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गुजरात: पटेलों को मिला कभी न मिलने वाला आरक्षण

अभिषेक पराशर | Updated on: 30 April 2016, 13:45 IST
QUICK PILL
  • गुजरात सरकार ने सामाजिक और शैक्षणिक आधार की जगह पहली बार आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का फैसला किया है.
  • गुजरात में पहले से ही 49.5 फीसदी आरक्षण है और इस 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण के बाद यह तय सीमा 50 फीसदी से अधिक हो जाएगी.
  • विशेषज्ञों के मुताबिक गुजरात में आरक्षण के इस फैसले को संविधान में संशोधन किए बिना लागू ही नहीं किया जा सकता.
  • जिन पटेलों के आंदोलन के कारण सरकार ने नए आरक्षण का प्रावधान किया है उन्हें इसका कोई लाभ मिलने की संभावना नगण्य है.
  • गुजरात सरकार ने नए आरक्षण कानून में छह लाख से कम सालाना आय वालों को ही इसके योग्य माना है.

गुजरात सरकार ने 6 लाख रुपये से कम आय वाले लोगों को सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला लिया है. इस 10 फीसदी आरक्षण के दायरे में वह सभी जातियां आएंगी जो पहले से जारी 49.5 फीसदी आरक्षण के दायरे में नहीं है. 

मौजूदा 49.5 फीसदी आरक्षण के दायरे में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी समुदाय आते हैं. 

सरकार के इस फैसले से पाटीदारों, ब्राह्मणों, क्षत्रिय और लोहाना समुदाय के उन लोगों को फायदा पहुंचेगा जिनकी सालाना आय छह लाख रुपये से कम है.

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राज्य सरकार ने सबसे बड़ा बदलाव आरक्षण के आधार में बदलाव कर किया है. संविधान में साफ कहा गया है कि राज्य सामजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदाय के विकास के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है. लेकिन पहली बार गुजरात सरकार ने इसके आगे जाते हुए आर्थिक आधार पर आरक्षण घोषित किया है.

सरकार ने सामाजिक और शैक्षणिक आधार की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का फैसला किया है. गुजरात में पहले से ही 49.5 फीसदी आरक्षण है और इस 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण के बाद यह तय सीमा 50 फीसदी से अधिक हो जाएगी. जबकि संविधान 50 फीसदी आरक्षण की मंजूरी देता है. 

साफ शब्दों में समझा जाए तो गुजरात सरकार के इस फैसले को संवैधानिक संशोधन के बिना लागू करना संभव नहीं है. तो फिर सरकार ने आर्थिक आधार पर आरक्षण ही क्यों दिया, जब वह उसे लागू हीं नहीं करा सकती?

हरियाणा में जाटों को और आंध्र प्रदेश में मुस्लिमों को आरक्षण दिए जाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट पलट चुका है

गुजरात हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट आनंद याज्ञनिक बताते हैं, 'तात्कालिक तौर पर तो यह फैसला पाटीदारों को खुश करने के लिए लिया गया है लेकिन लंबे समय में यह फैसला बीजेपी के अगले चुनाव की रणनीति का हिस्सा है.' 

हरियाणा में जाटों को और आंध्र प्रदेश में मुस्लिमों को आरक्षण दिए जाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट पलट चुका है. इन दोनों राज्यों में दिया गया आरक्षण तय सीमा 50 फीसदी की अनिवार्य शर्त का उल्लंघन कर रहा था. 

याज्ञनिक कहते हैं, 'गुजरात सरकार ने तो दोनों ही आधारों को चुनौती दे दी है. 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण के बाद गुजरात में आरक्षण 59.5 फीसदी हो जाएगा. दूसरा कि सरकार ने संविधान की शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ेपन की जगह आर्थिक पिछड़ेपन को आधार बनाकर आरक्षण देने का फैसला किया है.' वह पूछते हैं, 'बिना संवैधानिक संशोधन के क्या इस फैसले को लागू करना संभव है?'

नुकसान की भरपाई

राज्य में पिछले एक साल से चल रहे पटेलों के आंदोलन के बाद आनंदीबेन सरकार बेहद दबाव में है. हार्दिक पटेल और लाल जी पटेलों के नेतृत्व में पटेलों को आरक्षण दिलाए जाने के आंदोलन से पटेलों में उपजे असंतोष को खत्म करने में बेन विफल रही हैं. बेन खुद पटेल हैं और उनके ही मुख्यमंत्री रहते हुए राज्य में अब तक का पटेलों का सबसे बड़ा आंदोलन हुआ. 

गुजरात का पटेल समुदाय बीजेपी का समर्थक रहा है. हालांकि हार्दिक पटेल की गिरफ्तारी और लाल जी पटेल पर हुई पत्थरबाजी की वजह से बीजेपी समेेत अन्य दलों के पटेल नेताओं में गहरी नाराजगी है.

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अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुए राज्य के स्थानीय चुनाव में यह बात सामने आ चुकी है कि पटेलों ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों से बराबर दूरी बनाई है. 

विधानसभा चुनाव के पहले पटेल समुदाय नए राजनीतिक विकल्प को लेकर आगे बढ़ रहा है और बीजेपी इससे भली-भांति अवगत है. 

गुजरात के पाटीदार समुदाय से आने वाले सभी दलों के विधायकों में पटेलों के आरक्षण को लेकर आम सहमति है

अहमदाबाद बीजेपी के एक नेता ने अपना नाम नहीं छापे जाने की शर्त पर बताया, 'गुजरात में बीजेपी को नुकसान हो रहा है लेकिन उसी अनुपात में कांग्रेस को कोई फायदा होता नहीं दिख रहा है. पटेल दरअसल अपनी पार्टी खड़ी किए जाने के बारे में गंभीरता से सोच रहे हैं. बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात इस थर्ड फ्रंट का खड़ा होना है.' 

गुजरात के पाटीदार समुदाय से आने वाले विधायकों में पटेलों के आरक्षण को लेकर आम सहमति है. फिलहाल बीजेपी में पटेल समुदाय के सबसे ज्यादा विधायक है. 

पटेलों के अलग राजनीतिक ताकत बन कर उभरने की स्थिति में सबसे ज्यादा नुकसान बीजेपी को ही उठाना होगा. 

याज्ञनिक ने बताया, 'गुजरात सरकार का आरक्षण का फैसला बस पाटीदार आंदोलन से हुए नुकसान को पाटने की कवायद है. पार्टी के सामने इससे बेहतर कोई तात्कालिक उपाय नहीं था.' 

सरकार ने 10 फीसदी आरक्षण के दायरे में पहले से आरक्षण का लाभ पा रही जातियों से इतर सभी जातियों को रखा है जिनकी सालान आय 6 लाख रुपये से कम है.

आरक्षण विरोध से आरक्षण की मांग तक

2015-16 में पटेल आंदोलन में बड़ा बदलाव आया. 80 और 90 के दशक में हुआ पटेल आंदोलन आरक्षण विरोध का था लेकिन अब वह खुद को आरक्षण की सूची में शामिल किए जाने की मांग कर रहे हैं. 

याज्ञनिक बताते हैं, 'हार्दिक पटेल के आंदोलन को पहले के दो आरक्षण विरोधी आंदोलनों की कड़ी में हुए रणनीतिक बदलाव के तौर पर देखना होगा.'

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वजह आजादी के बाद गुजरात की आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों में हुआ बड़ा बदलाव है. जिसका असर पाटीदार समुदाय पर पड़ा.

गुजरात में पटेल समाज को ब्रिटिश शासन के दौरान बड़ौदा स्टेट में आरक्षण मिला हुआ था लेकिन 1947 के बाद यह स्थिति नहीं रही. पटेल समुदाय पहले पूरी तरह से कृषि पर निर्भर था. हालांकि अब स्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी है. 

याज्ञनिक बताते हैं, 'आजादी के बाद पटेलों की यह चौथी पीढ़ी है. अब उनकी जमीन कई टुकड़ों में बंट चुकी है. इस वजह से पटेलों की एक पूरी पीढ़ी अब रोजगार बाजार में दस्तक दे रही है. लेकिन उनके पास रोजगार नहीं है.' 

याज्ञनिक पटेलों की समस्या के लिए सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी के विकास के मॉडल को जिम्मेदार ठहराते हैं. उन्होंने कहा कि मोदी जिस विकास मॉडल की बात कर रहे थे उसमें सिर्फ विकास दर थी, न कि रोजगार के मौके. 

उन्होंने कहा, 'उदारीकरण के बाद सरकारी क्षेत्रों में नौकरियां रही नहीं और निजी क्षेत्र के जिस विकास मॉडल को मोदी ने आगे बढ़ाया उसमें गुजरातियों को नौकरी मिली नहीं.' 

छोटे और मझोले उद्योग, कृषि और पशुपालन एंव डेयरी उद्योग में पटेलों का वर्चस्व रहा है. इसके अलावा जमीनों पर भी इनका कब्जा रहा है.

पटेल समुदाय अभी भी गुजरात में अपनी आबादी के अनुपात में राजनीतिक रूप से सर्वाधिक शक्तिशाली है

गुजरात केडू समाज के सागर रबारी बताते हैं, 'मोदी चाहे अपने विकास मॉडल की जितनी भी तारीफ कर लें लेकिन सच्चाई यह है कि उनके कार्यकाल के दौरान कृषि संकट गहराया और छोटे एवं मझोले उद्योगों की पूरी श्रृंखला चौपट हो गई. इसका सबसे ज्यादा असर पटेलों पर पड़ा.'

हालांकि इन सबके बावजूद पटेल अभी भी गुजरात में अपनी आबादी के अनुपात में राजनीतिक रूप से ज्यादा शक्तिशाली है. न तो उनकी सामाजिक हैसियत में गिरावट आई है और नहीं उनकी आर्थिक ताकत कमजोर हुई है. गुजरात की मुख्यमंत्री और गृहमंत्री समेत कई अन्य मंत्री पटेल समुदाय से आते हैं.

पटेलों में अंजना पटेल और कोली पटेल ऐसे दो समुदाय हैं जिन्हें पहले से आरक्षण मिला हुआ है. वहीं कडवा और ल्यूआ पटेल आरक्षण की सूची से बाहर है. गुजरात में पटेल आंदोलन को चलाने वाले हार्दिक पटेल इसी समुदाय से आते हैं.

सरकार की मजबूरी

पटेल पहले ओबीसी के तहत आरक्षण की मांग कर रहे थे. सरकार के लिए उन्हें ओबीसी के हिस्से का आरक्षण देेना संभव नहीं है. बिहार चुनाव के बाद से नरेंद्र मोदी कई मौके पर कह चुके हैं कि किसी भी कीमत पर पिछड़ी जातियों को मिला आरक्षण नहीं छीना जा सकता.

रबारी ने बताया, 'पटेेल पहले तो हमें आरक्षण दो या फिर सबका खत्म करो की बात कर रहे थे. लेकिन आंदोलन के फैलने के बाद अन्य लोगों के शामिल होने के बाद अब यह मांग सिर्फ आरक्षण देने पर सिमट गई.' 

सरकार के सामने दूसरी बड़ी समस्या हार्दिक पटेल से बातचीत को लेकर थी. कहा जाता है कि हार्दिक पटेल अपनी मांगों को लेकर टस से मस नहीं होते थे. यही वजह रही कि राज्य सरकार ने अब हार्दिक पटेल की जगह लालजी पटेल को भाव देकर आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है. 

रबारी बताते हैं, 'इस बात की पूरी संभाावना है कि सरकार लालजी पटेल से अपनी बात मनवा लेगी. पटेल समुदाय के भीतर लालजी पटेल की नेतृत्व को वैधता दिलाने में सरकार को समय लगेगा. यही वजह है कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी की सहमति से तात्कालिक तौर पर आरक्षण की घोषणा कर दी गई, जिसका कोई मतलब नहीं है. पटेल समुदाय भी इस बात को भली भांति समझता है.' 

पटेलों के बीच नए नेतृत्व बनने तक गुजरात सरकार यह कह सकती है कि उसने अपनी तरफ से आरक्षण देने की कोशिश की लेकिन कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया.

First published: 30 April 2016, 13:45 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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