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हार्दिक-जिग्नेश-कन्हैया, डगमगायेंगे यूपी की नैया

दीक्षांत शर्मा | Updated on: 23 August 2016, 13:33 IST
QUICK PILL
  • जिग्नेश मेवानी, कन्हैया कुमार और हार्दिक पटेल के \'मिशन\' ने जितना परेशान मोदी सरकार को किया है उतना विपक्ष भी नहीं घेर पाया है.
  • इन युवा चेहरों के दम पर अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण बनाने और सियासत को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है. 
  • मौजूदा समय में इन तीनो में से कोई भी किसी राजनैतिक दल से नहीं जुड़ा हुआ है, लेकिन इनके साथ समर्थकों की अच्छी-खासी संख्या जुड़ी हुई है.

2014 लोकसभा चुनाव में युवाओं की अहम भूमिका बढ़चढ़ कर रही थी. 2014 के लोकसभा चुनावों में 15 करोड़ नए वोटर शामिल हुए थे जिनकी उम्र 18 से 23 साल थी. 

ऐसे में कुछ युवा चेहरे ऐसे भी हैं जिनके साथ युवाओं का एक बड़ा तबका जुड़ा है और यह तबका केंद्र सरकार के खिलाफ समय-समय पर आवाज उठता रहा है. जिग्नेश मेवानी, कन्हैया कुमार और हार्दिक पटेल के 'मिशन' ने जितना परेशान मोदी सरकार को किया है उतना विपक्ष भी नहीं घेर पाया है.

इन युवा चेहरों के दम पर अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण बनाने और सियासत को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है. मौजूदा समय में इन तीनो में से कोई भी किसी राजनैतिक दल से नहीं जुड़ा हुआ है, लेकिन इनके साथ समर्थकों की अच्छी-खासी संख्या जुड़ी हुई है.

ये तीनों नेता पिछले दो सालों में उभरे हैं. इन्होंने अपने-अपने समुदाय और समर्थक वर्ग को नए सिरे से जोड़ा है. गुजरात में हार्दिक पटेल ने ओबीसी एकता की मांग उठाई और वहीं जिग्नेश मेवाणी दलित चेतना जगाने के प्रयास में लगे हैं. कन्हैया कुमार ने दलितों के आरक्षण को लेकर छात्रों को गोलबंद किया.

यूपी चुनाव में बन सकती है तीनों की अहम भूमिका

राष्ट्रीय स्तर पर दलित की ताकत जुटाने के लिए जिग्नेश मेवानी अब पूरे देश में दौरा करेंगे. मेवानी ने दिल्ली में कई संगठनों से मुलाकात का प्लान बनाया है. 

मेवानी सोमवार को लखनऊ में थे. लखनऊ में मेवानी के आंदोलन से कई और लोग भी जुड़ रहे हैं. मेवानी का आगे केरल भी जाने का प्लान है. मेवानी इस कोशिश में लगे हैं कि 15 सितंबर को रेल रोको आंदोलन में उनके साथ पूरे देश से समर्थक गुजरात आएं, साथ ही अपने यहां भी आंदोलन करें और रेल रोकें.

वहीं कन्हैया को भी उनकी भूख हड़ताल से लेकर गिरफ्तारी तक छात्रों और युवाओं का जबर्दस्त समर्थन मिला था. उस समय दिल्ली में हो रही घटनाओं का प्रभाव प्रदेश के बड़े विश्विद्यालयों में दिखा था. लखनऊ से लेकर इलाहबाद तक छात्र नेता और प्रोफेसर कन्हैया के समर्थन में दिखे. हालांकि कुछ लोग उनके विरोध में भी नजर आए. ऐसे में अगर यूपी चुनाव को देखते हुए कन्हैया किसी पार्टी के समर्थन में उतरते हैं तो चुनावों पर निश्चित ही एक नया रंग चढ़ेगा.

हार्दिक पटेल की भूमिका अहम है. हाल ही में इसके भी संकेत दिए गए थे कि प्रदेश में होने वाले चुनावों में हार्दिक पीस पार्टी का प्रचार करेंगे. गुजरात में भाजपा सरकार एक बार हार्दिक पटेल के सामने नतमस्तक हो चुकी है और ऐसे में कोई भी राजनैतिक दल इन्हें हलके में लेने की गलती नहीं करेगा.

चुनावी माहौल में बड़ा उलटफेर

विधानसभा चुनाव से पहले सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए नई मुसीबत खड़ी हो सकती है. मौजूदा समय में दलित वोट के लिए उत्तर प्रदेश में होड़ लगी हुई है, चाहे वो बीजेपी हो, बीएसपी, समाजवादी पार्टी या कांग्रेस हो.

इतिहास पर नज़र डालें तो राजनीति और सामाजिक आंदोलनों के बीच लकीर धुंधली रही है. जयप्रकाश नारायण से लेकर वीपी सिंह तक और अरविन्द केजरीवाल से लेकर किरण बेदी तक सब या तो किसी राजनैतिक दल का चेहरा बन चुके हैं या अपनी पार्टी का अस्तित्व बना चुके हैं. ऐसे में अगर यह तीन चेहरे किसी राजनैतिक पार्टी की ओर रुख करते हैं तो चुनावी माहौल में बड़ा उलटफेर हो सकता.

आइये आपको बताते हैं इन तीनो में ऐसी क्या ख़ास बात जिसे लेकर ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं.

हार्दिक पटेल

गुजरात में पटेल समुदाय द्वारा ओबीसी दर्जे की मांग को लेकर जारी आरक्षण आंदोलन के युवा नेता हैं हार्दिक. इनकी मांग है कि ओबीसी दर्जे में पटेल समुदाय को जोड़कर सरकारी नौकरी और शिक्षा में आरक्षण मिलना चाहिए. मांगों और आंदोलन को लेकर हार्दिक को जेल भी हो चुकी है.

दरअसल उना में दलितों की पिटाई के बाद शुरू हुआ आंदोलन जिग्नेश मेवाणी के नेतृत्व में सफल रहा

अटकलें हैं कि इससे गुजरात में भाजपा को नुक्सान हो सकता है. राजनैतिक पंडितों का मत है कि पटेल आरक्षण का मुद्दा काफी आगे निकल चुका है. 

1985 से अधिकतर पाटीदार भाजपा के साथ खड़े थे लेकिन अब वे इससे छिटक सकते हैं. हाल ही में इसके भी संकेत दिए गए थे कि प्रदेश में होने वाले चुनावों में हार्दिक पीस पार्टी का प्रचार करेंगे.

हार्दिक पटेल का जन्म 20 जुलाई 1993 में अहमदाबाद में हुआ था. हार्दिक के पिता भूमिगत पानी के कुओं में नल लगाने का काम करते थे. वर्ष 2011 में हार्दिक सरदार पटेल समूह से जुड़े. जुलाई 2015 में हार्दिक की बहन, मोनिका गुजरात सरकार की छात्रवृत्ति प्राप्त करने में विफल रही. 

कहा जाता है कि इसी कारण उन्होंने एक पाटीदार अनामत आंदोलन समिति का निर्माण किया. जिसका लक्ष्य पाटीदारों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल करवाना और आरक्षण हासिल करना है.

जिग्नेश मेवानी

'गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी ज़मीन दो' इस नारे के साथ दलित अस्मिता यात्रा का नेतृत्व 35 वर्षीय जिग्नेश मेवानी ने किया. कुछ महीनों पहले तक जिग्नेश को अहमदाबाद के बाहर ज़्यादा लोग नहीं पहचानते थे. आज जिग्नेश देश भर के दलित नौजवानों का चेहरा बन चुके हैं. उनका संगठन उना दलित अत्याचार लड़त समिति कुछ ही दिनों पहले चर्चा में आया है. दरअसल उना में दलितों की पिटाई के बाद शुरू हुआ आंदोलन बिना किसी नेतृत्व के चल रहा था. बाद में जिग्नेश मेवाणी ने इसका नेतृत्व किया.

जेएसएम ने 2009 में सुरेंद्रनगर और अहमदाबाद जिलों के दस गांवों में एक सर्वेक्षण किया था जिसमें बताया गया था कि कैसे दलितों को जमीन का हक नहीं दिया जा रहा है. 

गुजरात कृषि भूमि चकबंदी कानून में पांच एकड़ अतिरिक्त सरकारी भूमि को भूमिहीन दलितों को आवंटित करने का प्रावधान है. मेवानी ने बताया कि इस कानून का गुजरात में कभी पालन नहीं किया गया.

मेवानी के मुताबिक अतिरिक्त भूमि की पहचान कर ली गई है लेकिन सरकार इसे दलितों को देने को तैयार नहीं है. अगर सरकार ने एक महीने के अंदर इस जमीन को दलितों को देने की प्रक्रिया शुरू नहीं करती है तो हम 15 सितंबर से रेल रोको आंदोलन शुरू करेंगे. ऐसा लगता है कि मेवानी ने अपने आंदोलन को आगे बढ़ाने की पूरी योजना बना रखी है. गुजरात की जनसंख्या में दलित आबादी मात्र सात फीसदी है.

दिसम्बर 1980 में मेहसाना गुजरात में जिग्नेश का जन्म हुआ. उनके पिता अहमदाबाद नगर निगम में बाबू थे. जिग्नेश ने फ़िल्म निर्माता राकेश शर्मा के साथ मिलकर सौराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या पर डाक्यूमेंट्री बनाने का काम किया है और फिर एक गुजराती मैगज़ीन में काम करने के बाद वो मुकुल सिन्हा के संगठन से जुड़ गए.

कन्हैया कुमार

जेएनयू में कथित देशविरोधी नारों के विवाद से चर्चा में आए थे जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार आज देश भर में जाना पहचाना नाम हैं. कन्हैया भारतीय कम्युनिस्टट पार्टी की छात्र शाखा ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन से जुड़े हैं जो वामपंथ का समर्थन करते हैं.

उनके ऊपर कथित तौर पर आरोप है कि वे माओवाद और नक्सलवाद का समर्थन करते हैं. अकिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और आरएसएस यह आरोप लगाता रहा है कि जेएनयू राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का अड्डा बन गया है और कन्हैया समेत यहां के तमाम वामपंथी छात्र देशद्रोही गतिविधियों के समर्थक हैं. कन्हैया फिलहाल देशद्रोह के एक आरोप में जमानत पर हैं.

कन्हैया कुमार का जन्म जनवरी 1987 में बिहार के बीहट में मसनदपुर टोला में हुआ. वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा से जुड़े हैं. कन्हैया कुमार के दो भाई और एक बहन हैं. कन्हैया जेएनयू में पीएचडी कर रहे हैं.

First published: 23 August 2016, 13:33 IST
 
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