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गुजरात सरकार और राहुल शर्मा: इस टकराव की जड़ें गुजरात दंगों में छिपी हैं

कैच ब्यूरो | Updated on: 30 May 2016, 22:20 IST
(कैच)

बीजेपी प्रशासित गुजरात सरकार और आईपीएस राहुल शर्मा के बीच छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है. शर्मा एक बार फिर सुर्खियों में हैं. गुजरात सरकार ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया है.

सरकार ने अपने ड्राइवर और गनमैन को करीब तीन हजार रुपये देने से जुड़े एक मामले में शर्मा से पूछा है कि "उनपर कार्रवाई क्यों न की जाए?"

गुजरात सरकार शर्मा पर पहले भी 'कदाचार' का आरोप लगा चुकी लेकिन शर्मा उससे पाक साफ निकले.

अखिल भारतीय केंद्रीय सेवा के किसी भी कर्मचारी पर कार्रवाई करने से पहले राज्य सरकारों को गृह मंत्रालय से अनुमति लेनी होती है. खबरों के अनुसार राज्य सरकार को इसकी इजाजत मिल गई है.

शर्मा ने पिछले साल आईपीएस सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ले लिया था. अब वो वकालत करते हैं.

फोन रिकॉर्ड

शर्मा पहली बार तब सुर्खियों में आए थे जब 2002 के गुजरात दंगों में उन्होंने हजारों दंगाइयों की भीड़ से घिरे एक मदरसे में फंसे 380 बच्चों की जान बचाई थी.

उसके बाद शर्मा ने गुजरात सरकार के मंत्रियों, दक्षिणपंथी नेताओं और समूहों की दंगे में भूमिका उजागर की थी. 

जिसका खमियाजा उन्हें बार-बार ट्रांसफर, मुकदमेबाजी और कारण बताओ नोटिस के रूप में चुकाना पड़ रहा था. 2015 में 23 सालों की सेवा के बाद उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया.

शर्मा ने गुजरात दंगों की जांच कर रहे नानावती कमीशन को दंगों के दौरान विभिन्न नेताओं और बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद के नेताओं की बातचीत का टेलीफोन कॉल रिकॉर्ड सौंपा था. इस रिकॉर्ड से दंगों के दौरान इन नेताओं की गतिविधियों का पता चला.

पिछला आरोप

नानावती कमीशन को टेलीफोन कॉल रिकॉर्ड देने के कारण भी उन्हें नोटिस दी गई.

मार्च 2002 में शर्मा अहमदाबाद में डीसीपी (कंट्रोल रूम) के पद पर तैनात थे. नरौदा पटिया और गुलबर्ग सोसाइटी में हुई हिंसा की जांच करते समय उन्होंने मोबाइल ऑपरेटरों से दंगों के दौरान अहमदाबाद हुई सभी इनकमिंग और आउटगोइंग कॉल का ब्योरा मांगा था.

इसमें कई वरिष्ठ मंत्री, पुलिस अफ़सर, आरएसएस और वीएचपी के सदस्य के कॉल रिकॉर्ड दर्ज थे. बाद में कथित तौर पर ये कहा गया कि ये सीडी 'खो' गई है.

मार्च 2002 में दंगों की जांच के लिए गठित नानावती आयोग की सुनवाई के दौरान शर्मा ने इस सीडी की कॉपी आयोग को सौंपी.

सरकार ने उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी. सरकार ने 2011 में उनके खिलाफ आरोपपत्र दायर करके कहा कि उन्होंने ही ठोस सुबूतों वाली सीडी गायब की थी और उसे जांच अधिकारियों को नहीं सौंपा. 

शर्मा पर अपने अधीनस्थ को नगद इनाम देने और गलत मात्रा लिखने का भी आरोप था, जिससे वो बरी हो गए

इस साल जनवरी में सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्राइब्यूनल (सीएटी) ने शर्मा को सभी आरोपों से बरी करते हुए गुजरात सरकार पर कड़ी टिप्पणी की थी.

सरकारी दस्तावेज के अनुसार सीडी मामले के अलावा शर्मा पर अपने ड्राइवर और अधीनस्थ को 'नगद इनाम' देने और 'गलत मात्रा लिखने का आरोप था. 

सीएटी द्वारा सभी मामलों में बरी कर दिए जाने के बाद राज्य सरकार ने इस साल की शुरुआत में शर्मा को एक और कारण बताओ नोटिस भेजी.

गुजरात के गृह विभाग के अनुसार 'शर्मा की फाइलों की पड़ताल से पता चला' कि उन्होंने साल 2012 में उन्होंने कई बार अपनी सेवा नियमों का उल्लंघन किया था.

मसलन, छुट्टी पर होने के बावजूद शर्मा ने अपनी आधिकारिक गाड़ी, ड्राइवर और गनमैन का उपयोग किया जिससे सरकार को तीन हजार रुपये का नुकसान हुआ. सरकार ने शर्मा इसपर सफाई मांगी है.

इस मामले क्या भविष्य होगा ये तो वक्त बताएगा लेकिन राहुल शर्मा, आरबी श्रीकुमार और संजीव भट्ट जैसे अफसरों के खिलाफ गुजरात सरकार बदले की भावना से कार्रवाइयां करती रही है. क्योंकि इन लोगों ने अपने-अपने तरीकों से सरकार में बैठे शक्तिशाली लोगों के खिलाफ सुबूत उपलब्ध कराए हैं.

First published: 30 May 2016, 22:20 IST
 
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