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गुजरात सरकार कानून की आड़ में नहीं देना चाहती बेकसूरों को क्षतिपूर्ति

सुधाकर सिंह | Updated on: 5 July 2016, 6:56 IST
(कैच)

भारत का गुजरात राज्य हाल ही में एक अनोखे मामले का साक्षी बना. राज्य सरकार का एक फैसला कानूनी तौर पर भले ही ठीक हो लेकिन बहुतों की नजर में नैतिक रूप से गलत था.

ये मामला सितंबर 2002 के गांधीनगर के अक्षरधाम में हुए आतंकी हमलों में जुड़े अभियुक्तों का है. सुप्रीम कोर्ट ने सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया है. लेकिन राज्य सरकार बगैर किसी अपराध के 11 साल जेल में काटने वालों को कोई हर्जाना नहीं देना चाहती.

इसके लिए राज्य सरकार ने निचली अदालतों के उन फैसलों का हवाला दिया जिन्हें उच्चतम न्यायालय खारिज कर चुका है.

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अहमदाबाद की प्रिवेंशन ऑफ टेररिस्ट एक्टिविटीज (पोटा) अदालत ने इस इस हमले के कथित प्रमुख षडयंत्रकारी मुफ्ती अब्दुल कयूम अंसारी और तीन अन्य लोगों को मौत की सजा सुनाने के अलावा दो अन्य को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. बाद में गुजरात उच्च न्यायालय ने भी इन सजाओं पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी थी.

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि 16 मई 2014 के दिन जब गुजरात के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनने का जनादेश मिला उसी दिन उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फैसले के माध्यम से इस आरोपों और सजाओं को खारिज कर दिया. मंसूरी और पांच अन्य लोगों का बरी होना उतना ही महत्वपूर्ण था जितनी की मोदी की शानदार जीत.

हालांकि उच्चतम न्यायालय का फैसला उतनी बड़ी सुर्खी नहीं बना और वैश्विक राजनीति में बहुप्रचारित ‘उपमहाद्विपीय’ बदलाव के समाचारों के बीच कहीं दबकर रह गया.

अबतक की कहानी

उच्चतम न्यायालय ने मंसूरी और उनके अन्य ‘साथियों’ को पेश किये गए सबूतों की सत्यता पर संदेह जताते हुए न केवल बरी किया है बल्कि अक्षरधाम हमले जैसे बड़े मामले में ‘‘आरोपियों’’ को गलत तरीके से फंसाने ओर मुकदमा चलाने को लेकर भी काफी गंभीर टिप्पणियां भी कीं.

एक धर्म विशेष के लोगों को गलत तरीके से फंसाने के चलते गुजरात में पहले से ही फैला सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और अधिक गंभीर हो गया है. 

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उच्चतम न्यायालय द्वारा सभी छः अभियुक्तों को गलत तरीके से गिरफ्तार करके लंबे समय तक जेल में रखने और उनके खिलाफ मुकदमा चलाने को लेकर कड़ी टिप्पणियां करने के बावजूद गुजरात सरकार का गृह विभाग उन्हें क्षतिपूर्ति राशि नहीं देना चाहता.

आखिर गुजरात सरकार की दिक्कत क्या है?

राज्य सरकार ने उच्चतम न्यायालय में दलील दी है कि चूंकि उनके द्वारा बरी किये गए छह व्यक्तियों को पहले ही गुजरात के दो न्यायालय - पोटा और उच्च न्यायालय - उनके खिलाफ लगे आरोपों की कड़ी जांच के बाद दोषी साबित कर चुके हैं इसलिये वे किसी भी मुआवजे या क्षतिपूर्ति के हकदार नहीं हैं.

हालांकि इस बात को लेकर अभी भी कोई कानूनी स्पष्टता नहीं है कि शीर्ष न्यायालय द्वारा उलट दिये गए निचली अदालत के फैसले को कायम रखना ‘‘अदालत की अवमानना’’ की श्रेणी में आता है या नहीं लेकिन वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस मामले में निश्चित रूप से गुजरात सरकार गलत है.

वकीलों का वक्तव्य

दंगों, जातिगत भेदभाव और प्रशासनिक नकारापन के पीड़ितों के मामलों को उठाने वालों जन संघर्ष मंच से जुड़े मानवाधिकार वकील अमरीष पटेल कहते हैं, ‘‘बीते वर्षों के दौरान उन्हें जैसी मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा है उसके चलते उच्चतम न्यायालय द्वारा आखिरकार बरी किये गए सभी व्यक्ति मुआवजे के हकदार हैं.’’

निचली अदालतों द्वारा दोषी ठहराया जाना मुआवजे को खारिज करने का पर्याप्त कानूनी आधार के तर्क पर पटेल कहते हैं कि भले ही दोषमुक्ति सबूतों की कमी या संदेह के लाभ के चलते हुई हो, यह अदालत के विवेक पर निर्भर करता है कि वह मुआवजा देने का फैसला करे या नहीं.

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इसके अलावा पटेल कहते हैं कि लचर जांच के चलते आरोपों को साबित करने में अभियोजन पक्ष का नाकाम रहना उनकी गलती नहीं है और यह उन्हें मुआवजा देने से इंकार करने का पर्याप्त कारण नहीं है.

एक और अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता शमशाद खान पठान कहते हैं, ‘‘एक बार उच्चतम न्यायालय द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद सभी निचली अदालतों के तमाम फैसले अपने आप ही अमान्य और शून्य हो जाते हैं.’’

शमशाद खान पठान कहते हैं कि गुजरात सरकार द्वारा निचली अदालतों के फैसलों को आधार बनाकर मुआवजा देने से इंकार करना न सिर्फ नैतिक रूप से गलत है बल्कि चूंकि अब निचली अदालतों के फैसले अमान्य और निर्थक हो चुके हैं इसलिये ऐसा करना कानूनी रूप से भी गलत है.

जनता के लिये

पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की गुजरात शाखा भी यही मानती है कि अक्षरधाम मामले में बरी किये गए सभी छः व्यक्ति गलत तरीके से बंदी बनाए जाने के चलते मुआवजे के हकदार हैं.

पीयूसीएल (गुजरात) के महासचिव गौतम ठाकर ने शनिवार को कहा, ‘‘इन लोगों को मुआवजा देने के इंकार करके गुजरात सरकार नैतिक और कानूनी, दोनों ही मोर्चों पर गलत है.’’

उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि शीर्ष अदालत ने सिर्फ इन आरोपियों को बरी ही किया है बल्कि इसके अलावा अदालत ने इन लोगों को गलत तरीके से हिरासत में लेेने और 11 वर्षों तक सलाखों के पीछे रखने को लेकर अभियोजन पक्ष की जमकर खिंचाई भी की है.

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ठाकर बताते हैं कि पीयूसीएल पूर्व में भी टाडा और उससे पहले पोटा कानून के तहत की गई सभी गलत गिरफ्तारियों को लेकर मुआवजे की मांग करती आई है. वे आगे कहते हैं कि ऐसे सैंकड़ों उदाहरण मौजूद हैं जहां लोगों को इन कठोर कानूनों के तहत गलत तरीके से गिरफ्तार किया गया और बाद में उन्हें अदालतों ने साफ बरी कर दिया.

ठाकर बताते हैं कि हालांकि पीयूसीएल अभी तक गलत तरीके से गिरफ्तार किये गए लोगों को मुआवजा दिलवाने के लिये अदालत के दरवाजे तक नहीं गई है लेकिन उसने पोटा और टाडा के तहत गलत तरीके से हिरासत में लिये गए लोगों को मुआवजा दिलवाने के लिये राज्यपाल और कई अधिकरणों के समक्ष जरूर कई अपील की हैं.

पुलिस का रवैया

शीर्ष अदालत द्वारा बरी किये गए लोगों के प्रति गुजरात सरकार का रवैया राज्य के विख्यात एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पूर्व डीआईजी डीजी वंजारा के रुख से स्पष्ट हो जाता है. मंसूरी ने जेल में दी गई यातना का संस्मरण लिखा है, जिसके बाद वंजारा ने उनपर मानहानि का मुकदमा दर्ज करा दिया.

गुजरात पुलिस ने मंसूरी की किताब के विमोचन समारोह को भी यह कहते हुए रुकवा दिया कि वे अक्षरधाम मामले में आरोपी रहे हैं.

इसके अलावा उच्चतम न्यायालय तक मंसूरी के मुकदमे को ले जोन वाले अधिवक्ताओं के लिये आयोजित होने वाला सम्मान समारोह भी स्थानीय पुलिस के दबाव के चलते निरस्त करना पड़ा. मीडिया में इसके पीछे वंजारा की रिश्तेदार शहर की असिस्टेंट कमिश्नर आॅफ पुलिस मंजीता वंजारा का हाथ होने का दावा किया गया.

First published: 5 July 2016, 6:56 IST
 
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