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असहमतियों को दबाने के लिए गुजरात सरकार फिर कड़ा कानून ला रही है

रथिन दास | Updated on: 23 September 2016, 7:38 IST
QUICK PILL
  • गुजरात प्रोटेक्शन ऑफ इंटर्नल सिक्यूरिटी एक्ट (जीपीआईएसए) का मसौदा सम्भवतः तैयार कर लिया गया है. विधानसभा के अगले सत्र में इसे पेश किए जाने और इसके पारित कराए जाने का इरादा है.
  • इस कानून के तहत \'मात्र संदेह\' के आधार पर ही किसी को भी गिरफ्तार करने का अधिकार मिल जाएगा कि अमुक व्यक्ति गुजरात की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा है.

किसी भी तरह के मतभेदों को कुचलने की इच्छा पाले भाजपा के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार अपने विरोधियों को दबाने के लिए एक और कानून लाने का विचार कर रही है. अभी यह विचार प्रारम्भिक अवस्था में ही है. सूत्रों के अनुसार विधानसभा के अगले सत्र में इसे पेश किए जाने और इसके पारित कराए जाने का इरादा है. इससे पुलिस को 'मात्र संदेह' के आधार पर ही किसी को भी गिरफ्तार करने का अधिकार मिल जाएगा कि अमुक व्यक्ति गुजरात की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा है.

इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद पुलिस न सिर्फ किसी को मात्र संदेह के आधार पर पकड़ सकेगी, बल्कि इस कानून के जरिए पुलिस और प्रशासन को अभियोजन से प्रतिरोधक शक्ति देना भी प्रस्तावित है. गुजरात प्रोटक्शन ऑफ इंटर्नल सिक्यूरिटी एक्ट (जीपीआईएसए) का मसौदा सम्भवतः तैयार कर लिया गया है.

इससे राज्य में भाजपा सरकार अपने पहले के संकट से उबरना चाह रही है क्योंकि राज्य सरकार इसी तरह के अपने पूर्व के विधेयक के कारण कठिनाई में फंसी हुई है और लगातार तीन राष्ट्रपतियों ने राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को मंजूरी नहीं दी है.

राष्ट्रपति ने पिछले साल लौटाया था

पिछले साल राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 'गुजरात कन्ट्रोल ऑफ टेरेरिज्म एंड ऑर्गनाइज्ड क्राइम' विधेयक को विभिन्न मानवाधिकारों संगठनों और विपक्षी दलों की ओर से मिली शिकायतों के चलते वापस कर दिया था. इन संगठनों ने विधेयक के कड़े प्रावधानों को लेकर शिकायत की थी.

इसके पहले भी, 2003 से ही जब यह विधेयक तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में पहली बार गुजरात विधानसभा में पारित किया गया था, दो बार राष्ट्रपति ने इसे अनुमति देने से इनकार कर दिया था. पहली बार तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और उनके बाद प्रतिभा पाटील ने विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं किए थे. सूत्रों के अनुसार इसकी वजह बताई गई थी कि इसके कड़े प्रावधानों के कारण नागरिकों के मूल मानवाधिकारों का हनन होता है.

इस समय भी, नए प्रस्तावित जीपीआईएसए में संज्ञेय और असंज्ञेय दोनों तरह के अपराधों में 'संदेह' के आधार पर किसी को भी गिरफ्तार कर लेने का प्रावधान है. इसके साथ ही पुलिस और प्रशासन को यह प्रतिरोधक ताकत दी गई है कि लम्बे ट्रायल के बाद यदि कोई नागरिक सम्मान के साथ छूट जाता है तो वह अपने नुकसान का दावा नहीं कर सकेगा. कोई आश्चर्य नहीं, सिविल सोसाइटी और मानविधकार कार्यकर्ता नए प्रस्तावित कानून को लेकर नाराज और आक्रोशित हैं. उनमें से कुछ ने एक बार फिर इसे कठोर कानून के रूप में बताया है.

मानवाधिकार कार्यकर्ता मुजाहिद नफीस ने इस विधेयक का जोरदार तरीके से विरोध करने का संकल्प लिया है. नफीस कहते हैं कि प्रस्तावित कानून ज्यादा या कम गुजसीटीओसी की तरह से ही है. इसमें कुछ नए प्रावधान, जैसे कि निजी और सार्वजनिक स्थानों पर निगरानी कैमरे लगाए जाने के, जोड़े गए हैं.

मुजाहिद नफीस आगे कहते हैं कि गुजरात सरकार चोरी-छिपे इस कानून को लाए जाने की कोशिश इसलिए कर रही है कि उसे यह अहसास हो गया है कि वह 'गुजरात कन्ट्रोल ऑफ टेरेरिज्म एंड ऑर्गनाइज्ड क्राइम' जैसा विधेयक फिर नहीं ला सकती है.

नफीस भूमि, जंगल, और जल पर हाल ही हुए एक राष्ट्रीय सम्मेलन के आयोजकों में से एक रहे हैं. वह कहते हैं कि सिर्फ संदेह के आधार पर किसी को गिरफ्तार कर लेने का मतलब यही है कि सरकार सभी तरह की असहमतियों को कुचल डालना चाहती है और किसी को भी विचार व्यक्त करने के उसके मानवाधिकारों से दूर करना चाहती है.

मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश

मूवमेन्ट फॉर सेक्यूलर डेमोक्रेसी (एमएसडी) के संयोजक प्रो. (रि.) प्रकाश शाह कहते हैं कि प्रस्तावित कानून जिसे कड़ा कहा जाता है, वह नया पैमाना लिए हुए है. उन्होंने कहा कि सरकार सम्भवतः इस कानून के जरिए अपने से असहमत लोगों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना चाहती है.

जबकि, पहले से ही राज्य या देश में आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कानून मौजूद हैं. प्रस्तावित कानून का दुरुपयोग किए जाने का संकेत भी प्रो. शाह ने दिया. उन्होंने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में ऐसे कठोर कानून के खिलाफ रोक लगाई है.

प्रो. शाह ने उम्मीद जताई कि नया विधेयक कभी भी अमल में नहीं आ सकता. प्रो. शाह ने यह भी कहा कि यदि सरकार वाकई में आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की राजनीतिक इच्छा रखती है तो खुराफाती लोगों से निपटने के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त हैं.

नया प्रस्तावित विधेयक 'गुजरात कन्ट्रोल ऑफ टेरेरिज्म एंड ऑर्गनाइज्ड क्राइम' अधिनयम की नकल ही है जो कई सालों तक तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के बीच तकरार और विवाद की जड़ बना रहा है. राष्ट्रपति द्वारा इसे वापस किए जाने के बाद भी गुजरात विधानसभा ने उसे चार बार पारित किया था. उत्तरोत्तर राष्ट्रपति यही चाहते थे कि इस अधिनियम के कड़े उपायों को हलका किया जाए.

First published: 23 September 2016, 7:38 IST
 
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