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गुजरात विकास का एक चेहरा और: स्कूल जाने वाली लड़कियों के मामले में फिसड्डी

श्रिया मोहन | Updated on: 12 July 2016, 7:49 IST

यह आंकड़े सबसे पहले यह यूनिसेफ की वेबसाइट पर प्रकाशित हुआ था. वर्ष 2013 के आरम्भ में छपी इस रिपोर्ट में पहली कुछ पंक्तियों में गुजरात की बढ़ती अर्थव्यवस्था को श्रद्धांजलि अर्पित की गई थी. इसमें लिखा गया- गुजरात को अभी मीलों का सफर तय करना होगा ताकि आर्थिक विकास वास्तव में मानव विकास में तब्दील हो सके.

इसके तुरंत बाद सितंबर 2013 में आरबीआई गर्वनर रघुराम राजन की अध्यक्षता वाले पैनल ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसने गुजरात के तिलिस्म को तोड़ते हुए बताया कि दरअसल गुजरात भी एक विकासशील राज्य है. जिन महत्वपूर्ण घटकों पर यह रिपोर्ट आधारित थी वे थे- शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार, गरीबी दर, महिला साक्षरता, अनुसूचित जाति, जनजाति का विकास आदि.

अब भारत की जनगणना रिपोर्ट के सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के द्वारा किए गए सर्वेक्षण-2014 के अनुसार स्कूल जाने वाली लड़कियों की औसत संख्या के मामले में गुजरात सबसे निचले पायदान वाले राज्यों में आता है.

देश के इक्कीस बड़े राज्यों में यह सर्वेक्षण किया गया, जिसमें गुजरात का स्थान 20वां रहा. रिपोर्ट के अनुसार गुजरात में स्कूल जाने वाली बालिकाओं की औसत संख्या का प्रतिशत 73.4 बताया गया है, जो कि राजस्थान से बस एक पायदान ऊपर है. राजस्थान में यह औसत प्रतिशत 72.1 प्रतिशत है.

आंकड़ों पर नजर

सर्वे के अनुसार गुजरात में 15 से 17 वर्ष की आयु वर्ग की 26.6 प्रतिशत लड़कियां या तो स्कूल जाना छोड़ देती हैं या वे कभी स्कूल जाती ही नहीं.

इसका मतलब हुआ कि 26.6 फीसदी लड़कियां दसवीं कक्षा तक नहीं पढ़ीं हैं. देश भर में स्कूल जाने वाली बालिकाओं का औसत प्रतिशत 83.8 है. गुजरात में यह प्रतिशत औसत से दस प्रतिशत कम है.

सरकारी योजनाएं धराशायी

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार जब ये आंकड़े एकत्र किए गए उससे करीब दस वर्ष पहले से गुजरात में स्कूल में बच्चियों के दाखिले की संख्या में सुधार की योजनाएं चलायी जा रही थीं. कन्या केलवानी और शाला प्रवेशोत्सव जैसे कार्यक्रमों के जरिए मंत्री और सरकारी अधिकारी गांवों में घूम-घूम कर बच्चों के स्कूलों में दाखिले की कवायद करने में लगे हैं.

उच्च स्तर पर प्रोत्साहन के बावजूद गुजरात से निचले स्तर के राज्यों ने अच्छा प्रदर्शन किया है.

  • बिहार में 15 से 17 वर्ष की आयु वर्ग की 83.3 प्रतिशत लड़कियां स्कूल गईं.
  • असम में यह आंकड़ा 84.8 प्रतिशत रहा.
  • झारखंड में 84.1प्रतिशत
  • छत्तीसगढ़ में 90.1 प्रतिशत
  • मध्य प्रदेश में 79.2 प्रतिशत
  • उत्तर प्रदेश में 79.4 प्रतिशत
  • उड़ीसा में 75.3 प्रतिशत
वर्ष 2006-07 में 44.5 % लड़कियों का स्कूल में दाखिला करवाया गया था.

व्यापक विषमताएं

गुजरात में शिक्षा का अधिकार संस्था के पिछले सात साल से संयोजक मुजाहिद नफीस के अनुसार इस राह में कई समस्याएं हैं. दूरदराज के इलाकों मेे रहने वाले आदिवासी समुदायों, मुस्लिमों और अनुसूचित जाति वर्ग में स्कूल छोड़ना बड़ी समस्या बन गया है. नफीस के अनुसार यह समस्या देश के अन्य इलाकों में भी है.

नफीस कहते हैं, "गुजरात में यह समस्या इसलिए अधिक दिखाई देती है क्योंकि दूसरी भाषाओं और गुजराती में काफी कम समानता है.”

उनके मुताबिक उत्तर प्रदेश में अवधि और भोजपुरी बोलने वाले सब हिन्दी भी आसानी से समझते हैं लेकिन कोई गुजराती नहीं समझता. इसलिए जब पढ़ाने का माध्यम ही सही नहीं होगा तो वे क्या सीखेंगे.

नफीस के शब्दों में शिक्षकों का अभाव एक औऱ बड़ी समस्या है. गुजरात में 13 जिले ऐसे हैं, जहां योग्यताधारी शिक्षक जाना ही नहीं चाहते. इन इलाकों में अपराध की दर ज्यादा है और अभिभावक अपनी बेटियों को स्कूल भेजने से कतराते हैं.

वे कहते हैं एक ही उपाय हो सकता है कि इन शिक्षकों की नियुक्ति स्थाई तौर पर कर दी जाए ताकि वे नौकरी की ओर से आश्वस्त रहें. साथ ही महिला शिक्षिकाओं की नियुक्ति की जाए ताकि लड़कियां स्कूल की ओर लौटें.

First published: 12 July 2016, 7:49 IST
 
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