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गुजरात: कारोबारियों ने उसी रात काली मुद्रा से सोने की ईंटें ख़रीद ली थीं

रथिन दास | Updated on: 12 November 2016, 8:24 IST
QUICK PILL
  • 8 नवंबर की देर रात 500 और 1,000 रुपए के नोटों पर पाबंदी के बाद गुजरात के लोगों ने तुरन्त ही इसका तोड़ निकाल लिया था. 
  • अपनी काली मुद्रा सफेद करने के लिए गुजराती सर्राफ़ा कारोबारियों की दुकान पर पहुंच गए, करोड़ों की सोने की ईंट ख़रीदी और रसीद कम की कटवाई. 

500 और 1000 की नोट पर पाबंदी का एलान होते ही गुजरात के लोगों ने सर्राफ़ा कारोबारियों की दुकानों की ओर दौड़ लगा दी. वे उतना सोना खरीद लेना चाहते थे जितना उनके लिए मुमकिन था. गुजरात में अमूमन सर्राफ़ा की दुकानें रात 8.30 बजे बंद हो जाती हैं मगर कुछ लोगों ने तो अपने जानकार ज्वैलर्स को फोन करके भी कहा कि वे अभी अपनी दुकान को बंद न करें.

वे कुछ जेवरात खरीदने आ रहे हैं. असल में वे बंद होने जा रहे 500 और 1,000 रुपए के नोटों को देकर जेवर खरीद लेना चाहते थे. सोने की ईंट बेचने वाले व्यवसायी इससे उपकृत हो गए. और इससे तुरन्त ही 10 ग्राम सोने का भाव 41,000 रुपए तक जा चढ़ा.

तुरन्त ही लोगों के घर नोटों से खाली हो गए और लोग आनन-फानन में जेवरात खरीदकर घर आ गए.

एक ज्वैलर ने एक स्थानीय पत्रकार को बताया कि एक व्यापारी ने एक करोड़ की नगदी दी लेकिन उसने जो जेवरात खरीदा, उसकी रसीद केवल 65 लाख रुपए की ही ली. सोना खरीदने के लिए लोग इतने लालायित थे कि उन्होंने बिना समय गंवाए

जल्दी-जल्दी में ज्वैलरी खरीद ली. आभूषणों की डिजायन कैसी है, इस तरफ भी उन्होंने कोई ध्यान ही नहीं दिया. ध्यान देने का वक्त भी उनके पास नहीं था.

चमकदार लेकिन पुरानी तरकीब

कारोबारी माहौल वाले राज्य, जहां के बाशिंदे धंधा करने में माहिर समझे जाते हैं, वहां नगदी को सोने में बदलना कोई नई बात नहीं है. व्यापारिक माहौल वाले राज्य में आर्थिक अपराध भी बहुत तरह के होते हैं, वहां इस तरह के कामों को मान्यता भी मिली हुई है और इसे उपक्रम कौशल भी समझा जाता है. गुजरात में काफी व्यापार नगदी में होता है. लेनदेन नगदी में होता है. इसका मतलब यह हुआ कि व्यापारिक सौदों में बैंकिंग व्यवस्था का ज्यादा सहारा नहीं लिया जाता है.

भारी संख्या में सौदों का होना

इस संकट से निपटने का एक और तरीका अख्तियार किया गया. वह यह कि उच्च मूल्यों के नोटों को मंदिरों में चढ़ा देना या धार्मिक संगठनों को दे देना और इसके बदले में कम मूल्य के नोट ले लेना. हालांकि इस पर 25 फीसदी का प्रीमियम भी ले लिया जाता है.

'भक्तगण' ट्रस्ट को 500 या 1,000 रुपए का नोट दे देते हैं और 100 रुपए के नोट के साथ बाहर आ जाते हैं. कालाधन रखने वालों ने एक और तरीका तलाश लिया. अपनी कारों के टैंक फुल रहने के बावजूद उन्होंने पेट्रोल पम्पों की ओर दौड़ लगा दी. देखा तो यहां गया कि एक कार मालिक ने 80,000 रुपए के प्री-पेड पेट्रो कार्ड की सुविधा ले ली ताकि अगले कुछ महीनों तक के लिए उसका उपयोग किय़ा जा सके.

ज्यादा अधिक तो यह कि एजेंट भी मशरूम की तरह से फल-फूल आए. इसके लिए उन्होंने अर्ध-शिक्षित लोगों और गरीब लोगों का सहारा लिया. पांच सौ के एक नोट पर पांच सौ-सौ के नोट के लिए उन्होंने इन लोगों को अच्छा-खासा कमीशन भी दिया.

नेटवर्क

बड़े नोटों के बंद होने का सबसे ज्यादा असर निम्न वर्ग के लोगों पर पड़ा. छोटे दुकानदारों, निर्माण काम में लगे मजदूरों, मैकेनिक्स, घरेलू नौकरों के सामने समस्या खड़ी हो गई. वे न तो कोई सामान बेच सकते थे और न ही अपनी जरूरतों का कुछ खरीद सकते थे. इसकी वजह यह थी कि उनके पास पांच सौ का नोट था. सामान खरीदने के लिए न तो उनके पास खुले पैसे थे और न ही लौटाने के लिए दुकानदार के पास.

बड़े नोटों का चलन खत्म होने से एक व्यापार बुरी तरह चौपट हो गया. स्थानीय भाषा में इसे 'आंगड़िया' कहा जाता है. मूलतः यह अवैध कूरियर सर्विस है. नोट बंद होने की खबर के फौरन बाद नम्बर दो में रुपयों का ट्रांसफर करने वाला आंगड़िया रूट जाम हो गया. 

अहमदाबाद, सूरत और मुम्बई का करोड़ों रुपए का कारोबार इसी नेटवर्क के जरिए होता है. एक अनुमान के अनुसार 'आंगड़िया' एक साल में लगभग 150 करोड़ रुपए का नगदी और हीरा यहां से वहां ले जाते हैं जिसकी कोई रसीद या लिखा-पढ़ी नहीं होती है.

जैसे ही नोटों को बंद किए जाने की बात पता चली वैसे ही, बड़े व्यापारियों ने आंगड़िया को ट्रांसफर करने के लिए जो पैसा दिया था, उस पैसे को व्यापारी आंगड़ियों से वापस लेने से मना करने लगे. गुजरात में यह सेवा इतनी लोकप्रिय है कि कई नामी-गिरामी लोग भी यह मानने से इनकार कर देते हैं कि यह अवैध सेवा है. 

दरअसल, केन्द्रीय कर और खुफिया एजेंसियों ने जब पिछले चुनाव अभियानों के दौरान इन आंगड़ियों से करोड़ों रुपए बरामद किए थे तब स्थानीय मीडिया ने इस बात की सरकार की खिंचाई की थी कि सरकार बिना लिखा-पढ़ी के इतनी बड़ी राशि ले जाने वालों का पता अब तक क्यों नहीं लगा पाई.

पहले से जानकारी होना

बैंकों के बाहर गुरुवार सुबह से लम्बी लाइनें लग गईं थीं. लाइन में लगे एक वर्ग के लोगों का विश्वास था कि राज्य के कुछ व्य़ापारियों को इस संकट की पहले से जानकारी थी क्य़ोंकि वे उदिग्न नहीं लग रहे थे. सूत्रों का यह भी कहना है कि रियल एस्टेट से जुड़े कुछ लोगों, जो सत्तारूढ़ दल के ज्यादा नजदीक नहीं हैं, उन्हें इस निर्णय की सम्भवतः पहले से जानकारी थी, उनसे न केवल गुजरात वरन देश के किसी भी टू-टियर शहरों के बाहरी इलाकों में अप्रत्यक्ष रूप से जमीनों को खरीदने के लिए कह रखा गया था.

कुछ लोगों का विश्वास है कि कुछ व्यापारियों को सरकार के इस कदम की पहले से जानकारी थी

रियल इस्टेट से जुड़े लोगों का विचार था कि ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि उन्हें उस समय भारी लाभ मिल जाएगा, जब ये शहर स्मार्ट सिटी की सूची में आएंगे और विकसित होंगे. लेकिन उन्हें यह जरा सा भी आभास नहीं था कि उनका अवैध धन नाली में बहने वाला है.

लम्बी और आपसी बातचीत के दौरान यह उभरकर आया कि कोई भी यह विश्वास करने को तैयार नहीं है कि देश की सबसे बड़ी पार्टी अपने हजारों करोड़ों रुपयों को यूं ही नाली में बहाए जाने की अनुमित दे देगी. वह भी कालेधन से निपटने के नाम पर. कुछ लोग अब स्वीकार करते हैं कि पार्टी से जुड़े कुछ लोगों ने, जिन्हें वे जानते हैं, संकेत किय़ा था कि वे बड़े नोट अपने पास न रखें. दिवाली के बाद तो निश्चित ही नहीं.

First published: 12 November 2016, 8:24 IST
 
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