Home » इंडिया » Gujarat's cow vigilantes don't love their Gau Mata, they just hate Dalits
 

एक राज गुजरात, जहां मरी गाय की कीमत जिंदा आदमी से ज्यादा है

सुधाकर सिंह | Updated on: 15 July 2016, 9:02 IST
(कैच न्यूज)
QUICK PILL
  • 2014 में केंद्र की सत्ता बदलने के बाद से पूरे देश में, रोजमर्रा जिंदगी के लगभग हर क्षेत्र में हिंदु धर्म की रक्षा करने वाले स्वयंभू समूहों की संख्या बेतहाशा बढ़ी है औेर साथ ही वे ताकतवर भी हो रहे हैं.
  • इसके अलावा एक और प्रवृत्ति जिसे औपचारिक रूप से साबित नहीं किया जा सकता वह है ऐसे ‘‘सनसनीखेज’’ वीडियो के लिये टीवी चैनलों द्वारा फटाफट पैसे कमाने का दिया जाने वाला लालच.

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में सोमनाथ जिले के उना शहर में सोमवार को कथित गोरक्षकों द्वारा चार दलित युवाओं को अर्धनग्न करके पीटने की घटना बीजेपी शासित इस प्रदेश में प्रचलित कम से कम दो प्रवृत्तियों की स्पष्ट द्योतक है.

निश्चित रूप से पहली तो यह है कि 2014 में केंद्र की सत्ता बदलने के बाद से पूरे देश में, रोजमर्रा जिंदगी के लगभग हर क्षेत्र में हिंदु धर्म की रक्षा करने वाले स्वयंभू समूहों की संख्या बेतहाशा बढ़ी है औेर साथ ही वे ताकतवर भी हो रहे हैं. इसके अलावा यह घटना दर्शाती है कि सौराष्ट्र के समूचे क्षेत्र में दलित विरोधी भावनाओं की जड़ें कितनी गहरी जम चुकी हैं.

इसके अलावा एक और प्रवृत्ति जिसे औपचारिक रूप से साबित नहीं किया जा सकता वह है ऐसे ‘‘सनसनीखेज’’ वीडियो के लिये टीवी चैनलों द्वारा फटाफट पैसे कमाने का दिया जाने वाला लालच. इसका इस्तेमाल कर लोगों के बीच इस बात को लेकर डर का माहौल बनाया जा सकता है कि कैसे अब जनता ही ‘गऊ माता’ के अपमान या उसके मारे जाने को लेकर सजग हो रही है और कानून अपने हाथों में लेने से भी नहीं हिचक रही.

इसके बाद फैले दंगों में अल्पसंख्यक समुदाय के दो लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था

वीडियो: गुजरात के सोमनाथ में गाय का चमड़ा उतारने वालोंं की सरेआम पिटाई

यह कथित गोरक्षक, जिन्होंने इन दलितों को सिर्फ इसलिए बुरी तरह से मारा क्योंकि ये प्राकृतिक रूप में मरने वाली एक गाय के अवशेषों से खाल उतारते हुए पकड़े गए थे. मारपीट करने वाले एक एसयूवी गाड़ी में आए थे जिसकी नंबर प्लेट पर ‘अध्यक्ष, हिंदु शिव सेना, गिर सोमनाथ जिला’ लिखा हुआ था.

पूरे गुजरात राज्य में ऐसी हजारों कारों और एसयूवी को आसानी से देखा जा सकता है जिनका मालिक किसी भगवा संगठन से जुड़ा होता है और नंबर प्लेट के स्थान पर संगठन में मिले हुए ‘पद’ को बड़े-बड़े अक्षरों में लिखवा लेता है.

इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि आपको सड़क पर पुलिस की रोकटोक से आजादी तो मिलती ही है साथ ही आप उन दूसरे ‘कम भाग्यशाली’ सड़क पर चलने वालों के मुकाबले आसानी से चल-फिर सकते हैं.

बाहुबल

भगवा संगठनों में पदों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रदर्शित करने वाली नंबर प्लेटों का उल्लेख करना दलितों की इस पिटाई के मामले में इसलिये प्रासंगिक है क्योंकि अधिकतर इन वाहनों के मालिक मूल रूप से जबरन उगाही करने वाले होते हैं.

वर्ष 1995 में गुजरात की सत्ता पर बीजेपी के काबिज होने के बाद से बीते दो दशकों में संघ परिवार के सदस्यों का इस प्रकार की हिंसक गतिविधियों और घटनाओं में शामिल होना कोई नहीं बात नहीं है लेकिन हाल के दिनों में ऐसी घटनाएं दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही हैं.

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इसके अलावा वर्तमान समय में वीडियो कैमरा और मोबाइल फोन के बढ़े हुए इस्तेमाल के चलते इस प्रकार की घटनाएं अधिक ‘रिकाॅर्ड’ हो रही हैं और दुनिया के सामने आ रही हैं.

अक्टूबर 2003 में वीरमगाम शहर में वीएचपी कार्यकर्ताओं द्वारा प्राकृतिक कारणों से मरी हुई गाय की खाल उतारते हुए दो कसाईयों को देख लिया. इसके बाद फैले दंगों में अल्पसंख्यक समुदाय के दो लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था.

बन रहा इतिहास

प्रख्यात सामाजिक विज्ञानी और लेखक अच्युत याग्निक टिप्पणी करते हैं कि इस प्रकार की घटनाएं राज्य और केंद्र दोनों में ही बीजेपी की सरकार होने के चलते तेजी से फैल रहे हिंदुत्व के खुमार का नतीजा हैं.

वे कहते हैं कि अधिकांश मामलों में पुलिस उन गुंडों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती जो हिंदुत्व के नाम पर वसूली करने के काम में लिप्त होते हैं. याग्निक गुजरात के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास पर कई किताबों का लेखन कर चुके हैं.

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इसके अलावा याग्निक बताते हैं कि चूंकि गुजरात का सौराष्ट्र इलाका रियासतों के शासकों के शासन में रहा है इसलिये इस क्षेत्र में परंपरागत रूप से दलित विरोधी और सामंती भावना काफी प्रबल है.

यहां तक कि महात्मा गांधी और सरदार पटेल का प्रभाव भी इस क्षेत्र की दलित विरोधी भावना को सुधारने में नाकाम रहा है. अच्युत याग्निक यह याद दिलाना नहीं भूलते हैं कि चाहे उनकी गलती हो या न हो हर बार दलितों को ही कोपभाजन बनना पड़ता है.

क्या वाकई इन लोगों को गाय की परवाह है?

इसके अलावा याग्निक सौराष्ट्र के लोगों के गाय के प्रति प्रेम की गंभीरता पर भी संदेह जताते हैं क्योंकि यहां के लोग अक्सर अपनी बूढ़ी गायों और काम करने लायक न रहे गौवंश के गले में लाल दुपट्टा बांधकर सड़कों पर छोड़ देते हैं.

जब हम गौशालाओं में दूषित घास खाने के चलते दर्जनों गोवंश के मरने की घटनाओं को देखते हैं तो इन कथित गोरक्षकों के ट्रैक रिकाॅड को लेकर इस सामाज विज्ञानी का यह संदेह बिल्कुल हकीकत लगता है.

विहिप, बजरंग दल, हिंदु शिव सेना या गोरक्षक दल का कोई भी कार्यकर्ता कभी भी किसी गौशाला में दूषित चारा या घास खाने से बड़े पैमाने पर हुई गोवंश की मौतों के खिलाफ प्रदर्शन करने नहीं पहुंचता है. चाहे वह घास किसी बड़े व्यापारी के द्वारा आई हो या फिर उसे किसी रसायन कारखाने के पास के मैदान से लाया गया हो.

वीएचपी के स्थानीय नेता इन गौशालाओं के प्रबंधकों के कार्यालयों तक तो गए लेकिन वहां से खुशी-खुशी लौट आए

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सबसे पहले तो यह भगवा कार्यकर्ता जहरीले चारे के चलते गायों की इन सामूहिक मौतों को लेकर अनभिज्ञता जताने का प्रयास करते हैं और अगर उन्हें इस बारे में जानकारी दी जाती है तो वे यह मानना पसंद करते हैं कि प्रदूषण इन गायों की मौत का एक प्राकृतिक कारण है.

सबसे ताजा घटना इसी वर्ष जून के महीने की है जिसमें डाकोर मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित की जा रही गौशाला में 32 गोवंश की मौत हो गई थी. इससे पहले फरवरी के महीने में भी भावनगर जिले के एक जैन तीर्थस्थल में एक धार्मिक ट्रस्ट द्वारा संचालित की जा रही गौशाला में 25 गायों की मौत हो गई थी.

इन मामलों में गायों की मौत का कारण एक व्यापारी द्वारा दान में दी गई जहरीली घास थी लेकिन वीएचपी की तरफ से कोई भी प्रतिक्रिया देखने को नही मिली. गोवंश की मौतों से संबंधित जानकारी खबरों में आने के बाद वीएचपी के स्थानीय नेता इन गौशालाओं के प्रबंधकों के कार्यालयों तक तो गए लेकिन वहां से खुशी-खुशी लौट आए.

अब कहां गया गुस्सा?

दिसंबर 2005 में भी केंद्रीय गुजरात के भरूच जिले के अंकलेश्वर में एक दवा बनाने के कारखाने के पास स्थित मैदान में घास चरने के दो दिन के भीतर ही कम से कम 41 गायोें की मौत हो गई थी. पत्रकारों द्वारा इस मामले में उनके द्वारा किसी विरोध-प्रदर्शन इत्यादि करने के बारे में पूछे जाने के बावजूद उन्होंने कोई विरोध-प्रदर्शन तक नहीं किया.

‘गौशालाओं’ में गायों की सामूहिक मौत की सबसे बड़ी घटना मार्च 2015 में वड़ोदरा में घटी थी जहां एक शुभचिंतक द्वारा दान की गई जहरीली घास को खाने के चलते 102 गायों की मौत हो गई थी. तब भगवा ब्रिगेड के इन सैनिकों ने न तो किसी की पीट-पीट कर जान ली, न ही कोई विरोध प्रदर्शन किया और न ही किसी बंद का आह्वान किया.

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गुजरात गौसेवा और गौचर विकास बोर्ड के अध्यक्ष डाॅ. वल्लभ कठीरिया स्वीकारते हैं कि हो सकता है कि इन गायों की मौत जहरीली घास की वजह से हुई हो, लेकिन वे मामले पर पर्दा डालते हुए बचाव में तर्क देतेे हैं कि गायों के कई प्रेमी इन गौशालाओं को प्रतिदिन तीन से चार ट्रक भरकर घास का दान करते हैं और हो सकता है कि इनमें से किसी में यह जहरीली घास आ गई हो.

यह तो था 102 गायों की मौत पर गायों की सुरक्षा के लिये बनी सरकारी एजेंसी के मुखिया का बयान लेकिन इन चार निर्दोष दलितों को तो सिर्फ प्राकृतिक कारणों से मरी एक गाय की खाल उतारने के जुर्म में बुरी तरह से मारा-पीटा गया.

दरअसल, गोप्रेमियों की सुविधा के खांचे में मौत का कारण इतना मायने नहीं रखता जितना कथित ‘हत्यारे’ की पहचान रखती है.

First published: 15 July 2016, 9:02 IST
 
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