की हो. जब तक सरकार इन प्रश्नों के जवाब नहीं दे देती, नीति आयोग की रिपोर्ट के आधार पर कोई भी कदम उठाना लोगों के खिलाफ होगा और उसका विपक्ष की पार्टियों और आम जनता को विरोध करना चाहिए.

First published: 29 September 2016, 8:26 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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