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ऊंची जाति के सफाई कर्मचारियों वाला विज्ञापन देने वाले गुजराती एनजीओ पर पथराव

सुधाकर सिंह | Updated on: 26 June 2016, 7:30 IST

भारतीय सामाजिक तानेबाने का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है जाति प्रथा. इससे पार पाने की जुगत में गुजरात के एक मानवाधिकार संगठन ने खुद को मुसीबत में धकेल दिया है.

द ह्यूमन डेवलपमेंट एंड रिसर्च सेंटर (एचडीआरसी) पर ईंट-पत्थरों से हमला किया गया जबकि इसके निदेशक प्रसाद चाको को मौके से भागकर अपनी जान बचानी पड़ी. यह सब सिर्फ इसलिये हुआ क्योंकि उन्होंने सफाई कर्मचारी के रिक्त पद को भरने के लिये अगड़ी जाति के आवेदकों का भी स्वागत किया था. ध्यान रहे कि पुराने समय से यह एक ऐसा काम है जो निचली जाति के लोगों को दिया जाता रहा है.

चूंकि गुजरात में बीते करीब दो दशकों से बीजेपी सरकार का शासन है ऐसे में स्वाभाविक रूप से इस हमले को लेकर शक की सुई संघ परिवार के निचले कार्यकर्ताओं की तरफ उठनी लाजमी थी जो हमेशा से ही फैशन शो, अंतर सामुदायिक विवाहों कला प्रदर्शनियों और खाने की वरीयताओं जैसे मामलों को लेकर हिंसक रुख अपनाते रहे हैं. लेकिन इस बार बदलाव के तौर पर एनजीओ पर हुए इस हमले के पीछे ब्राह्मणों, राजपूतों और पटेलों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों के अलावा कांग्रेस के छात्र संगठन भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ (एनएसयूआई) का नाम सामने आया है.

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यहां तक कि सुन्नी आवामी फोरम ने भी अगड़ी जाति के माने जाने वाले सैयदों को सफाई कर्मचारियों की नौकरी के लिये बुलाने को लेकर एचडीआरसी को एक नोटिस भेजा है. सुन्नी आवामी फोरम ने सैयदों को सफाई कर्मचारी की पेशकश करने को ‘बदनाम करने’ वाला कदम बताया है क्योंकि उन्हें पैगंबर मोहम्मद का प्रत्यक्ष वंशज माना जाता है.

एचडीआरसी का इरादा सिर्फ इस जाति व्यवस्था आधारित रूढ़ीवादी परंपरा और धारणा को तोड़ना था

6 अप्रैल से एचडीआरसी परिसर के नोटिस बोर्ड पर चिपके इस विवादास्पद विज्ञापन में कहा गया है कि इस नौकरी के लिये उन समुदायों के आवोदकों को वरीयता दी जाएगी जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है (जैसे ब्राहमण, क्षत्रिय, बनिये, पटेल, जैन, सैयद, पठान, सीरियाई इसाई, पारसी और अन्य).

उनके इस विज्ञापन की तस्वीर वायरल हो गई और इसमें जिक्र की गई ऊंची जातियों के लोगों को सफाई कर्मचारी के पद के लिये खुद को उपयुक्त बताना नाराज कर गया.

सफाई कर्मचारी के पद के लिये ऊंची जातियों के आवेदकों को भर्ती करने की पहल के बारे में अपना पक्ष बताते हुए एचडीआरसी के सचिव डा. जिम्मी ढाबी कहते हैं कि उनका इरादा संस्थान की लोकतंत्र, सामाजिक समानता और समरसता की विचारधारा को सामने लाते हुए बढ़ावा देना था.

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उन्होंने कहा, ‘‘आमतौर पर लोग ऐसा मानते हैं कि सफाई कर्मचार की नौकरी सिर्फ वाल्मीकि समुदाय (सफाई के कामों को करने वाली पिछड़ी जाति) के लिये ही आरक्षित है.’’ साथ ही वे कहते हैं कि एचडीआरसी का इरादा सिर्फ इस जाति व्यवस्था आधारित रूढ़ीवादी परंपरा और धारणा को तोड़ना था.

एचडीआरसी के परियोजना निदेशक जोसेफ पटेलिया पूछते हैं, ‘‘आखिर सारे गंदे काम सिर्फ वाल्मीकि ही क्यों करें?’’

वे कहते हैं, ‘‘अगर सफाई कर्मचारी की नौकरी के लिये मात्र एक विज्ञापन ही इन अगड़ी जातियों की भावनाओं को इनती अधिक चोट पहुंचा सकता है तो उस अपमान के बारे में सोचिये जो सदियों से इस काम को कर रहे वाल्मीकियों को उठाना पड़ा है.’’

जोसेफ ने कैच को जानकारी दी कि ब्राह्मण समाज और कुछ अन्य जातीय समूहों ने शुक्रवार को स्थानीय पुलिस से संपर्क किया है और एचडीआरसी के निदेशक प्रसाद चाको, जो इस वक्त शहर से बाहर हैं, के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है.

इस पूरे प्रकरण ने अगड़ी जातियों में फैले असहिष्णुता के स्तर को जरूर उजागर कर दिया है

इसके अलावा ब्राह्मण समाज और अगड़ी जाति के कुछ अन्य समूहों ने एचडीआरसी के खिलाफ सोमवार तक पुलिस कार्रवाई न होने पर प्रदर्शन करने की धमकी दी है.

बहरहाल इस पूरे प्रकरण ने अगड़ी जातियों में फैले असहिष्णुता के स्तर को जरूर उजागर कर दिया है जो सिर्फ इस सुझाव को भी बर्दाश्त नहीं कर सका कि उनसे ऐसे काम की उम्मीद भी की जा सकती है जो अबतक निचली जाति के लोगों के लिये ‘आरक्षित’ माना जाता है.

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हालांकि सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इस बात को भी उठाया कि इन्हीं ऊंची जातियों के लोगों को विदेश जाने के बाद वहां सफाई कर्मचारी की नौकरी करने में कोई संकोच नहीं होता है.

इस बीच जाति बाधाओं को तोड़ने के अपने प्रयास के चलते एचडीआरसी को कई एनजीओ और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का समर्थन मिल रहा है.

First published: 26 June 2016, 7:30 IST
 
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