Home » इंडिया » Happy Teacher's Day: Meet Dr. IA Khan from Meerut who taught 30,000 needy children free of cost
 

मिलिए 30 हजार जरूरतमंदों को मुफ्त तालीम देने वाले डॉ. आईए खान से

सौरभ शर्मा | Updated on: 4 September 2016, 13:22 IST

आज के बाजारीकरण के दौर में जहां शिक्षा कॉरपोरेट व‌र्ल्ड के हाथों में आ गई है. बड़े उद्योगपति अपने रुपये को एजुकेशन सेक्टर में डालकर मोटी कमाई करने में जुटे हुए हैं. ऐसे में एक व्यक्ति भी है जो शिक्षा का दान करता है. वो भी हर तबके के बच्चों को. यहां तक कि जिन बच्चों को हम अपने पास तक फटकने नहीं देते, उन्हें गले लगाता है. उन्हें पढ़ाता है. उन्हें जीवन जीने की कला और अपने पैरों पर खड़े होने राह देता है. 

जी हां, ऐसे व्यक्तित्व का नाम है डॉ. आईए खान. 70 यूपी एनसीसी वाहिनी में कप्तान और मेरठ स्थित फैज-ए-आम इंटर कॉलेज में केमिस्ट्री के विभागाध्यक्ष डॉ. खान 25 साल से अधिक समय से बच्चों को कोचिंग के जरिये फ्री एजुकेशन देने के साथ गरीब बच्चियों को पढ़ा रहे हैं. शिक्षक दिवस के मौके पर ऐसे शिक्षक के जीवन संघर्ष और संकल्प के बारे में जानिए उन्हीं की जुबानी.

पिछले 27 सालों का सफर

जब मैंने अपनी पीएचडी पूरी की तो मेरे पास ओमान और कुवैत में केमिस्ट के तौर पर ऑफर आया था. पिता की मृत्यु के बाद मुझे यहीं रुकना पड़ा और फैज-ए-आम ज्वाइन कर लिया. उसके बाद से मैंने बच्चों को कॉलेज के बाद पढ़ाना शुरू कर दिया. 

मैंने सबसे पहले 60 बच्चों के साथ श्रद्धापुरी से शुरुआत की. मैंने वहां काफी सालों तक पढ़ाया. फिर मैं आबूलेन में आ गया. सन 2000 में आबूलेन में पढ़ाते हुए कुछ बच्चों ने देखा. वो बच्चे भीख मांगने वाले, कूड़ा बीनने वाले और अनाथ थे. फिर मैंने निश्चय किया कि अब इन्हें भी रास्ते पर लेकर आऊंगा.

350 से अधिक बच्चों की चल रही है पढ़ाई

फिर मैंने ऐसे बच्चों को तलाश करना शुरू कर दिया. कई लोगों से इन बच्चों के बारे में पूछा. फिर मैं आशियाना कॉलोनी, जाहिदपुर और लोहियानगर, अंबेडकर आवासीय योजना में रहने वाले लोगों के यहां गया. वहां के बच्चों को एकत्र किया. फिर चाहे वो लड़के हों या फिर लड़कियां. 

वहां के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. खासकर लड़कियों को. आज के समय में मेरे पास करीब 350 लड़कियां हैं, जिन्हें मैं पढ़ा भी रहा हूं और उन्हें वो बाकी काम, जिनसे वो अपना पेट पाल सकें, सिखाने की कोशिश कर रहा हूं.

दिखाई दे रहा है 'एफर्ट'

अब मैंने इन बच्चों को एक बैनर नीचे लाने का काम कर रहा हूं. मैंने 4 वर्ष पहले एफर्ट नाम की एक एकेडमी खोली थी. ये एकेडमी शताब्दी नगर सेक्टर- 11 में हैं. पहले हमारी एकेडमी सिर्फ एक कमरे में चल रही थी. अब मैंने वो 80 गज की जमन खरीद ली है. उसे मैंने तीन मंजिला तैयार कराया है. हर फ्लोर पर एक-एक हॉल है. एक लाइब्रेरी भी है, जहां बच्चे पढ़ाई करतेेे हैं. ऊपर स्पैरो हाउस भी बनाया गया. 

मैंने इसके लिए 42 लाख रुपए का लोन भी लिया है. इस एफर्ट हाउस में कोचिंग भी चल रही है. साक्षरता का भी काम चलेगा और स्कूल भी चलेगा. मेरी योजना है कि इस साल इसे आईटीआई का एफिलिएशन दिला दूं. वर्तमान में इस एकेडमी में बालिकाओं को विभिन्न तरह की शिक्षा दे रहे हैं. यहां हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, गणित, विज्ञान आदि विषयों के साथ ही बालिकाओं को सिलाई, कढ़ाई, श्रृंगार, खिलौने बनाने आदि की ट्रेनिंग दी जा रही है.

झेलना पड़ा काफी विरोध

जब ऐसे बच्चों को पढ़ना शुरू किया काफी विरोध झेला. आबूलेन और यहां शास्त्रीनगर के लोगों ने कहा कि ये बच्चे यहां क्यों आते हैं? ये बच्चे इलाके में चोरी करने लगेंगे. हमारे बच्चे भी इनकी तरह से बिगड़ जाएंगे. 

कुछ लोगों ने ऐसी बातें भी कहीं कि बयां करना तक मुश्किल है. मैं सिर्फ इतना ही कहता हूं कि चलो हम इन बच्चों को अपने बच्चों जैसा बनाते हैं, लेकिन मैंने इन बच्चों में कई माता-पिता के विरोध भी को भी झेला. काफी समझाने के बाद भी उन्होंने बच्चों को पढ़ाने की इजाजत दी.

नहीं ली किसी से मदद

बच्चों की पढ़ाई व अच्छी किताबें मुहैया कराने में मैंने आज तक किसी से कोई मदद नहीं ली. मैं हर महीने अपने वेतन का 80 से 85 प्रतिशत खर्च कर देता हूं. जो करीब 30 हजार रुपए प्रतिमाह होता है. हर साल करीब 1200 बुक्स बांट देता हूं. 

अगर मैं याद करूं तो अब तक 30 हजार से अधिक बच्चों को फ्री पढ़ा चुका हूं. जिनमें मलिन बस्तियां या पूर्व में कूड़ा उठाने वाल बच्चों की संख्या करीब 10000 हजार है. एकेडमी में पढ़ने वाले बच्चों की खास बात ये है कि यहां नाम नहीं लिखे जाते हैं. हर किसी का नाम एफर्ट है.

ये हैं अचीवमेंट्स

  • आईआईटी कानपुर में जुगनू सैटेलाइट बनाने वाली टीम मेंबर अनुराग मेरा स्टूडेंट है.
  • आईआईटी दिल्ली से एमटेक करने वाला सलीम मेरा स्टूडेंट है
  • सिटी के मशहूर आई सर्जन डॉ. शकील मेरे ही स्टूडेंट हैं.
  • डॉ. रूही अंसारी एमडी डॉक्टर हैं और केजीएमसी की टॉपर मेरी ही स्टूडेंट रही हैं.
  • एसडी सदर से ट्वेल्थ में यूपी बोर्ड में यूपी टॉप करने वाला स्टूडेंट तस्लीम अहमद भी मेरा ही स्टूडेंट रहा है.
  • एनसीसी निदेशालय ने राष्ट्रीय पुरस्कार देने के साथ ही 'वन मैन एनजीओ' के खिताब से भी नवाजा है.

First published: 4 September 2016, 13:22 IST
 
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