Home » इंडिया » Gulberg: Not just Zakia, the verdict is bad news for other riot victims as well
 

गुलबर्ग सोसाएटी: अदालत का फैसला सिर्फ जाकिया ही नहीं, बाकियों के लिए भी बुरी खबर है

सुहास मुंशी | Updated on: 4 June 2016, 10:40 IST
(कैच न्यूज)
QUICK PILL
  • दोषी करार दिए गए 24 लोगों में से 11 पर धारा 302 के तहत हत्या का आरोप लगाया गया था जबकि अन्य को \"कम गंभीर अपराधों\" जैसे दंगे और आगजनी की धाराओं के तहत आरोपी बनाया गया था.
  • संभावना है कि दोषी ठहराए गए लोगों की सजा पर फैसला 6 जून को सुनाया जाएगा, लेकिन जिन 11 लोगों पर हत्या के आरोप में मुकदमा चला था, उन्हें कम से कम आजीवन कारावास की सजा तो मिलनी तय ही है. 
  • एहसान जाफरी की विधवा जाकिया जाफरी और रूपाबेन मोदी ने फैसले के बारे में नाराजगी व्यक्त की है तथा और अधिक लोगों को सजा दिलाने की बात कही है. रूपाबेन मोदी का बेटा भी उस दंगे में लापता हो गया था.

गुलबर्ग सोसाएटी नरसंहार मामले में फैसला सुनाने में चार न्यायाधीश और सवा 14 साल लग गए. अदालत ने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान गुलबर्ग में 69 लोगों की हत्या के लिए 24 लोगों को दोषी करार दिया और अन्य 36 आरोपियों को बरी कर दिया.

उल्लेखनीय है कि आरोपियों में शामिल एकमात्र सरकारी कर्मचारी, पुलिस इंस्पेक्टर केजी इर्दा को बरी कर दिया था.

फैसले के बारे में यह भी उल्लेखनीय बात है कि इसमें नरसंहार के पीछे आपराधिक साजिश की संभावना को नकार दिया गया है. फैसले का यह पक्ष अभी तक सार्वजनिक होना शेष है.

अभियोजन पक्ष ने दलील दी थी कि जानबूझकर देरी और सरकारी मशीनरी की मिलीभगत ने भीड़ को 69 लोगों को जान से मारने का मौका दिया था. मरने वालों में कांग्रेस नेता एहसान जाफरी भी शामिल थे. वहीं दूसरी ओर, बचाव पक्ष का दावा था कि यह नरसंहार गोधरा ट्रेन आगजनी के कारण उपजे भीड़ के "सहज" आक्रोश का परिणाम था.

बचाव पक्ष का यह भी दावा था कि जाफरी ने जब भीड़ को इकट्ठा होते देख हवा में गोलियां चलाई थी जिससे हिंसक भीड़ का गुस्सा और बढ़ गया था.

दोषी करार दिए गए 24 लोगों में से 11 पर धारा 302 के तहत हत्या का आरोप लगाया गया था जबकि अन्य को "कम गंभीर अपराधों" जैसे दंगे और आगजनी की धाराओं के तहत आरोपी बनाया गया था.

संभावना है कि दोषी ठहराए गए लोगों की सजा पर फैसला 6 जून को सुनाया जाएगा, लेकिन जिन 11 लोगों पर हत्या के आरोप में मुकदमा चला था, उन्हें कम से कम आजीवन कारावास की सजा तो मिलनी तय ही है. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि दोषी ठहराए गए लोग अपने बचाव के लिए ऊपरी अदालत में जाएंगे या नहीं, लेकिन नरसंहार के पीड़ितों के परिवारों ने कहा है कि वे 34 आरोपियों को बरी किए जाने को चुनौती देंगे.

एहसान जाफरी की विधवा जाकिया जाफरी और रूपाबेन मोदी ने फैसले के बारे में नाराजगी व्यक्त की है तथा और अधिक लोगों को सजा दिलाने की बात कही है. रूपाबेन मोदी का बेटा भी उस दंगे में लापता हो गया था. विशेष रूप से पुलिस अधिकारी इर्दा और भाजपा पार्षद बिपिन पटेल को बरी किया जाना पीड़ितों के परिवारों के गले नहीं उतर रहा है.

फैसला निश्चित रूप से ऐसे कई लोगों को निराश करने वाला है जो इस मामले में न्याय दिलाने के लिए लंबे समय से लड़ रहे हैं. उदाहरण के लिए एक सवाल पूछा जा सकता है कि जब अहमदाबाद के हिंदू बहुल इलाके मेघानीनगर के पड़ोस में स्थित गुलबर्ग हाउसिंग सोसायटी में मात्र चार घंटे में 69 लोगों को मार डाला गया और 19 घरों को जला डाला गया तो मात्र 11 लोगों को हत्या का दोषी कैसे ठहराया जा सकता है?

आरबी श्रीकुमार, पहले सेवारत पुलिस अधिकारी थे जिन्होंने 2002 के नरसंहार के बाद सरकार के खिलाफ गवाही दी

गुजरात पुलिस के पूर्व डीजीपी आरबी श्रीकुमार, पहले ऐसे सेवारत पुलिस अधिकारी थे जिन्होंने 2002 के नरसंहार के बाद मोदी सरकार के खिलाफ गवाही दी थी. साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग और नानावती आयोग को कीमती साक्ष्य उपलब्ध कराए थे.

मौजूदा फैसले पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि जहां उस "भीड़ की हिंसा के कुछ जल्लादों" को दोषी ठहरा दिया गया है, वहीं, कई दूसरे भी हैं जो बच गए हैं लेकिन इसी तरह से दंडित किए जाने के लायक हैं.

"किसी भी सांप्रदायिक दंगे या तबाही में सिर्फ हिंसा को अंजाम देने वाले लोग ही शामिल नहीं होते बल्कि योजनाकार भी होते हैं, जो इस मामले में मोदी और उनके दोस्त थे. इसके बाद आयोजक भी होते हैं जो जिलास्तरीय संघ कार्यकर्ता थे. वहां भीड़ जुटाने वाले लोग भी थे, जिन्होंने एक साथ इतनी भीड़ जुटाई और गैस सिलेंडर जैसे आसान हथियारों की व्यवस्था की. लेकिन इस मामले में इन लोगों में से किसी को भी छुआ तक नहीं गया है. इसलिए, इस फैसले के बारे में मेरी मान्यता मिलीजुली है."

उससे भी महत्वपूर्ण यह बात है कि अदालत का यह मानना था कि इस नरसंहार के पीछे कोई आपराधिक साजिश नहीं थी. इस अवलोकन का असर गुजरात दंगों के अन्य मुकदमों पर पड़ सकता है, जिसमें नरेंद्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ गुजरात उच्च न्यायालय में जाकिया जाफरी द्वारा दायर किया गया मामला भी शामिल है.

जांच का दायरा

गुजरात पुलिस नियंत्रण कक्ष के रिकॉर्ड के अनुसार, अहमदाबाद पुलिस जानती थी कि गुलबर्ग सोसायटी को 45,000 लोगों की भीड़ ने घेर लिया था जिनमें से अधिकांश हथियार लिए हुए थे. फिर भी उन्होंने पूरे मेघानीनगर इलाके को सुबह 11.30 बजे से दोपहर बाद 3.30 बजे तक इंस्पेक्टर इर्दा के प्रभार में दिए रखा, जब नरसंहार को अंजाम दिया गया था.

पुलिस की मिलीभगत के सबूतों, पूर्व तहलका पत्रकार और आम आदमी पार्टी के नेता आशीष खेतान द्वारा किए गए स्टिंग ऑपरेशन के वीडियो के अलावा खुद पुलिस का रिकॉर्ड भी बताता है कि जब मेघानीनगर पर सबसे भीषण हमला हुआ, तब वहां पुलिस की कोई मौजूदगी नहीं थी. यहां तक कि अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर सहित तमाम पुलिस अधिकारियों को सूचना देने के बाद भी कोई कदम नहीं उठाया गया.

रिकॉर्ड भी दर्शाते हैं कि इर्दा लगातार अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ संपर्क में थे. हालांकि उसने लगभग 2:30 बजे अर्धसैनिक बैकअप बुलाया था, लेकिन यह देर शाम तक नहीं पहुंच पाया. जब गुलमर्ग सोसायटी को पेट्रोल से तर किया जा रहा था और जलते टायरों और एसिड के साथ आग में झोंका जा रहा था तब भी दमकल नहीं बुलाई गई.

इतने वर्षों तक गुलबर्ग नरसंहार मामला कई तरह के विवादों के केंद्र में रहा. यहां तक कि एक सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2002 की हिंसा की जांच के लिए नियुक्त विशेष जांच टीम (एसआईटी) की भूमिका पर भी सवाल उठ चुके हैं. एसआईटी के तत्कालीन विशेष लोक अभियोजक आरके शाह ने 2010 की शुरुआत में इस्तीफा दे दिया था. उन्होंने न सिर्फ एसआईटी की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे, बल्कि तब पीठासीन न्यायाधीश के दृष्टिकोण को भी सवालों के घेरे में ला दिया था.

'द फिक्शन ऑफ फैक्ट फाइन्डिंगः मोदी एंड गोधरा' के लेखक मनोज मित्ता ने कैच को बताया, "अभी तक मैंने निर्णय नहीं देखा है, इसलिए मैं किसी विशेष व्यक्ति को बरी करने या दोषी ठहराने पर टिप्पणी नहीं कर सकता. गोधरा कांड के बाद पहला नरसंहार गुलबर्ग ने देखा था. जाकिया जाफरी ने हत्याकांड को लेकर तत्कालीन मोदी शासन की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे, जिसकी लंबे समय तक घेराबंदी हुई थी. एसआईटी को अपनी गवाही देते समय मोदी के पास इस बात का कोई तर्कपूर्ण और संतोषजनक जवाब नहीं था कि नरसंहार के दौरान मौके पर मौजूद टीम के बार-बार चेताने के बावजूद उनका प्रशासन कार्रवाई करने में विफल क्यों हो रहा? उनकी गवाही में कई प्रमुख कमियों और अनियमितताओं के बावजूद उनका दोषमुक्त हो जाना जाहिर करता है कि एसआईटी ने उनको बचाया था."

यह देखते हुए कि दोनों पक्ष किस स्थिति में हैं, कोई भी आसानी से अनुमान लगा सकता है कि यह फैसला तो एक लंबी कानूनी लड़ाई की सिर्फ शुरुआत है.

First published: 4 June 2016, 10:40 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

पिछली कहानी
अगली कहानी