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गुलबर्ग फैसला: न्याय की उम्मीद में निराश नज़रें

राजीव खन्ना | Updated on: 19 June 2016, 8:29 IST
QUICK PILL
  • 2002 गुजरात दंगों के पीड़ित अहमदाबाद कोर्ट के फैसले को लेकर सवाल कर रहे हैं. लोगों के बीच हो रही बातचीत बता रही है कि वे इस न्याय से संतुष्ट नहीं हैं.
  • वह इस बात को मानने से इनकार कर रहे हैं कि सजा पाए 24 लोगों ने 69 लोगों को मार डाला. उनका कहना है कि उन्मादी भीड़ में शामिल क्या अन्य लोग नरसंहार के दिन तमाशा देख रहे थे.
  • गुलबर्ग सोसाएटी में हुए दंगों में कुल 69 लोग मारे गए थे, जिसमें महिलाओं और बच्चों समेत कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी भी शामिल थे.

2002 गुजरात दंगों के पीड़ित अहमदाबाद कोर्ट के फैसले को लेकर सवाल कर रहे हैं. लोगों के बीच हो रही बातचीत बता रही है कि एक आम आदमी इस फैसले को किस तरह से देख रहा है. क्या अदालत यह कहना चाह रही है कि 24 लोगों ने 69 लोगों को मार डाला? क्या अन्य लोग बस तमाशा देख रहे थे?

शुक्रवार को अहमदाबाद की अदालत ने 11 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जबकि 12 लोगों को सात साल की सजा सुनाई. वहीं एक अन्य को 10 साल की सजा सुनाई गई. गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की बोगी में आग लगाए जाने के बाद गुजरात में दंगे शुरू हुए थे.

करीब 400 लोगों का समूह अहमदाबाद के चमनपुरा में गुलबर्ग सोसाएटी पर चढ़ आया. भीड़ ने फ्लैट्स में आग लगा दी और इसमें 69 लोग मारे गए जिसमें कई महिलाओं और बच्चों समेत कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी भी शामिल थे.

दंगा पीड़ित आज अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं. रमजान के पाक महीने में उनके भीतर आक्रोश पनप रहा है. मामले के मुख्य गवाह इम्तियाज खान ने बताया, 'हम इस मामले में असाधारण फैसले की उम्मीद थी. हमें लगता था कि अदालत इस मामले में आने वाली पीढ़ियों के लिए सख्त संदेश देगा. नरोदा पाटिया नरसंहार मामले में पूर्व मंत्री माया कोडनानी समेत अन्य दोषी करार दिए जा चुके हैं. लेकिन अब यह संदेश गया है कि आप निर्दोष लोगों को मारकर कुछ साल जेल में बिताकर बाहर आ जाएंगे.'

इम्तियाज बस उस दर्द को बयां कर रहे थे जिसे अन्य पीड़ितों ने न्याय की आस में 14 सालों तक झेला है. उन्होंने 23 आरोपियों की पहचान की थी जिसमें से कई छूट चुके हैं. वह इस बात को लेकर गुुस्सा है जिन आदमियों ने हत्याएं की और दंगे किए, वह सात साल की सजा काटकर बाहर हो जाएंगे.

इम्तियाज ने कहा, 'मुझे 14 साल में 17 बार घर बदलना पड़ा. इसके बाद मैं अपनी सास के घर पर आ गया. मकान मालिक हर महीने किराया बढ़ा देते थे. वह हमेशा डरे रहते थे क्योंकि मेरे साथ बॉडीगार्ड रहते थे. कोई भी आदमी हर वक्त अपने परिसर में पुलिसवालों को देखना नहीं चाहता.'

पीड़ित इस बात को लेकर भी नाराज हैं कि कोर्ट ने यह माना कि भीड़ इसलिए उन्मादी हो गई क्योंकि जाफरी ने गोली चलाई थी. उनका कहना है कि जाफरी ने अपनी मदद के लिए हर संभव कोशिश की. सभी दरवाजे बंद होने के बाद जाफरी ने भीड़ को भगाने के लिए गोली चलाई.

सवाल पूछा जा रहा है, 'क्या उन्हें नहीं पता कि जाफरी ने अपने लाइसेंसी बंदूक से गोली चलाई थी. उन्होंने नाउम्मीदगी में गोली चलाई थी. क्या यह स्थिति को बयां करने का क्रूर तरीका नहीं है?'

गुलबर्ग सोसाएटी मामले में अहमदाबाद की अदालत ने 11 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है

दंगों के दौरान गुजरात में रिपोर्टिंग कर चुके इस रिपोर्टर ने कई मौकों पर पीड़ितों से बातचीत की. उन्होंने बताया कि किस तरह जाफरी ने मदद के लिए हर दरवाजा खटखटाया, लेकिन उन्हें कहीं से भी मदद नहीं मिली.

कई लोग कार्रवाई के दौरान गवाही से मुकर गए. असलम मंसूरी अपने बयान से पलट गया. पीड़ित बताते हैं कि लोगों ने डर और दबाव में आकर बयान बदल लिया.

असलम के पिता कासिम मंसूरी ही एकमात्र वैसे शख्स हैं जो गुलबर्ग सोसाएटी में रहते हैं. आर्थिक मजबूरी में उन्हें वहां लौटना पड़ा. आखिरी बार मैं 2007 में असलम से मुलाकात हुई थी. ऐसे लोगों से मिलना अक्सर मुश्किल होता है. मंसूरी परिवार के 12 सदस्य मारे गए थे. उन्होंने कहा, 'मैं अभी भी रात को सो नहीं पाता हूं. मैं कितने लोगों  की मौत भुला सकता हूं? मैं एक दो लोगों की मौत को भुला भी सकता हूं लेकिन मेरे पूरे परिवार को मार दिया गया.'

लोग फैसले के उस हिस्से पर भी सवाल उठा रहे हैं जो आईपीसी की धारा 34 से जुड़ा है. यह धारा कई लोगों के एक साझे मकसद से काम करने से संबंधित है. कोर्ट ने इस धारा को खारिज कर दिया. लोग पूछ रहे हैं कि क्या भीड़ मुस्लिमों को निशाना बनाने के साझे हित से प्रेरित नहीं थी.

66 आरोपियों में से आधे से अधिक छोड़े जा चुके हैं जबकि छह की सुनवाई के दौरान ही मृत्यु हो गई थी. इम्तियाज कहते हैं, 'पुलिस ने हमें बचाने के लिए कुछ नहीं किया. बाद में इन पुलिसवालों को हमें दरिया खान में शरणार्थी शिविर में भेजने के काम में लगाया गया. क्या विडंबना है?'

गुलबर्ग सोसाएटी पिछले 14 सालों से सुर्खियों में है. पीड़ित अपनी संपत्ति बेचना चाह रहे हैं लेकिन वह ऐसा नहीं कर पा रहे हैं. बिल्डर्स अक्सर संपत्ति की कीमत कम कर बता रहे थे. वह भी तब जब रियल एस्टेट बूम पर था.

दूसरा एनजीओ और सामाजिक कार्यकताअों का कहना था कि इसे संग्रहालय में बदला जाए लेकिन बाद में इस योजना को रद्द कर दिया गया.

सबसे अहम बात यह है कि जिस इलाके में गुलबर्ग सोसाएटी हैं वह डिस्टर्ब्ड एरियाज एक्ट-1991 के तहत आता है और इसके तहत कोई व्यक्ति दूसरे समुदाय के व्यक्ति को अपनी संपत्ति नहीं बेच सकता. इसका मकसद झुग्गी बस्तियों के विस्तार को रोकना था लेकिन अहमदाबाद और वड़ोदरा में इसका दूसरा मतलब निकाला गया.

66 आरोपियों में से छह की सुनवाई के दौरान ही मृत्यु हो गई थी

बहरहाल फैसले असंतुष्ट लोग अब गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की योजना बना रहे हैं. इन पीड़ितों के भीतर गुस्सा है. 

पारसी दंपत्ति रुपा और दारा मोदी का बेटा अजहर उसी दिन लापता हो गया था. परिवार यह बात नहीं मान रहा है कि उनका बेटा मर चुका है. वह अभी भी उसके लौटने का इंतजार कर रहे हैं. मुस्लिम सोसाएटी में यह एकमात्र पारसी परिवार था.

नरसंहार में बचे लोगों का कहना है कि बच्चे को मार डाला गया क्योंकि वह जाफरी के घर की सीढ़ियां चढ़ने की कोशिश कर रहा था. लेकिन बच्चे के माता पिता का मानना है कि उनका बेटा अभी जिंदा है और वह एक दिन लौटेगा.

लोगों की न्याय की आस भी जिंदा है कि वह एक दिन जरूर मिलेगा.

First published: 19 June 2016, 8:29 IST
 
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