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फिर संकट में हरीश रावतः राज्यसभा नामांकन बना गले की हड्डी

आकाश बिष्ट | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
(कैच न्यूज)

हरीश रावत की मुश्किलों का अंत दिखता नजर नहीं आ रहा. पहले उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगा, तब राज्य की फिर से सत्ता संभालने के तीन सप्ताह बाद रावत अब अपने सहयोगियों के विरोध का सामना कर रहे हैं. इनमें प्रॉग्रेसिव डेमोक्रैटिक फ्रंट (पीडीएफ) और राज्य के एक वरिष्ठ नेता शामिल हैं.

ये सभी कांग्रेस द्वारा रावत के विश्वासपात्र प्रदीप टम्टा के राज्यसभा नामांकन किए जाने से निराश हैं.

एक विश्वस्त सूत्र के मुताबिक इन सबके बीच सोमवार 30 मई को रावत ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की और उन्हें राज्य के राजनीतिक माहौल की जानकारी दी.

रावत के करीबी सूत्र ने बताया, "मुख्यमंत्री ने केंद्रीय नेतृत्व से बात की और वे कदम वापस करने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं. रावत और हाई कमांड मजबूती से टम्टा के पक्ष में हैं. सर्वोच्च नेतृत्व से कोई सवाल पूछ नहीं सकता इसलिए जो इस फैसले का विरोध कर रहे हैं उन्हें भी इसे मानना पड़ेगा."

रावत ने केंद्रीय नेतृत्व को भरोसा दिया कि पीडीएफ के साथ समझौते का दौर चल रहा है और जल्द गतिरोध समाप्त होने की उम्मीद है.

पीडीएफ की खुद की पसंद

अगर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय का नाम राज्यसभा उम्मीदवार के रूप में दे दिया जाता तो स्पष्ट रूप से पीडीएफ के लोग फिर से मेलजोल के संकेत दे रहे हैं. लेकिन पार्टी टम्टा पर अड़ी हुई हुई है और पीडीएफ के नेतृत्व को समझाने और समाधान निकालने की कोशिश जारी है.

रावत सरकार के बने रहने के लिए पीडीएफ बहुत जरूरी है और इसने यह मुद्दा उठा दिया है कि 28 मई को टम्टा के नाम की घोषणा किए जाने से पहले कांग्रेस ने उनसे विचार-विमर्श क्यों नहीं किया. इससे एक दिन बाद मोर्चे ने राज्य से उच्च सदन में भेजे जाने के लिए अपने एक निर्दलीय विधायक दिनेश धनई के नाम की घोषणा की. 

यह आशंका थी कि पीडीएफ उपाध्याय के अलावा किसी अन्य के नाम का विरोध कर सकती है

दिलचस्प है कि टमटा के नाम की घोषणा से काफी पहले राज्य के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने इस बांत की आशंका जाहिर की थी कि पीडीएफ उपाध्याय के अलावा किसी अन्य के नाम का विरोध कर सकती है.

इस वरिष्ठ नेता ने कहा, "अगर वे किसी दूसरे नाम की घोषणा करते हैं तो पीडीएफ इसका विरोध करेगी और नेतृत्व पर उपाध्याय की उम्मीदवारी के लिए दबाव डालेगी. हालिया राजनीतिक संकट के बाद अगर मुख्यमंत्री अपनी सरकार को बचाने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहे थे तो उपाध्याय भी एक-एक व्यक्ति तक जाकर पार्टी में संतुलन बनाए रखने के लिए दौड़ रहे थे. इसके साथ ही उनके पीडीएफ नेताओं से भी अच्छे रिश्ते हैं."

इस बीच एक और अंसतोष जुड़ गया

टम्टा की उम्मीदवारी का विरोध करने वाला केवल पीडीएफ ही इकलौता दल नहीं है. राज्यसभा की उम्मीदवारी की लालसा रखने वाले राज्य के वरिष्ठ कांग्रेस नेता यशपाल आर्या ने भी आंदोलन की धमकी देते हुए भाजपा में जाने की बात कही है.

सोमवार को उन्होंने सोनिया गांधी से मुलाकात कर अपनी उम्मीदवारी की मंशा जाहिर करते हुए कहा कि यह फैसला रावत से प्रभावित है. पार्टी के एक संचालक ने कहा, "रावत पर अपने नजदीकियों का पक्ष लेने का आरोप है और टम्टा निश्चित रूप से ही उनके करीबी हैं."

आर्या ने भी उपाध्याय को समर्थन दिया. राज्य मंत्री और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष आर्या ने पार्टी प्रमुख को पत्र लिखकर अपने और उपाध्याय की उम्मीदवारी पर ध्यान दिलाया लेकिन उनकी याचिका को केंद्रीय नेतृत्व द्वारा अस्वीकार कर दिया गया.

उपाध्याय ने सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए एक बयान में सोनिया-राहुल गांधी और रावत के फैसले पर आभार जताया. बयान में उन्होंने कहा, "हमें पूर्ण विश्वास है कि वो (टमटा) उच्च सदन में राज्य के विकास के मुद्दों को मजबूती से उठाएंगे."

बीच के रास्ते पर चलना

अभी हाल ही में एक संकट से उबर प्रदेश कांग्रेस की कमजोर स्थिति पर ताजा संकट के चलते और ज्यादा जोर पड़ सकता है. पार्टी के एक वर्ग रावत से मोहभंग बढ़ता जा रहा है. क्योंकि रावत का अपने करीबियों और योग्य लोगों के प्रति अलग नजरिया है.

अगर उन्हें महिला ही चाहिए थी तो ऑल इंडिया महिला कांग्रेस अध्यक्षा शोभा ओझा इसके लिए ज्यादा योग्य थीं

वास्तव में पार्टी के खिलाफ बगावत करने वाले कांग्रेस के नौ नेताओं ने दावा किया कि वे मुख्यमंत्री की मनमानी और पक्षपात से परेशान हो गए हैं.

लेकिन यह केवल उत्तराखंड की ही बात नहीं है. कांग्रेस द्वारा जारी राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची पर भी इसे पार्टी नेताओं की आलोचना का सामना करना पड़ा है क्योंकि इस सूची में कोई भी मुसलमान या दलित शामिल नहीं है.

यहां तक की छत्तीसगढ़ से अंजान चेहरे के रूप छाया वर्मा के नामांकन पर भी पार्टी नेताओं ने सवाल खड़े कर दिए हैं. 

एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा, "वे पी चिदंबरम का नामांकन छत्तीसगढ़ से कर सकते थे और एक वरिष्ठ नेता और दलित चेहरे सुशील कुमार शिंदे को महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने देते. छाया वर्मा कौन है और उसने क्या किया है? अगर उन्हें महिला ही चाहिए थी तो ऑल इंडिया महिला कांग्रेस अध्यक्षा शोभा ओझा इसके लिए ज्यादा योग्य थीं."

First published: 1 June 2016, 7:25 IST
 
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