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बिक गया रंगमंच के उस्ताद हबीब तनवीर का मकान

राजकुमार सोनी | Updated on: 31 August 2017, 12:27 IST
हबीब तनवीर

रंगमंच के मशहूर अभिनेता और नाट्य निर्देशक हबीब तनवीर का मकान बिक गया. यह मकान रायपुर के बैजनाथ पारा में है जहां रहकर हबीब तनवीर ने आगरा बाज़ार, मिट्टी की गाड़ी, मोर नाव दामाद- गांव के नाम ससुराल, बहादुर कलारिन, शाजापुर की शांतिबाई, हिरमा की अमर कहानी जैसे नाटकों को तैयार किया था.

हबीब तनवीर की भांजी नसरीन कहती हैं कि अब यह मकान बिक गया है. उनके मुताबिक इसी मकान में उनकी नानी नजीर बेगम, हबीब साहब की बहनें कैसर जहां, बिलकिस जमाल के अलावा पूरे कुनबे ने कई साल गुजारे. यहीं रहकर उन्होंने अपने कालजयी नाटकों को तैयार किया था.

नसरीन के मुताबिक तनवीर साहब के इंतकाल के बाद उनके शौहर मोहम्मद मुस्तफा सैफउल्ला ने यह मकान अशरफ नाम के शख्स को महज़ साढ़े 13 लाख में बेच दिया था.

हालांकि हबीब तनवीर को क़रीब से जानने वाले रंगकर्मी जलील रिजवी इस दावे से इत्तेफाक़ नहीं रखते. वह कहते हैं कि मकान हबीब तनवीर का नहीं उनके घरवालों के किसी अजीज मालगुज़ार का था और हबीब तनवीर के इंतकाल के बाद उनके घरवालों ने यह मकान मौजूदा मालिक को वापस कर दिया.

हबीब तनवीर की पैदाइश बैजनाथ पारा के इसी मकान में 1 सितंबर को हुई थी. अब यह मकान एक खंडहर में तब्दील हो चुका है. रंगमंच की दुनिया से जुड़े लोग और हबीब तनवीर के दीवाने यह जर्जर मकान आज भी देखने आते हैं जहां रहकर हबीब ने अपने फन से अपने सूबे छत्तीसगढ़ का नाम रौशन किया.

कमोबेश रंगमंच की पूरी दुनिया मानती है कि तनवीर साहब ने बड़े जतन के साथ छत्तीसगढ़ को देश-विदेश में ख्याति दिलाई. लिहाज़ा, छत्तीसगढ़ सरकार को उनकी पारिवारिक और सांस्कृतिक विरासत को संभालने की कोशिश करनी चाहिए.

मकान से जुड़ी यादें

हबीब तनवीर के मकान का अंदरूनी हिस्सा (Rajkumar Soni )

कपड़े के बुज़ुर्ग कारोबारी प्यारे भाई याद करते हैं- 'हबीब साहब जब कभी भी दिल्ली से रायपुर आते तो बैजनाथ पारा के मकान के बड़े से आंगन में नाटकों का रिहर्सल किया करते थे. वे कभी खाली नहीं रहते थे. कोई न कोई उन्हें घेरे ही रहता था. प्यारे बताते हैं, 'जब देश-विदेश के लोग और बड़े-बड़े अफसर उनसे मिलने आया करते थे तो हमें अपने पड़ोसी होने पर फक्र होता था.

हबीब तनवीर के मशहूर नाटक चरणदास चोर के एक शो में फकीर का किरदार निभाने वाले सैय्यद परवेज एक पान की दुकान चलाते हैं. उनके मुताबिक जब वे 16 साल के थे, तब एक रोज उन्होंने हबीब साहब से अपने मन की बात कही और उन्हें फकीर का रोल थमा दिया गया.

प्यारे भाई (Rajkumar Soni)

परवेज बताते हैं कि तनवीर साहब जब भी बैजनाथ पारा के मकान में रहने के लिए आते थे, तब-तब उन्हें लाने और ले जाने के लिए एक सफेद एबेंसडर नुक्कड़ पर खड़ी रहती थी. बहुत बाद में पता चला कि उन्हें सरकार की तरफ से एबेंसडर कार प्रोटोकाल के तहत दी जाती थी.

घर का आंगन जहां हबीब तनवीर अपने साथियों के साथ नाटक का रिहर्सल किया करते थे. (Rajkumar Soni )

एक और पड़ोसी मोहम्मद अली रहमान अपने घर की छत से नाटकों की रिहर्सल देखा करते थे. हबीब साहब ने उन्हें भी नाटक खेलने का मौक़ा दिया. रहमान कहते हैं, 'उनकी यादें गुल्लक में जमा उन सिक्कों की तरह हैं जो वक्त पर काम आती हैं. जब कभी मायूसी घेरती है तो हबीब साहब की कही एक बात याद आती है, 'जो थियेटर करता है वो अंधेरे से लड़ना जानता है'.

सरकारों को क्या मतलब?

पंडवानी गायक पूनाराम निषाद के घर पर हबीब तनवीर. पूनाराम भी अब इस दुनिया में नहीं हैं. (Rajkumar Soni)

साहित्यकार अशोक बाजपेयी कहते हैं कि तनवीर देश के पहले ऐसे रंगकर्मी हुए जिन्होंने इस धारणा को ध्वस्त कर दिया था कि भारतीय लोक कलाएं पिछड़ी हुई हैं. तनवीर ने छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में रहने वाले कम पढ़े-लिखे लोक कलाकारों को साथ लेकर नया थियेटर तैयार किया और देश-दुनिया में घूम-घूमकर यह बताया कि 'लोक' के बगैर जीवन की कल्पना अधूरी है. उन्होंने आधुनिकता में भी लोकरंजक तत्वों को बचाए रखा और ऐसा बेजोड़ काम पेश किया कि दुनिया हक्का-बक्का रह गई. यह दुर्भाग्य है कि भाजपा की सरकारें तनवीर को इसलिए याद नहीं करती क्योंकि वे एक वर्ग विशेष से हैं.

हबीब पर कविता

थियेटर वर्कशॉप में हबीब तनवीर (Rajkumar Soni )

साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल हबीब तनवीर को याद करते हुए बताते हैं कि जिस जगह पर रहते थे वहीं एक हेयर कटिंग करने वाला शख्स भी रहता था. बहुत बाद में पता चला कि जो हेयर कटिंग करता है वह हबीब तनवीर के थियेटर का उम्दा कलाकार है.

हेयर कटिंग करने वाले शख्स की बेजोड़ प्रतिभा को देखकर लगा कि हर आदमी के भीतर कुछ खास होता है बशर्ते उसे कोई पहचानने वाला हो. आम तौर पर घर से बेहद कम आवाजाही करने वाले शुक्ल इस बात की भी खुशी जाहिर करते हैं कि उनका घर से बाहर निकलना भी तनवीर और उनके नाटकों की वजह से हुआ था.

वे याद करते हैं, ' राजनांदगांव और दुर्ग के बीच मुड़ीपार नाम का छोटा-सा गांव है. मैं रेलगाड़ी में बैठकर उनका नाटक देखने के लिए मुड़ीपार तक गया था. मेरी जिंदगी में उनका और उनके काम का आकर्षण कभी खत्म नहीं हुआ. हकीकत यह है कि जितना हम हबीब तनवीर के नाटकों को देखते हैं उतना ही हमारा परिचय भीतर की दुनिया से भी होते चलता है. तनवीर ने अपनी संस्था के जरिए लोक कलाकारों को ताकत तो दी है दुनिया को भी एक दृष्टि दी. छत्तीसगढ़ की पहचान को हबीब के नाक-नक्श की पहचान है. शुक्ल ने तनवीर पर एक कविता भी लिखी है-

बात राजधानी और हबीब तनवीर की

दिल्ली को छोड़ा तो भोपाल गए

आदतन उनके पीछे छत्तीसगढ़ गया

उनके इस छत्तीसगढ़ का कोई अलग प्रांत नहीं बना

और न रायपुर राजधानी

एक संसार बना हो

जहां दर्शक होने की नागरिकता में

पासपोर्ट के बदले नाटक की टिकिट हो

और जिनको टिकिट नहीं मिली

उन सबने छत्तीसगढ़ी में नाटकीयता से कहा हो-

कि नाचा ह संसार हवे

जेखर मैं संसारी

नाटक के टिकिस नहीं मिलिस

मैं हो गेंव बैरागी

जब हबीब तनवीर

तीन दिन के लिए

अपने घर रायपुर बैजनाथ पारा आए

तो तीन दिन के लिए छत्तीसगढ़ भी रायपुर आया

सड़क पर देखते ही मैं चिल्लाया-

कतेक दिन बाद दिखे हस

मैं तो दर्शक हूं

पूरे परिवार के साथ दर्शक

सभी प्रत्येक दर्शक

कि छत्तीसगढ़ की जनसंख्या दर्शक जनसंख्या है

 

जब नाटकों का उस्ताद नहीं रहा तो...

तनवीर की बेटी नगीन तनवीर कहती हैं, पहले की तुलना में अब काफी बदलाव आ गया है. अब नाटक करने के लिए कलाकार नहीं मिलते. पिता नाटकों के उस्ताद थे, लेकिन जब उस्ताद ही नहीं रहे फिर फर्क नजर आना स्वाभाविक है. वैसे भी जो चीज आज है वह कल नहीं रहने वाली. पिता ने जो आखिरी नाटक खेला था वह राजरक्त था. अभी हाल के दिनों में इसका मंचन उत्तराखंड में किया गया. बस जैसे-तैसे चल रहा है नया थियेटर.

हबीब तनवीर की डायरी

चरणदास चोर में हबीब तनवीर के साथ अनूप रंजन पांडेय (Rajkumar Soni )

संगीत नाटक अकादमी सम्मान से सम्मानित रंगकर्मी राजकमल नायक भी मानते हैं कि छत्तीसगढ़ अगर देश-विदेश में जाना गया तो उसके पीछे हबीब तनवीर का थियेटर ही था. नायक कहते हैं, 'जब नाटक चरणदास चोर ने इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल में पहला पुरस्कार जीता तब लोगों को मालूम हुआ कि छत्तीसगढ़ क्या है? राजकमल बताते हैं कि तनवीर साहब ने जीवनभर केवल और केवल थियेटर को ही वक़्त दिया. वे 24 घंटे थियेटर की डयूटी करते थे.

हबीब के नाटक 'जादूगर कलाकार' और 'हिरमा की अमर कहानी' में अभिनय कर चुके गनौदवाले फिलहाल तनवीर साहब की रंगयात्रा पर एक किताब लिखने की तैयारी कर रहे हैं. गनौदवाले कहते हैं कि अगर कोई तनवीर के पूरे जीवन को समझना चाहता है तो उनकी डायरी का अध्ययन जरूर करना चाहिए. एक बार जब मोनिका मिश्रा (हबीब तनवीर की धर्मपत्नी होने से पहले का नाम) के परिजनों ने तनवीर से शादी के ख्याल के बारे में पूछा तो तनवीर ने डायरी निकालकर बताया कि अमुक-अमुक तारीख को तो नाटकों का मंचन है. तनवीर साहब ने जिस डेट में स्वयं को फुरसत में बताया उस रोज शादी कर ली.

गनौदवाले के मुताबिक तनवीर की जिंदगी के तीन बड़े पार्ट है. उनका सबसे बड़ा पार्ट है उर्दू में उनकी शेरों-शायरी जिसका जिक्र बहुत कम होता है. दूसरा हिस्सा उनके डायरी लिखने से जुड़ा हुआ है. तनवीर अपने प्रत्येक काम का लेखा-जोखा डायरी में रखा करते थे. तीसरा बड़ा पार्ट नाटकों में उनके लिखे हुए गीत भी हैं जिसकी चर्चा बहुत कम होती है. उनका हर गीत एक बड़े नाटक का विस्तार भी है. 

लड़खड़ता नया थियेटर

हबीब तनवीर की भांजी नसरीन (Rajkumar Soni)

बस्तर बैंड के संचालक अनूपरंजन पांडे हबीब तनवीर के कई मशहूर नाटक मुद्राराक्षस में चंद्रगुप्त, चरणदास चोर में पुरोहित, आगरा बाजार में बेनीप्रसाद, राजरक्त में नक्षत्र राय और देख रहे हैं नयन में एक तांगेवाले का किरदार अदा कर चुके हैं. वे बताते हैं कि तनवीर के नाटकों में एक वैश्विक दृष्टि थी जिसके चलते विदेशों में भी मंचन के दौरान दर्शकों के समक्ष भाषा की दिक्कत नहीं होती थी. उनका नाटक जब भी विदेशों में खेला जाता था तो दर्शक पात्रों से गले लगकर रोते थे और खुश होते थे.  वे अगर संस्कृत भाषा का नाटक भी खेलते थे तो भी उसमें एक फोर्स नजर आता था. अनूप कहते हैं कि फिलहाल हबीब का नया थियेटर लड़खड़ाते हुए चल रहा है.

 

First published: 31 August 2017, 12:22 IST
 
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