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सुरक्षा के तमाम इंतजाम, फिर भी कश्मीर में बेकाबू हालात, अब तक 41 मरे

कैच ब्यूरो | Updated on: 17 July 2016, 7:55 IST

जम्मू-कश्मीर बीजेपी-पीडीपी सरकार ने अलगाववादियों द्वारा शुक्रवार को बुलाये गए बंद को विफल करने के क्रम में सुरक्षा का अभूतपूर्व प्रबंध किया. इन अलगाववादी नेताओं को न सिर्फ उनके घरों में नजरबंद कर दिया गया बल्कि लगभग सभी प्रमुख शहरी केंद्रों, राजमार्गों, और यहां तक कि ग्रामीण इलाकों में भी काफी बड़े पैमाने पर सुरक्षाबलों की तैनाती की गई.

इसके अलावा इंटरनेट को बंद कर दिया गया. साथ ही बीएसएनएल को छोड़कर अन्य कंपनियों की फोन सेवाओं को ब्लाॅक करने के साथ तमाम प्रमुख मस्जिदों में नमाज की इजाजत नहीं दी.

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श्रीनगर में भी युवाओं द्वारा विरोध-प्रदर्शन के प्रयासों को विफल करने के लिये सुरक्षा के कड़े इंतजामात किये गए थे. शहर के सभी प्रमुख चौराहों और प्रवेश मार्गों को कंटीले तार लगाकर रोक दिया गया ताकि लोगों को जमा होने से रोका जा सके.

अलगाववादी समूहों ने हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद बनी तनावपूर्ण स्थितियों का फायदा उठाने के लिये दिखावटी एकता प्रदर्शित करने की कोशिश की और सभी इमामों को जुमे की नमाज के बाद ‘‘भारतीय दमन’’ के बारे में बोलने और उसके बाद आजादी के समर्थन में विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करने के लिये कहा था.

सरकार ने किए कड़े इंतजामात

सरकार को अंदेशा था कि उनकी इस अपील के बाद क्षेत्र के युवा बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतर सकते हैं और उसने किसी भी विपरीत परिस्थिति ने निबटने के लिए मजबूत इंतजाम कर रखे थे.

अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारुख़ को मस्जिदों में होने वाली जुमे की नमाज में शामिल होने की इजाजत नहीं दी गई. श्रीनगर की बड़ी मस्जिद, जिसमें मीरवाइज प्रत्येक शुक्रवार को नमाज पढ़ने जाते हैं को भी बंद करवा दिया गया.

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इसके अलावा प्रशासन ने घाटी के सबसे पवित्र धार्मिक स्थलों में से एक हजरतबल दरगाह पर आसपास रहने वाले लोगों को शुक्रवार की नमाज के लिये आने से भी रोक दिया. इसके अलावा वहां मौजूद लोगों को भी नमाज के दौरान लाउडस्पीकर का इस्तेमाल नहीं करने दिया गया.

इस दरगाह पर कुल मिलाकर लगभग 300 लोग ही नमाज में शामिल होने में सफल रहे. हालांकि मस्जिद के मुख्य मौलवी मुहम्मद सैयद फारुकी ने अपनी तकरीर में नागरिकों की हत्या की निंदा जरूर की.

रुकी नहीं हिंसा

लेकिन यह तमाम इंतजाम भी कई स्थानों पर उग्र विरोध-प्रदर्शन और हिंसा होने से नहीं रोक सके. यारिपोरा, पुलगाम में आतंकियों ने एक स्थानीय पुलिस थाने पर हथगोला फेंका और पुलिस पर गोलियां चलाईं जिसके बाद युवाओं ने भी पत्थरबाजी की. इस हमले में एक पुलिसकर्मी के शहीद होने और पांच अन्य के घायल होने की खबर है.

इसके अलावा सोपोर और कुपवाड़ा के आसपास के इलाकों में आसपास रहने वाले लोगों की भीड़ ने सेना के शिविरों और पुलिस थानों पर हमला किया जिसमें 18 वर्षीय मुश्ताक अहमद गनी की मौत हो गई. इस दौरान कई लोग घायल भी हो गए जिनमें से तीन की हालत गंभीर है. इसके अलावा सोपोर में पैलट गन से चार लोग घायल हुए जिन्हें श्रीनगर के एसएमएचएस अस्पताल में भर्ती करवाया गया है.

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बुरहान के गृहनगर त्राल में भी उसे श्रद्धांजलि देने के लिये हजारों की संख्या में लोगों ने कर्फ्यू तोड़कर ईदगाह में नमाज अता की. श्रीनगर के बारही इलाके में स्थित परिम्पोरा में प्रदर्शनकारियों ने जेएंडके पुलिस के एक कांस्टेबल के निजी वाहन को आग के हवाले कर दिया.

इस तरह श्रीनगर के शिवपुरा इलाके में भी झड़प हुई. उत्तरी कश्मीर के खितेंगन पत्तन में भी दो भाई हिलाल लोन और सज्जाद लोन सुरक्षा बलों की गोलीबारी की चपेट में आकर घायल हो गए जिन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया है.

27 साल बाद पहलगाम में कर्फ्यू

1989 में अलगाववादी आंदोलन के फैलने के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि प्रशासन को घाटी के सबसे मशहूर पर्यटन स्थल और अमरनाथा यात्रियों के बेस कैंप पहलगाम में कर्फ्यू लगाना पड़ा. यह विरोध प्रदर्शन जम्मू के मुस्लिम बहुल इलाकों तक भी फैल गए. किश्तवाड़ में बंद बुलाया गया और पुंछ के मंडी में विरोध प्रदर्शन आयोजित हुए.

कश्मीर में भी उन ग्रामीण इलाकों में जहां शायद ही कभी विरोध प्रदर्शनों का आयोजन हुआ हो, इस मौजूदा हालात का असर हुआ और छुटपुट विरोध प्रदर्शन देखने को मिले.

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एक पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘‘सेना के शिविरों और पुलिस थानों पर हमला करने का काम ग्रामीण क्षेत्रों के प्रदर्शनकारियों ने किया है क्योंकि शहरी क्षेत्रों के रहने वाले पत्थरबाज यह नहीं करते हैं. उनके ऐसे व्यवहार को समझना बिल्कुल नामुमकिन है. सुरक्षा बलों और उनके प्रतिष्ठानों पर हमला करने वालों में बहुतायत उनकी है जो पहली बार इन विरोध-प्रदर्शनों का हिस्सा बने हैं.’’

दूसरी तरफ पाकिस्तानी आतंकी समूहों ने बुरहान की मौत को भुनाने के अपने इरादे साफ जाहिर कर दिये हैं.

पाकिस्तान में आतंकियों के समर्थन में रैलियों के आयोजन होने और उनके द्वारा 19 जुलाई को पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में भारतीय बर्बरता के खिलाफ काला दिवस आयोजित करने की खबरें सामने आने के बाद घाटी में बनी चिंताजनक स्थितियों के जारी रहने की उम्मीद है.

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पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने शुक्रवार को कश्मीर की स्थितियों पर चर्चा करने के लिये कैबिनेट की विशेष बैठक भी बुलाई. उन्होंने ‘‘कश्मीरियों के आंदोलन को आजादी की लड़ाई’’ कहते हुए बुरहान को एक शहीद भी घोषित किया.

हालांकि कश्मीर में सुरक्षाबलों और मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों को जो ताजा घटनाक्रम सबसे अधिक चिंतित कर रहा है वह रावलपिंडी के जनरल मुख्यालय में चल रहे कोर कमांडरों के सम्मेलन में कश्मीर को लेकर हो रही चर्चा है. पाकिस्तान के शक्तिशाली सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ ने इस सम्मेलन में एक बयान जारी कर भारत द्वारा ‘निर्दोष कश्मीरी युवाओं की नृशंस हत्याओं’ की निंदा की है.

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एक पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘एक स्थानीय आतंकवादी कमांडर की मौत के बाद घाटी में फैली ताजा अशांति कश्मीरी संघर्ष के वह सभी पहलू रखती है जिसकी पाकिस्तान सरकार को सबसे अधिक दरकार है. इस बात की पूरी उम्मीद है कि अब स्थनीय आतंकियों को हथियार उपलब्ध करवाते हुए उनके हाथ मजबूत करने की कोशिश की जाए और यह ऐसा काम होगा जो बीते कई वर्षो से देखने में नहीं आ रहा था. और अगर वास्तव में ऐसा होता है तो स्थानीय आतंकियों की संख्या में तेजी से इजाफा होगा जिसके फलस्वरूप हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.’

दूसरी तरफ पाकिस्तानी आतंकी समूहों ने बुरहान की मौत को भुनाने के अपने इरादे साफ जाहिर कर दिये हैं. 13 जुलाई को लाहौर के माॅल रोड में बुरहान की आत्मा की शांति के लिये विशाल प्रार्थना सभा आयोजित करने वाले सईद ने अपने ट्विटर एकाउंट पर बुरहान वानी की तस्वीर को प्रोफाइल पिक्चर के रूप में लगाया है और साथ ही 3 मिनट का एक वीडियो संदेश भी पोस्ट किया है.

First published: 17 July 2016, 7:55 IST
 
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