Home » इंडिया » Greed, red tape, apathy: what ails Maharashtra's ambitious health insurance scheme
 

लालच और भ्रष्टाचार के बोझ तले दम तोड़ती महाराष्ट्र की स्वास्थ्य बीमा योजना

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 28 November 2015, 7:58 IST
QUICK PILL
  • साल 2012 में महाराष्ट्र सरकार ने राज्य की करीब 85 प्रतिशत आबादी को \r\nस्वास्थ्य बीमा मुहैया कराने के लिए राजीव गांधी जीवनदायी आरोग्य योजना की \r\nशुरुआत की थी लेकिन योजना का लाभ वांछितों तक नहीं पहुंच रहा.
  • निजी अस्पतालों ने गरीबों से झूठ बोलकर कमाए पैसे. बीमे में कवर बीमारियों के लिए भी वसूला खर्च. सरकार नहीं दे रही है ध्यान.

नेशनल सैंपल सर्वे के मुताबिक 2005 तक महज एक प्रतिशत भारतीयों के पास स्वास्थ बीमा था. लेकिन निजी इंश्योरेंस कंपनियों के कारण अब यह बढ़कर 15-25 प्रतिशत हो चुका है. इसके बावजूद भारत में स्वास्थ्य बीमा का कवर काफी कम है. 

जब 2012 में महाराष्ट्र सरकार ने राज्य की करीब 85 प्रतिशत आबादी को स्वास्थ्य बीमा मुहैया कराने के लिए राजीव गांधी जीवनदायी आरोग्य योजना की शुरुआत की तो इसे सामाजिक कल्याण की दिशा में सरकार की तरफ से उठाया गया बड़ा कदम करार दिया गया.

बीपीएल कोटा के 88 प्रतिशत लोगों को आरजीजेएवाई स्कीम् के बावजूद  जेब से भुगतान करना पड़ा

राजीव गांधी जीवनदायी आरोग्य योजना (आरजीजेएवाई) के लाभार्थियों के बारे में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की तरफ से किए गए सर्वे में यह बात सामने आई है कि 63 प्रतिशत से अधिक लोगों को इस योजना के प्रीमियम का भुगतान अपनी जेब से करना पड़ा.

सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह रही कि इसमें से 88.23 प्रतिशत लोग बीपीएल (गरीब रेखा से नीचे) से आते हैं. जिन्होंने अपने दवा, इलाज और उस दौरान होने वाले खर्च के लिए भुगतान किया.

क्या है योजना

  • आरजीजेएवाई में उन लोगों को बीमा कवर दिया जाता है जो बीपीएल और एपीएल परिवारों से आते हैं. जिनकी सालाना आय 100,000 रुपये तक होती है. इसके तहत उन्हें चुनिंदा अस्पतालों में कैंसर का इलाज और गंभीर ऑपरेशन की सुविधा मिलती है.
  • लाभार्थियों का चयन करने के लिए राज्य सरकार फूड एंड सिविल सप्लाइज डिपार्टमेंट के डेटा की मदद लेती है. सरकार राशन कार्ड में दर्ज आंकड़ों के आधार पर फैमिली की साइज के मुताबिक बीमा कंपनियों को उनके प्रीमियम का भुगतान करती है.Health cover

  • 2014-15 में 2.19 करोड़ परिवार को इस स्कीम के तहत कवर किया गया जो राज्य की करीब 85 प्रतिशत आबादी है. योजना के तहत लाभार्थियों को 150,000 रुपये तक का बीमा कवर मिलता है. इसके तहत 971 सर्जरी और अन्य इलाज को कवर किया गया है.
  • परिवार का कोई भी सदस्य इस योजना का लाभ उठा सकता है. हालांकि इसके लिए यह जरूरी है कि पूरे परिवार का संयुक्त बीमा खर्च 150,000 रुपये से अधिक नहीं हो. 
  • अस्पतालों का चयन और क्लेम की पड़ताल करने के लिए सरकार ने निजी कंपनियों के साथ समझौता कर रखा है.
  • बीमाधारकों को सलाह और उपचार की सुविधा मुफ्त मुहैया कराई गई है. योजना से जुड़े सभी अस्पतालों में आरजीजेएवाई काउंटर की सुविधा दी गई है ताकि बीमाधारकों को योजना का लाभ उठाने में किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़े.

सर्वे में क्या सामने आया

  • जिन बीमाधारकों ने कॉर्डियो थॉरेसिक, कॉर्डियोलॉजिकल और नेफ्रोलॉजिकल संबंधी इलाज कराया उन्हें अपनी जेब से क्रमश: 15,203, 5,054 और 4,667 रुपये का भुगतान करना पड़ा.
  • 'अस्पतालों में जरूरी जानकारी नहीं मिल पाने की वजह से' करीब एक तिहाई ऐसे लोगों को बीमा वाली सर्विस के लिए भी भुगतान करना पड़ा और करीब 19 प्रतिशत ऐसे भी बीमाधारक थे जिन्होंने समय की कमी के कारण जरूरी कागजी औपचारिकताओं को पूरा नहीं किया और उन्हें सेवा का लाभ लेने के लिए अपनी जेब से भुगतान करना पड़ा. 

    अस्पतालों की झूठी जानकारी की वजह से लोगों को कैशलेस सुविधाओं के लिए भी भुगतान करना पड़ा

  • निजी अस्पतालों में कई लोगों को अपनी जेब से इसलिए भुगतान करना पड़ा क्योंकि अस्पतालों ने यह बताया कि 'संबंधित इलाज आरजीजेएवाई के तहत कवर नहीं है.' इसके अलावा 'जानकारी की कमी, अस्पताल के कर्मचारियों की तरफ से सहयोग नहीं किया जाना और कागजी औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए समय की कमी' जैसे कारणों की वजह से बीमाधारकों को अपनी जेब से भुगतान करना पड़ा. 

  • सरकारी अस्पतालों के मुकाबले निजी अस्पतालों में बीमाधारकों को दोगुनी रकम का भुगतान करना पड़ा. सर्वे के मुताबिक निजी अस्पताल कई ऐसे इलाज के लिए भी बीमाधारकों से पैसे वसूल रहे हैं जिन्हें योजना में शामिल किया गया हैं. 
  • जेब से किए गए भुगतान की रकम में करीब 80 प्रतिशत रकम दवा और डायग्नॉसिस के नाम पर खर्च हुआ. 
  • आरजीजेएवाई के तहत रजिस्टर्ड बीमाधारकों की बड़ी संख्या 'कैशलेस सुविधा के बारे में पूरी तरह से बेखबर है.' 

ऐसे में अगर महाराष्ट्र सरकार इस योजना को सफलतापूर्वक चलाना चाहती है तो उसे हर हाल में टीआईएसएस सर्वे में सामने आई खामियों को दुरुस्त करना होगा.

First published: 28 November 2015, 7:58 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

पिछली कहानी
अगली कहानी