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हंदवाड़ा विवाद: लड़की की मां का विरोधाभासी बयान, कहा सैनिक ने छेड़छाड़ की थी

कैच ब्यूरो | Updated on: 18 April 2016, 14:42 IST
QUICK PILL
  • लड़की की मां ने कहा कि मेरी बेटी शौचालय गई थी, तभी उसने आहट सुनी कि सेना का एक जवान अंदर घुसने की कोशिश कर रहा है.
  • खुद लड़की ने भी अपने साथ किसी तरह की छेड़छाड़ से इनकार किया था. उसके बाद केंद्रीय रक्षा मंत्रालय और गृह मंत्रालय इन आरोपों का खंडन कर चुके हैं कि उस किशोरी के साथ सुरक्षा बल के किसी जवान ने छेड़खानी की कोशिश की थी.

बुधवार को सेना की गोलीबारी में हंदवाड़ा में तीन लोगों की जान चली गई. इनमें दो युवक और एक महिला शामिल थी. सेना के जवान द्वारा कथित तौर पर एक स्कूली लड़की से छेड़छाड़ की खबर ने विरोध प्रदर्शनों को और भड़का दिया.

गोलीबारी में मारे गए लोगों की खबर व्हाट्सएप और सोशल साइटों के जरिए तेजी से फैल गई. वीडियो में जिस कथित लड़की के साथ छेड़छाड़ की बात हो रही है उसका चेहरा छिपाया नहीं गया है. उसने छेड़छाड़ की बात से इनकार करते हुए कहा किसी लड़के ने उसे थप्पड़ मार दिया था.

सेना के जवान ने उससे छेड़छाड़ नहीं की थी. लड़की ने यह आराेप लगाया कि जब वह आर्मी बंकर के पास बने एक सार्वजनिक शौचालय में गई तो कुछ लड़कों ने खुद ही चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया था.

लेकिन बढ़ते विरोध-प्रदर्शनों के बीच दो और युवक मारे जा चुके हैं और लड़की को अपने पिता एवं आंटी के साथ पुलिस हिरासत में रखा गया है. उसकी मां ने सार्वजनिक अपील की कि उन्हें रिहा कर दो, लेकिन उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई.

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मानवाधिकार संगठन कॉलिशन ऑफ सिविल सोसायटी की लीगल टीम ने लड़की से बात करने की कोशिश की तो उसे भी इजाजत नहीं मिली. इतना ही नहीं, पुलिस ने लड़की की मां की श्रीनगर में आज प्रस्तावित प्रेस कांफ्रेंस को भी रद्द करवा दिया.

कॉलिशन ऑफ सिविल सोसायटी ने लड़की से बात करने की कोशिश की, लेकिन उसे इजाजत नहीं मिली

प्रेस कांफ्रेंस 11 बजे सीएसएस के कार्यालय में प्रस्तावित थी, लेकिन पुलिस ने उसे घेर लिया और मीडिया को प्रवेश से रोक दिया गया. बाद में सीएसएस ने लड़की की मां का वीडियो प्रेस को जारी किया जिसमें वह अपनी बेटी के बयान का खंडन कर रही हैं और कह रही हैं कि असल में सेना के एक जवान ने ही मेरी बेटी से छेड़छाड़ की कोशिश की थी.

क्या कहा लड़की की मां ने

कैच न्यूज़ के साथ एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में लड़की की मां ने कहा, “मेरी बेटी शौचालय गई थी, तभी उसने आहट सुनी कि सेना का एक जवान अंदर घुसने की कोशिश कर रहा है. वो चिल्लाई. इससे आसपास के दुकानदार सतर्क हो गए और उन्होंने हल्ला कर दिया. इसके बाद कुछ युवक घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्हें गुस्सा आ गया, उन्होंने मेरी बेटी को बचाने की कोशिश की और विरोध करना शुरू कर दिया. इसके बाद में पुलिस और सेना की गोलीबारी में पांच लोगों की मौत हो गई. मैं बेहद बिखरी और डरी हुई महसूस कर रही हूं. मुझे बहुत दुख है, वो मेरे परिवार का भी एक हिस्सा थे.”

उन्होंने आगे बताया कि घटना के बाद से ही मेरी बेटी पुलिस हिरासत में है.

वे कहती हैं, “वे न तो मेरी बेटी, उसके पापा या आंटी को छोड़ रहे हैं और न ही किसी को उनसे मिलने दे रहे हैं. हम उन्हें कॉल करने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनके मोबाइल फोन बंद हैं. उसके पापा ने यह बताने के लिए एक बार फोन किया था कि वे ठीक हैं. उन्होंने इससे ज्यादा कुछ नहीं कहा.”

जब लड़की की मां से उस वीडियो बयान के बारे में पूछा जो उनकी बेटी ने दिया था तो उनका कहना था कि शायद उनकी बेटी ने वह बयान दबाव में दिया होगा. उन्होंने कहा, “कौन जानता है पुलिस स्टेशन में क्या हुआ. उसे ऐसा कहने के लिए मजबूर किया गया होगा.”

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हालांकि पुलिस का कहना है कि लड़की की सुरक्षा के लिए उसे हिरासत में रखना जरूरी था. उत्तरी कश्मीर के डीआईजी उत्तम चंद ने कहा, “वह पुलिस हिरासत में है. उसका परिवार हमारे पास सुरक्षा मांगने आया था. हम किसी भी ऐसे आदमी को सुरक्षा देने से इनकार नहीं कर सकते, जिसे खतरा महसूस हो रहा हो.”

लेकिन लड़की की मां पुलिस के इस तर्क से रजामंद नहीं है. उसने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है कि उसकी नाबालिग बेटी को अधिकारियों ने 13 अप्रैल से "अवैध हिरासत” में रखा है.

याचिका पर अदालत ने हंदवाड़ा के पुलिस अधीक्षक और हंदवाड़ा पुलिस थाने के थाना प्रभारी को निर्देश दिए हैं कि "वे यह बताएं कि किस कानून और अधिकार के तहत उन्होंने एक नाबालिग लड़की, उसके पिता और आंटी को पुलिस हिरासत में रखा है.”

हालात 2010 की ओर

इस बीच, घाटी के अन्य हिस्सों में भी विरोध-प्रदर्शन फैल गया है. पुलिस और सेना की गोलीबारी से हुई मौतों का विरोध करने के लिए युवाओं का समूह श्रीनगर के निचले इलाकों, बारामूला, गांदरबल और पुलवामा में सड़कों पर उतर आया है. इसने राज्य के शहरी केंद्रों को भारी सुरक्षा में बंद करने के लिए मजबूर कर दिया.

ग्रामीण इलाकों से भी विरोध-प्रदर्शन की खबरें आ रही हैं. गांदरबल जिले के गांव बारसू में पथराव करते युवाओं की भीड़ को तितर-बितर करने में पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ी.

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केंद्र सरकार ने घाटी में अर्धसैनिक बलों के अतिरिक्त 3,600 जवान और तैनात करने का निर्णय लिया है. इनमें से 12 टुकडि़यां शनिवार को राज्य में पहुंच गईं. 24 अन्य टुकड़ियां रविवार तक पहुंच जाएंगी.

अतिरिक्त बल भेजने का निर्णय दिल्ली में हुई एक उच्च-स्तरीय बैठक में लिया गया. बैठक की अध्यक्षता वित्त सचिव रतन पी वाटल ने की, जिनके पास केंद्रीय गृह सचिव का अतिरिक्त प्रभार है.

बैठक में इंटेलीजेंस ब्यूरो, रक्षा मंत्रालय, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल और गृह विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया.

घाटी पहले ही अलगवावादियों द्वारा घोषित हड़ताल के कारण कश्मीर पांच दिन से बंद है. सरकार ने वहां इंटरनेट भी बंद कर दिया ताकि हंदवाड़ा या राज्य के अन्य हिस्सों में हो रहे प्रदर्शनों के वीडियो और तस्वीरें फैलाने पर रोक लगाई जा सके.

सरकार ने हंदवाड़ा में इंटरनेट बंद कर दिया ताकि प्रदर्शनों के वीडियो और तस्वीरें फैलाने पर रोक लगाई जा सके

हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में युवा फेसबुक और ट्वीटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों से जुड़े हैं ताकि वे राज्य के बदलते हालात के बारे में अपने विचार दुनिया तक पहुंचा सकें.

इंटरनेट पर कई फोरम और ग्रुप हैं जो मौजूदा मसलों पर चर्चा करते हैं और अपनी खुद की तीखी बहस पैदा कर रहे हैं. घटनाओं और मीडिया द्वारा दी जा रही सामग्री का अतिवादी विश्लेषण हो रहा है, उन्हें तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है.

इस बहस का रुख स्पष्ट रूप से भारत-विरोधी होता है. लोगों की हत्या और नेशनल मीडिया के एक हिस्से में इन घटनाओं को कवरेज न मिलने के कारण भारत विरोधी भावना को और हवा मिली है.

एनआईटी श्रीनगर में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज की घटना को भी कुछ चैनलों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने से भी भारत-विरोधी भावना प्रबल हुई है.

दृश्य से महबूबा अदृश्य

बिगड़ती स्थिति ने मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को अपने कार्यकाल की शुरुआत में ही गंभीर संकट में ला खड़ा किया है. उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह और रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर के साथ घबराहट भरी बैठकों से धरातल पर कुछ भी हासिल नहीं हुआ है. अब तक कमोबेश वे इस पूरे विवाद में कोई गंभीर सकारात्मक भूमिका नहीं निभा सकी हैं.

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सुरक्षा बलों द्वारा भीड़ से निपटने में संयम और मानकों के पालन का वादा करने के बावजूद वह खुद को अकेला पा रही हैं और विरोध-प्रदर्शन कर रहे युवाओं की हत्याओं को रोक नहीं पा रहीं.

बुधवार को तीन लोगों की हत्या के एक दिन बाद नॉर्दर्न आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा और चिनार कॉर्प्स कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ ने हंदवाड़ा का दौरा किया और पहले से घोषित जांच को जल्द पूरा करने को कहा. लेकिन उसके बाद भी सुरक्षा बलों की गोली से दो और लोग मारे जा चुके हैं और 26 घायल हुए हैं.

इस मामले में एक समयबद्ध जांच का आदेश दिया जा चुका है, फिर भी ऐसी संभावना कम है कि कानून अपना काम सामान्य ढंग से कर पाएगा. कश्मीर में सेना को आफ्सपा का संरक्षण मिला हुआ है और आरोपी जवानों पर तब तक सामान्य आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती जब तक कि गृह मंत्रालय इसकी अनुमति न दे दे.

अतीत में ऐसा बहुत ही कम ही हुआ है जब सैनिकों पर कार्रवाई हुई हो. महबूबा कम से कम इतना तो कर ही सकती हैं कि वे आगे किसी भी हत्या को हक कीमत पर रोक दें.

यदि महबूबा ऐसा करने में विफल रहीं तो घाटी के एक बार फिर उसी तरह के संघर्ष में फंसने का खतरा है, जैसा 2010 में देखने को मिली था. तब पांच महीने चली उठापटक में करीब 120 लोगों की जान चली गई थी. उसके लिए भी आजतक किसी पुलिसवाले या सुरक्षाबलों के जवान को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सका है.

First published: 18 April 2016, 14:42 IST
 
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