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मजबूत होती अर्थव्यवस्था में दम तोड़ती खेती-किसानी

नीरज ठाकुर | Updated on: 4 January 2016, 19:41 IST
QUICK PILL
  • 12वीं योजना (2012-17) में कृषि क्षेत्र के लिए चार फीसदी का विकास दर का लक्ष्य रखा गया था. हालांकि अभी तक इसमें दो फीसदी से अधिक की वृद्धि दर हासिल नहीं हो पाई है. जिस तरह से आधा देश सूखे का सामना कर रहा है, उसे देखते हुए अगले पांच सालों में यह दर एक फीसदी तक आ सकती है.
  • किसानों की खुदकुशी का आंकड़ा इसकी पुष्टि करता है. 2014 में 45.5 फीसदी आत्महत्या के मामले महाराष्ट्र में सामने आए जबकि तेलंगाना में 15.9 फीसदी आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए. वहीं मध्य प्रदेश में 14.6 फीसदी किसानों ने आत्महत्या की. ये सभी राज्य सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित रहे हैं.

भारत को पिछले छह सालों में चार सूखे का सामना करना पड़ा है. लेकिन इससे सबक लेने की बजाय देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने एक जनवरी को ट्विट कर यह कहने में देर नहीं लगाई कि भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाल अर्थव्यवस्था के तौर पर उभरा है.

आर्थिक तरकक्की की यह उपलब्धि किसी भी कीमत पर विकास की महत्ता पर बल देती है और यह देश की करीब 40 फीसदी आबादी की दयनीय जिंदगी को नजरअंदाज करने जैसा है. साथ ही यह सरकार की उस सोच को दर्शाती है जो यह मानकर चल रही है कि देश की अर्थव्यवस्था लंबे समय में कृषि क्षेत्र के मजबूत विकास के बिना भी आगे बढ़ सकती है. लेकिन यह एक खतरनाक सोच है. न केवल कृषि क्षेत्र के लिए बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए.

पंजाब यूनिवर्सिटी के मानद प्रोफेसर एचएस शेरगिल बताते हैं, 'भारत के कुल जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी महज 17 फीसदी है तो इसके बिना भी आर्थिक वृद्धि दर को हासिल करने में कोई परेशानी नहीं होगी.' उन्होंने कहा, 'सरकार का ध्यान सर्विस सेक्टर पर है जिसकी जीडीपी में 57 फीसदी हिस्सेदारी है. लेकिन इस तरह से अर्थव्यवस्था को देखना खतरनाक हो सकता है क्योंकि देश की 50 करोड़ से अधिक आबादी अभी भी कृषि पर आश्रित है.'

1990 में देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण की शुरुआत हुई और अर्थशास्त्रियों ने यह तर्क दिया कि गैर कृषि क्षेत्रों के विकास से देश की गरीबी को कम करने में मदद मिलेगी. लेकिन शेरगिल इस रुख को गलत बताते हैं. उन्होंने कहा, 'कृषि और गैर कृषि मजदूरों की आय में अंतर को देखिए. अगर आप पंजाब और केरल को अलग भी कर दें तो अधिकांश राज्यों में आय के अंतर में बढ़ोत्तरी हो रही है. देश में गैर-कृषि क्षेत्र में नौकरियों का सृजन नहीं हो पा रहा है लेकिन इसमें कृषि क्षेत्र को नजरअंदाज कर दिया गया है.'

भारत अपने जीडीपी का एक फीसदी भी कृषि शोध और विकास पर खर्च नहीं करता है

12वीं योजना 2012-17 के लिए योजना आयोग ने कृषि क्षेत्र के चार फीसदी विकास दर का लक्ष्य रखा था. हालांकि अभी तक इसमें दो फीसदी से अधिक की वृद्धि दर हासिल नहीं हो पाई है. जिस तरह से आधा देश सूखे का सामना कर रहा है, उसे देखते हुए अगले पांच सालों में यह दर एक फीसदी तक आ सकती है.

फसल से कम होती आमदनी की वजह से किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ता ही जा रहा है. 2014 में कम से कम 5,650 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. 1995 से 2014 के बीच 296,438 किसान खुदकुशी कर चुके हैं.

इसके अलावा कम बारिश और अनाज उत्पादन में 4.66 फीसदी की गिरावट आई है. मौजूदा साल में उत्पादन में और भी अधिक गिरावट आने की संभावना है.

हालांकि खाद्य सुरक्षा के लिहाज से स्थिति उतनी भी खराब नहीं है क्योंकि भारत के पास अनाज का पर्याप्त भंडार है. सरकार को दालों का आयात करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. इसके अलावा पिछले दो सालों के दौरान सरकार ने कीमतों पर काबू पाने के लिए प्याज की भी खरीदारी की है.

क्यों बिगड़ रहे हैं हालात

भारत कृषक समाज से जुड़े अजय वीर जाखड़ बताते हैं कि खेती-किसानी की खराब होती हालत के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार सरकार है क्योंकि वह किसानों के लिए नीतियां बनाते वक्त उनसे संपर्क नहीं करती. 'ऐसे में सारा समर्थन उन किसानों को मिल जाता है जिनके पास सिंचाई की सुविधा है. बारिश पर निर्भर किसानों को बड़े पैमाने पर नजरअंदाज कर दिया जाता है.' सस्ते उवर्रक और सस्ती बिजली का फायदा उन किसानों को मिलता है जिनके पास सिंचाई की सुविधा है. उन्होंने कहा, 'बारिश पर निर्भर किसानों को ऊर्वरक और सस्ती बिजली का फायदा नहीं मिलता. इसका फायदा पंजाब के किसानों को मिलता है.' 

वह बताते हैं, 'इसके अलावा गेहूं और चावल सिंचित भूमि की फसल हैं और उन्हें इसका समर्थन मिलता है. लेकिन गुजरात, महाराष्ट्र और तेलंगाना के किसानों का सहयोग कहां है?'

2015 में महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में 660 किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा

किसानों की खुदकुशी का आंकड़ा जाखड़ के दावे की पुष्टि करता है. 2014 में 45.5 फीसदी आत्महत्या के मामले महाराष्ट्र में सामने आए जबकि तेलंगाना में 15.9 फीसदी आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए. वहीं मध्य प्रदेश में 14.6 फीसदी किसानों ने आत्महत्या की. 2015 में महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में ही अकेले 660 किसानों की जान गई.

कोई फायदा नहीं

मशहूर अर्थशास्त्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री वाईके अलघ बताते हैं, 'सरकार की नीतियां शहरी लॉबी के दबाव में बनाई जाती हैं. किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में उन उत्पादों को बेचने की इजाजत नहीं दी जाती जिसकी कीमत अधिक है. इसके अलावा जब भारत में कीमतें बढ़ती है तो सरकार कीमतों पर नियंत्रण के लिए आयात का सहारा लेती है.'

अलघ बताते हैं, 'आज ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका भारत को निर्यात करने के लिए दाल की खेती कर रहे हैं.' उन्होंने कहा, 'मैं आयात के खिलाफ नहीं हूं लेकिन सरकार को सस्ती कीमत पर दूसरे देशों से दाल खरीदने की क्या जरूरत है जब वह अपने ही किसानों से इसकी खरीदारी नहीं कर सकती. हमारी सरकार किसानों का सहयोग कर रही है या दूसरे देश की मदद कर रही है?'

11वीं योजना के दौरान डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च एंड एजुकेशन को शोध के लिए महज 10,325.76 करोड़ रुपये दिए गए

जाखड़ भी सरकार के कई कृषि उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए जाने की आलोचना करते हैं. उन्होंने कहा, 'आज भारत में कपास की खेती करने वाले किसानों की हालत सबसे ज्यादा खराब है. जब कपास की कीमतें 7,000  रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंची तो सरकार ने सूती मिलों के दबाव में 18 महीनों के भीतर निर्यात की अधिसूचना में 17 बार बदलाव किए.' 

उन्होंने कहा, 'यह वह वक्त था जब भारत के किसान पैसा बना सकते थे और अपने कर्ज को कम कर सकते थे. अब लगातार पड़े दो सूखे के बाद वह गले तक कर्ज में डूब चुके हैं. इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा?'

परेशान किसान

ऐसा नहीं कि कृषि केवल इस सरकार के लिए प्राथमिकता नहीं है. 2015 में हुकुम देव नारायण सिंह की अध्यक्षता में बनी संसदीय समिति ने बताया था कि 11वीं योजना के दौरान डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च एंड एजुकेशन को शोध के लिए महज 10,325.76 करोड़ रुपये दिए गए जबकि मांग 31,672 करोड़ रुपये की गई थी. 

चौंकाने वाली बात यह रही कि विभाग इस रकम का भी इस्तेमाल नहीं कर पाया. विभाग महज 9,800 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाया. 2014-15 में विभाग को 6,144.39 करोड़ रुपये मिले जबकि वह महज 1,260.39 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाया. शेरगिल ने कहा, 'राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के पास वैज्ञानिकों को वेतन देने के लिए पैसा नहीं है. ऐसे में नई परियोजनाओं के बारे में तो सोचना भी बेकार है.' उन्होंने कहा, 'भारत अपने जीडीपी का एक फीसदी भी कृषि शोध और विकास पर खर्च नहीं करता है.'

जब कृषि उत्पादों की वैश्विक और घरेलू कीमतों में तेजी आती है तब निजी निवेश बढ़ता है. लेकिन अब कमोडिटी की कीमतों में गिरावट आने के बाद इसमें गिरावट आ रही है. शेरगिल बताते हैं, 'सरकार सिंचाई की बढ़ती सुविधा में निवेश करने को इच्छुक नहीं है. पिछले दो दशक के दौरान सिंचाई के क्षेत्रफल में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है.'

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा बताते हैं, 'सरकार उद्योग की मदद के लिए ग्रामीण किसानों को शहरी इलाकों में भेज रही है ताकि वहां सस्ते श्रम की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके. 11वीं योजना में कृषि में सार्वजनिक निवेश महज एक लाख करोड़ रुपये रहा और पांच साल बाद यह बढ़कर 1.5 लाख करोड़ ही हो सका है.' जिस क्षेत्र पर 50 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी टिकी हुई है वहां सरकार केवल 1.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश कर रही है?

वहीं कॉरपोरेट सेक्टर पर सरकार मेहरबान है. शर्मा बताते हैं, 'सरकार ने पिछले 10 सालों के दौरान कॉरपोरेट सेक्टर को 42 लाख करोड़ रुपये की कर छूट दी है. अगर इस पैसे को कृषि में लगाया जाता तो भारत से गरीबी खत्म हो जाती.'

अगर मुख्य अर्थशास्त्री के बयान का कोई मतलब निकलता है तो यह कि आने वाले समय में सरकार की नीति में कोई बदलाव नहीं होने जा रहा है.

First published: 4 January 2016, 19:41 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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