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हैप्पी बर्थडे थलाइवा! रजनीकांत की राजनीतिक एंट्री का सही वक्त?

शान सेबस्टियन | Updated on: 13 December 2016, 7:36 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • तमिलनाडु की राजनीति से अभी-अभी एक जन नेता जयललिता का देहावसान हुआ है. उनके गुज़र जाने से मानों एक बड़े नेता की जगह खाली हो गई है. 
  • राज्य में इसकी अटकलें तेज़ हो गई हैं कि क्या सुपर स्टार रजनीकांत के लिए राजनीति में आने का यही सही वक्त है? 

आमतौर पर 12 दिसम्बर का दिन तमिलनाडू के कोयम्बटूर के 44 वर्षीय ऑटो चालक आनंद के लिए बहुत थकावट भरा होता है. वह जिंदगी भर रजनीकांत यानी थलाइवा की पूजा करते आए हैं. थलाइवा यानी बॉस या यूं कहें बॉस यानी थलाइवा सुपरस्टार रजनीकांत आज 66 साल के हो गए. आनंद की तरह ही रजनीकांत के देश दुनिया में लाखों फैन्स हैं. आनंद के लिए या तो रजनीकांत की मूवी रिलीज का दिन सबसे अहम होता है या उनका जन्म दिन. 

तमिलनाडु में रजनीकांत के जन्म दिन का मतलब है मोटरबाइक पर बड़ी-बड़ी रैलियां. रथ की ही तरह ट्रकों को सजा कर उन पर रजनीकांत के बड़े-बड़े पोस्टर और उन पर बर्थ डे मनाने के दृश्य इस दिन पूरे तमिलनाडु में दिखाई देना आम है. कुछ फैन्स ऐसे भी हैं जो इस दिन रक्तदान शिविर लगाते हैं, वृद्धाश्रम जाते हैं, वहा के लोगों को खाना खिलाते हैं. स्कूली बच्चों को कॉपियां बांटते हैं, क्योंकि उनके सुपरस्टार रजनी कांत भी बिना किसी दिखावे के ऐसा दान-पुण्य का काम करते ही रहते हैं.

हालांकि इस साल 12 दिसम्बर का दिन कुछ अलग है, क्योंकि रजनीकांत ने अपने प्रशंसकों से कहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री जे.जयललिता के निधन के कारण चूंकि तमिलनाडु में 7 दिन का शोक है, इसलिए वे उनका जन्मदिन न मनाएं.

क्या यही वक्त है?

एक सवाल सबके दिमाग में, चल रहा है कि क्या यही सही वक्त है? तमिलनाडु ने हाल ही अपनी एक नेता खोई है, जिसके अनगिनत समर्थक रहे और वे आज भी लोगों के दिलों में बसती हैं. तो क्या अब रजनीकांत की बारी है? वे उस खाली स्थान को भरें, जो जयललिता जैसी जन नेता ने खाली किया है.

चेन्नई में रजनीकांत के एक प्रशंसक जगदीश कुमार ने कहा, ‘हमने हाल ही एक महान नेता खोया है, हमें ऐसे नेता की जरूरत है जो सामाजिक हो और राज्य को सही दिशा में आगे ले जाए. केवल थलाइवा ही ऐसा कर सकते हैं. 

सालों से रजनी कांत के राजनीति में आने को लेकर अटकलें लगाई जाती रही हैं. 1996 के विधानसभा चुनावों में रजनीकांत ने अन्नाद्रमुक गठबंधन को खारिज करते हुए कहा था कि अगर जयललिता को फिर से चुना जाता है तो भगवान ही तमिलनाडु को बचा सकते हैं. राज्य में इससे पहले शायद ही किसी ने किसी राजनेता पर ऐसी कड़ी टिप्पणी की हो.

नतीजा यह रहा कि द्रमुक-तमिल मनीला कांग्रेस ने चुनाव जीता. रजनीकांत के शब्द शायद जयललिता के लिए एंटी इनकम्बैंसी का काम कर गए, इसके अलावा उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और उनके स्वयं को अत्यधिक उच्च स्तर पर मानने के चलते जनता ने उन्हें नकार दिया. इसे रजनीकांत के प्रदेश की राजनीति के बारे में समझ का एक संकेत माना जा सकता है.

दशकों से तमिलनाडु में या तो द्रमुक की सरकार बनती है या अन्ना द्रमुक की. रजनीकांत के फैन्स चाहते हैं कि या तो वे इन दोनों में से किसी एक पार्टी में शामिल हों या अपनी अलग पार्टी बना कर राजनीति में आएं.

ऑन से ऑफ स्क्रीन

तमिलनाडु में सिनेमा और राजनीति का आपस में काफी गहरा संबंध है. अन्नाद्रमुक गठित करने वाले एम जी रामचंद्रन से लेकर जयललिता तक तमिलनाडु के दो सफल मुख्यमंत्री सिनेमाई पृष्ठभूमि से ही आए हैं. दोनों दक्षिण भारत के काफी लोकप्रिय एक्टर रहे. इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री के. करूणानिधि सिने जगत में गीतकार रह चुके हैं. ऐसे और कई उदाहरण मिल जाएंगे.

इसी कड़ी में नया नाम अभिनेता विजयकांत का है. सिल्वर स्क्रीन पर बड़े नायक का किरदार निभाने वाले विजयकांत ने 2005 में डीएमडीके का गठन किया जो 2011 में आधिकारिक विपक्षी दल बना. अतीत में ऐसे काफी उदाहरण मिल जाएंगे जब कम लोकप्रिय स्टार भी राजनीति में उतरे हैं तो फैन्स का क्या दोष अगर वे रजनी को राजनीति के रथ पर सवार होते देखना चाहते हैं?

चेन्नई के एक राजनीतिक विश्लेषक सुमन्त रमन का मानना है ‘हो सकता है रजनीकांत अब उतने प्रभावी राजनेता ना साबित हों, जो राजनीतिक गोटियां बदलने की महारत रखते हों,  जैसा कि वे 1990 व 2000 में कर सकते थे. 

वे कहते हैं कि कहा नहीं जा सकता कि रजनीकांत अब राजनीति में उतरेंगे या नहीं, उनके पास पहले भी कई बार यह मौका आया है, भाजपा ने भी उन्हें अपनी पार्टी में शामिल होने का न्यौता दिया था. अब भी तमिलनाडु में खाता खोलने की कोशिश कर रही भाजपा के लिए रजनीकांत तुरूप का पत्ता साबित हो सकते हैं.

2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रजनीकांत से मुलाकात की थी तो राजनीतिक गलियारों में कुछ सुगबुगाहट हुई थी, उस वक्त रजनी ने इसे एक दोस्ताना मुलाकात करार दिया था.

रमन के अनुसार, चूंकि सुपरस्टार रजनीकांत के फैन तो हर पार्टी में हैं; ऐसे में किसी एक संगठन से जुड़ना अभिनेता रजनीकांत के फैन्स में कटौती कर सकता है, लेकिन यह जोखिम तो उन्हें लेना ही होगा. ‘जब तक अन्नाद्रमुक या द्रमुक में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं हो जाता तब तक रजनी के राजनीति में आने की संभावना कम ही है और दूसरा, उनका स्वास्थ्य भी शायद ही इसकी इजाजत दे, भले ही उनकी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा हो.’

चुपचाप करते हैं काम

पर्दे पर विलेन को धूल चटाने वाले रजनीकांत असल जिंदगी में बड़े-बड़े काम चुपचाप करते हैं. कावेरी जल विवाद के मामले में उन्होंने तमिलनाडु का साथ दिया जबकि कन्नड़ कार्यकर्ताओं ने उन पर अपने गृह राज्य का साथ नहीं देने का आरोप लगाया.

रजनीकांत ने 2002 में मिलयी और प्रायद्वीपीय नदियों को जोड़ने के लिए एक जन आंदोलन शुरू किया था लेकिन साथ ही जता दिया था कि उनकी मंशा राजनीतिक नहीं है.

2004 में उन्होंने पेयजल समस्या दूर करने के लिए नदियों को जोड़ने का वादा करने वाले अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन का समर्थन किया. 

रजनी के फैन आनंद जो गर्व से खुद को रजनी आनंत कहलवाना पसंद करते हैं. वे कहते हैं, ‘एमजीआर के बाद रजनीकांत ही तमिलनाडु के करिश्माई राजनेता साबित होंगे, देख लेना.’

आनंद कहता है राजनीति नहीं तो समाजसेवा के जरिये रजनीकांत तमिलनाडु में सबके बीच लोकप्रिय है. अपने फैन्स क्लब के जरिये वे उनके संबंधित क्षेत्रों में कई तरह की सामाजिक पहल कर चुके हैं, जैसे बस के लिए इंतजार करने वाले लोगों के लिए शेड बनाना, अनाथों की मदद करना, वृद्धाश्रम के लोगों की सहायता करना आदि.

आनंद भी चेट्टीपालयम, कोयम्बटूर में ऐसे ही एक फैन क्लब का सदस्य है, जिसका नाम है सुलयम सुरावली रजनीकांत फैन्स सोशल सर्विस एसोसिएशन. वह कहता है दस साल पहले तक वह रजनीकांत के जन्मदिन पर अनाथ बच्चों को खाना खिलाते थे. हालांकि अब इसमें कमी आ गई है.

अलग राय

रजनी के राजनीति में आने को लेकर सारे फैन्स एकमत हों, ऐसा नहीं है. पोलाची के रजनी फैन क्लब के एक सदस्य ने कहा रजनीकांत राजनीति से दूर ही रहें तो ज्यादा अच्छा होगा. रजनी आध्यात्मिक और शांत प्रकृति के व्यक्ति हैं जो राजनीति में शायद फिट न बैठे. 

चेन्नई के एक पत्रकार का कहना है कि रजनी अब शायद इसलिए राजनीतिक प्रभाव न बना पाएं क्योंकि उनके प्रशंसक या तो बूढ़े हो चले हैं या अधेड़ उम्र के हैं, जो कोई खास बदलाव नहीं कर सकते. असल जिंदगी में वे कबाली नहीं हैं; बहुत ही शर्मीले स्वभाव के हैं. कबाली में वे मलेशिया में तमिल विस्थापितों के हक के लिए लड़ते दिखाई देते हैं. 

उन्होंने यह मानने से भी इनकार कर दिया कि राज्य में कोई राजनीतिक रिक्त स्थान है; शशिकला अन्नाद्रमुक की नई नेता  और पार्टी उनके साथ है. इसलिए रजनी की राजनीतिक एंट्री की गुंजाइश कम ही है.

First published: 13 December 2016, 7:36 IST
 
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