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Happy Holi 2018: क्यों मनाई जाती है होली, क्या है इसका पौराणिक महत्व

सुहेल खान | Updated on: 1 March 2018, 12:25 IST

रंगों का त्योहार होली इस साल 2 मार्च यानि शुक्रवार को मनाया जाएगा. इससे एक दिन पहले होलिका दहन किया जाएगा. हिन्दू कलैंडर के अनुसार होली हर साल फाल्गुन महीने की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है. इस दिन हुरियारे जमकर एक दूसरे पर रंग गुलाल फेंकते हैं और भांग वाली ठंडाई पिलाते हैं.

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हमारे देश में मनाए जाने वाले सभी त्योहारों का कोई ना कोई इतिहास रहा है. भारत के अन्य त्यौहारों की तरह होली भी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. प्राचीन पौराणिक कथा के अनुसार होली से हिरण्यकश्यप की कहानी जुड़ी है.

क्या है होली का इतिहास

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में भारत में हिरण्यकश्यप नाम का एक राजा राज्य करता था. इसके लक्षण राक्षसों जैसे थे. भगवान विष्णु ने इसके एक भाई को मार दिया था. इसलिए वह भगवान विष्णु से बदला लेना चाहता था. ताकत पाने के लिए उसने सालों तक प्रार्थना की. आखिरकार उसे वरदान मिल गया.

लोगों से कराना चाहता था अपनी पूजा

उसके बाद हिरण्यकश्यप खुद को भगवान समझने लगा. उसने लोगों से कहा कि वो उसकी पूजा करें. इस दुष्ट राजा का एक बेटा था. जिसका नाम प्रहलाद था. वह भगवान विष्णु का परम भक्त था. प्रहलाद ने अपने पिता का कहना कभी नहीं माना. वह भगवान विष्णु की पूजा करता रहा. इससे हिरण्यकश्यप अपने बेटे से नाराज रहने लगा.

प्रहलाद को मारने का लिया निर्णय

उसने अपने बेटे को मारने का निर्णय किया. उसने अपनी बहन होलिका से कहा, कि वो प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए. बता दें कि होलिका आग में जल नहीं सकती थ, लेकिन उसकी योजना सिर्फ प्रहलाद को जलाने की थी. मगर वह अपनी योजना में सफल नहीं हो सका.

भगवान विष्णु का नाम लेता था प्रहलाद

प्रहलाद हर समय भगवान विष्णु का नाम लेता रहा. इसीलिए वह आग में नहीं जला और हिरण्यकश्यप की बहन होलिका आग में जलकर राख हो गई. होलिका की ये हार बुराई के नष्ट होने का प्रतीक है. इसके बाद भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया. होली से इसी होलिका की मौत की कहानी जुड़ी है. उसके बाद हर साल भारत में फाल्गुन महीने की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है. जो बुराई के अंत के प्रतीक का प्रतीक है.

होली से कैसे जुड़ा रंग और गुलाल

यह कहानी भगवान विष्णु के अवतार भगवान कृष्ण के समय की बताई जाती है. माना जाता है कि भगवान कृष्ण रंगों से होली मनाते थे. इसलिए होली का यह तरीका लोकप्रिय हुआ. वे वृंदावन और गोकुल में अपने साथियों के साथ होली मनाते थे. भगवान कृष्ण पूरे गांव में शैतानियां करते थे. आज भी वृंदावन जैसी मस्ती भरी होली कहीं नहीं मनाई जाती.

होली पर किसान अच्छी फसल की करते हैं कामना
होली बसंत का त्यौहार है. होली के बाद सर्दियां खत्म हो जाती है और बसंत ऋतु का आगमन हो जाता है. कुछ हिस्सों में इस त्यौहार का संबंध बसंत की फसल पकने से भी है. किसान अच्छी फसल पैदा होने की खुशी में होली मनाते हैं. होली को ‘बसंत महोत्सव’ या ‘काम महोत्सव’ भी कहा जाता है.

First published: 1 March 2018, 12:25 IST
 
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