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J यानी JPEG या जॉबलेस: स्वागत है तरुण विजय की साइबर पाठशाला में

श्रिया मोहन | Updated on: 11 February 2017, 5:45 IST
(फाइल फोटो )

‘भारत अपनी पहचान में एक महत्वपूर्ण पारी से गुजर रहा है. नरेंद्र मोदी के डिजिटल भारत के साथ ही, एक ही स्ट्रोक में हमारी वर्तमान भाषा पाषाण युग की भाषा हो गई. हमें हमारी युवा पीढ़ी को एक नई भाषा सिखानी है, जो उन्हें साइबर युग से परिचित कराए. यह डिजिटल भारत के लिए आवश्यक हो गया है.’ 

यह कहना है भाजपा सांसद तरुण विजय का. तरुण विजय ने अपनी यह बात केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा उनकी किताब की लॉन्चिंग के चंद मिनटों बाद ही कैच से कही. मंगलवार को उनकी किताब ‘साइबर पाठशाला- अल्फाबेट फॉर साइबर वॉरियर्स ऑफ डिजिटल इंडिया’ की लॉन्चिंग प्रगति मैदान के विश्व पुस्तक मेले में की गई थी. किताब की सहलेखिका उनकी बेटी शांभवी हैं, जो फर्ग्यूसन कॉलेज की पुरानी छात्रा हैं.

साइबर वर्णमाला

‘साइबर पाठशाला’ 70 पन्नों की किताब है, जो युवाओं को साइबर सुरक्षा और भारत के प्रधानमंत्री मोदी के संदेश से शुरू होती है. ‘दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई किया हुआ कोई भी छात्र हजारों मील दूर से आपके बैंक खाते का माउस के एक क्लिक से सफाया कर सकता है.’

यह वाक्य शुरू में ही लिखा है क्योंकि विजय मानते हैं कि उनकी किताब ‘साइबर योद्धाओं को साइबर आतंकियों से लडऩे में मदद करेगी.’

इसके बाद राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा आयुक्त डॉ. गुलशन राय की एक भावुक चिट्ठी है, जो इस रचना के मकसद को लेकर काफी उत्साहित हैं. विजय की इस चिट्ठी का मकसद है 'साइबर सुरक्षा की चुनौती से निबटने के लिए देश में साइबर साक्षर कर्मियों को जुटाना'. 

सांस थाम कर बैठें, इस शानदार भूमिका के बाद अंग्रेजी और हिंदी में ‘साइबर अल्फाबेट्स’ हैं. 

C फॉर कैशलेस : डिजिटल इंडिया का प्रोग्राम भारत का एक उत्तम कार्यक्रम है, इस मकसद से कि भारत को डिजिटल रूप से सशक्त समाज और प्रसिद्ध अर्थव्यवस्था में तब्दील करना है. ‘चेहराविहीन, कागजविहीन, कैशविहिन’ डिजिटल भारत की एक मुख्य भूमिका है.

इसी तरह व से विमुद्रीकरण बताया गया है.

कहीं कहीं ग्राफिक्स निरर्थक हैं, जिन्हें देखकर हंसी आती है. मसलन-  जे से जेपीईजी: इंटरनेट पर ग्राफिक चित्रों के लिए एक जाना-पहचाना फाइल फॉर्मेट. 

इसके साथ गांधीजी की दांडी यात्रा का मशहूर चित्र है. या C से कुकी जहां, जेम लगे बिस्किट का चित्र है.

तर्क

विजय महसूस करते हैं कि अल्फाबेट्स की वर्तमान किताबें अप्रासंगिक हो गई हैं. वे कहते हैं, ‘Q से क्वीन क्यों. वह ब्रितानी है और अब प्रासंगिक नहीं है. H से हेन क्यों, जब इस अल्फाबेट के साथ ‘ऑनेस्ट मनी’ और ‘हैकिंग’ ज्यादा प्रासंगिक हैं.’

विजय महसूस करते हैं कि नोटबंदी के बाद से भाषा और कहावतें बदल गई हैं. वे कहते हैं, ‘I से इंटरनेट या I से ईमानदार धन, वह धन जो सही है और कर चुका कर ईमानदारी से कमाया गया है. अगर बच्चों को स्कूल के दिनों से ही यह सब सिखाया जाए, तो वे अच्छी तरह समझ जाएंगे कि उन्हें बड़े होकर ईमानदारी से कैसे जीना है.’ 

पर वे आलोचना की प्रतिक्रिया कैसे करते हैं? नोटबंदी ने मीडिया सहित कई सेक्टर्स में काफी लोगों को बेरोजगार किया है. क्या J से जॉबलेस नहीं होना चाहिए? 

‘J से जेपीईजी या Jet Age होता है,’ विजय ने बीच में ही बात काटी, जो अपने अल्फाबेट्स को लेकर आश्वस्त थे.

‘किसी के पास हुनर है, तो वह कभी बेरोजगार नहीं होगा. हां, कुछ मुश्किलें जरूर हैं. मुश्किल समय में भी लोग राष्ट्र के साथ होते हैं,’ वे एटीएम की कतार में घंटों खड़े रहे एक शख्स की कहानी जारी रखते हैं, जो बेहोश हो जाता है, पर होश में आने के बाद उसके पहले शब्द पीएम के इस आश्चर्यजनक फैसले की तारीफ में थे.

वे महसूस करते हैं कि जो शिकायत कर रहे हैं, वे भ्रष्ट हैं और वे जिनके पास चुनाव लड़ने के लिए ईमानदारी का पैसा नहीं है.

विजय मानते हैं कि उनके लक्षित पाठक सभी उम्र के छात्र हैं, फिफ्थ स्टैंडर्ड में कंप्यूटर साइंस पढऩे वाले बालक से लेकर यूनिवर्सिटी के छात्र तक, जिन्हें सभी आईसीटी (सूचना, संचार एवं तकनीक ) विभागों में ‘फिलॉसफी ऑफ डिजिटाइजेशन’ पढ़ाया जाना चाहिए. 

वे कहते हैं, ‘यह पहली पुस्तक है, जो सरकार की नई अर्थशास्त्रीय भाषा को लोगों को तक पहुंचा रही है'. वे आगे कहते हैं, ‘भारत साइबर आतंक का सबसे बड़ा शिकार है. हर साल 32 लाख हमले होते हैं. साइबर आतंक का मुकाबला करने के लिए साइबर योद्धा कहां हैं? अगर आप साइबर शब्दावली नहीं जानते हैं, तो देश साइबर योद्धा पैदा करने वाला कैसे बन सकता है? साइबर योद्धा बनाने के लिए साइबर पाठशाला होनी चाहिए.’

उनकी अगली किताब साइबर सुरक्षा पर है. शुक्र है, वह अल्फाबेटिकल नहीं होगी. ‘वह विश्लेषणात्मक होगी,’ कहते हुए उनके चेहरे पर गर्व साफ झलक रहा था.

First published: 13 January 2017, 8:06 IST
 
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