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भारतीय एनजीओ के लिए विदेशी चंदा लेना होगा पहले से 'मुश्किल'

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • सरकार ने किया एफसीआरए एक्ट में बड़ा बदलाव. अब सभी एनजीओ को रजिस्ट्रेशन और फंडिंग के आवेदनों को ऑनलाइन जमा करना होगा.
  • सारे एनजीओ को हलफनामा देना होगा कि विदेशी चंदे का इस्तेमाल देश की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ नहीं किया जाएगा.

भारत सरकार ने 14 दिसंबर को गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) को मिलने वाले विदेशी चंदे से जुड़े फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट 1976 में बदलाव को मंजूरी दे दी. इस बदलाव के बाद भारत में काम करने वाले सभी एनजीओ के रजिस्ट्रेशन और फंडिंग की निगरानी की जाएगी.

बड़े बदलाव

  • गैर सरकारी संगठनों को ऑनलाइन सालाना रिटर्न फाइल करना होगा. इसके लिए अब हार्डकॉपी की जरूरत नहीं होगी. इसके साथ ही रजिस्ट्रेशन और फंडिंग के आवेदन को ऑनलाइन जमा करना होगा.
  • इसके साथ ही गैर सरकारी संगठनों को हर तीसरे महीने विदेशी चंदे और सरकार से हासिल की गई रकम की रसीद और फंड के इस्तेमाल की जानकारी वेबसाइट पर देनी होगी. 
  • सभी एनजीओ को यह हलफनामा देना होगा कि विदेशी चंदा देश की संप्रभुता और अखंडता के साथ उसके आर्थिक और रणनीतिक हितों के खिलाफ जाकर नहीं लिया जाएगा. उन्हें यह हलफनामा देना होगा कि विदेशी चंदे की रकम से देश की चुनाव प्रक्रिया और धर्मों, सामाजिक और भाषाई समुदायों के बीच सौहार्द्र को कोई नुकसान नहीं होगा.

एनजीओ पर कैसे पड़ेगा असर

सबरंग ट्रस्ट के जावेद आनंद बताते हैं, 'यह कौन तय करेगा कि देश की संप्रभुता और अखंडता को किससे नुकसान होगा और किससे नहीं?' उन्होंने कहा कि सरकार इस तर्क का इस्तेमाल कर एनजीओ पर कार्रवाई कर सकती है. आनंद की पत्नी तीस्ता सीतलवाड़ भी इस ट्रस्ट से जुड़े हुई हैं.

नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं ने कहा कि पहले से ही देश की धार्मिक एकता और चुनाव प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाने वाले कई कानून मौजूद हैं. आनंद कहते हैं, 'संविधान में ऐसे कई उपाय किए गए हैं. ऐसे में एनजीओ से अलग से हलफनामा लेने का कोई मतलब नहीं है.'

अनिल चौधरी कहते हैं कि एनजीओ को अब विदेशी चंदा लेने के मामले में सावधान रहना होगा

नए कानून के अनुसार, 'आर्थिक और सामरिक हितों को नुकसान पहुंचाने वाला' प्रावधान इतना खुला है कि इसका आसानी से दुरुपयोग किया जा सकता है. आनंद ने कहा, 'केवल अदालतों में तय किया जा सकता है कि कोई गतिविधि देश के राष्ट्रीय और आर्थिक हित के लिए नुकसानदेह है या फिर यह तय किया जा सकता है कि इससे वाकई में किसके हितों की पूर्ति हो रही है.' 

वह जमीन अधिग्रहण का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि 'जमीन अधिग्रहण के मामलों में स्थानीय समुदायों के हितों पर कॉरपोरेट के हितों को तरजीह दी जाती है.' 

चूंकि अधिकांश एनजीओ के पास कानूनी लड़ाई लड़ने की हैसियत नहीं होती है, ऐसे में वो राज्य के दबाव का आसान शिकार हो सकते हैं. उन्होंने कहा, 'इस बात में कोई संदेह नहीं कि यह भयानक और खतरनाक संशोधन है. इससे गैर सरकारी संगठनों को नुकसान होगा. कई संगठनों को हर दिन का काम करने में परेशानियों का सामना करना होगा.'

इंडियन सोशल एक्शन फोरम(इंसाफ) के को-ऑर्डिनेटर विलफ्रेड डिकोस्टा ने कहा कि बदलाव डराने वाले हैं. कानूनी अड़चनों से उन लोगों को डराने की कोशिश है जो एनजीओ और अन्य संगठनों को चंदा देते हैं. जबकि 'इंसाफ' अपनी पहचान वैश्वीकरण और सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ने वाला संगठन बताता है. 

डिकोस्टा ने कहा, 'बदलाव का सबसे बड़ा मकसद लोगों को डराना है, खासकर छोटे एनजीओ को.' हालांकि वह इस बात के लिए शुक्रिया अदा करते हैं कि प्रस्तावित बदलावों में सरकार विरोधी या सरकार की नीतियों को शामिल नहीं किया गया है.

विलफ्रेड डिकोस्टा मानते हैं कि प्रस्तावित बदलाव का मकसद छोटे एनजीओ को डराना है

पॉपुलर एजुकेशन एंड एक्शन सेंटर(पीस) के अनिल चौधरी भी इस बात से सहमत दिखाई देेते हैं. उन्होंने कहा, 'एनजीओ को अब विदेशी चंदा लेने के मामले में सावधान रहना होगा और इससे उनकी गतिविधियों पर असर पड़ेगा.' पीस उन छह एनजीओ में से एक है जिसे जून में 'विकास परियोजनाओं की राह में रोड़ अटकाने के लिए' आईबी ने नोटिस जारी किया था.

क्या एनजीओ बनेंगे पारदर्शी?

सरकार का मानना है कि ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन और रिटर्न भरने और फंडिंग की विस्तृत जानकारी वेबसाइट पर मुहैया कराने से एनजीओ के कामकाज में पारदर्शिता आएगी. क्या वाकई में ऐसा होगा?

डिकोस्टा इसे लेकर आशावान नजर आते हैं. उन्होंने कहा, 'एफसीआरए में कर्मचारियों की जबरदस्त कमी है और ऐसे में उनके पास लिफाफे को खोलने का समय नहीं होता. लेकिन ऑनलाइन होने से उनके लिए निगरानी आसान हो जाएगी.' उन्होंने कहा, 'एनजीओ को अपने फंडिंग को लेकर जानकारी सार्वजनिक किए जाने में आपत्ति क्या है? उन्हें पारदर्शी होना ही चाहिए क्योंकि वह जनता के पैसों या फिर अनुदान में दी गई रकम से काम करते हैं.'

आनंद का भी मानना है कि इससे एनजीओ के कामकाज में पारदर्शिता आएगी लेकिन सरकार को इसे गंभीरता से लेना होगा. उन्होंने कहा, 'इससे आवेदनों की संख्या में कमी आएगी और और हार्ड कॉपी पर निर्भरता कम होगी.' 

वह बताते हैं, 'ऑनलाइन को लेकर एक समस्या है. सरकार के लिए प्रस्तावों और आवेदनों को नजरअंदाज करने में आसानी होगी.' यह पूरी तरह से संबंधित मंत्री और अधिकारी की जिम्मेदारी होगी कि वह एनजीओ की बैठक के आवेदन को मंजूर करता है या नहीं.'

चौधरी इससे असहमति हैं. वो कहते हैं, 'सभी दस्तावेजों को ऑनलाइन किए जाने से समस्याओं का समाधान नहीं होगा. सरकार के पास एनजीओ की कार्यप्रणाली की निगरानी के लिए पर्याप्त मशीनरी नहीं है. इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि सरकार अब आवेदनों के मामले में तेजी से कार्रवाई करेगी.' उन्होंने कहा, 'यह सब कुछ एनजीओ पर दबाव बनाने का तरीका है ताकि उन्हें किसी भी तरह से विदेशी चंदा लेने से रोका जा सके.'

First published: 17 December 2015, 7:50 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @catchnews

एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म से पढ़ाई. पब्लिक पॉलिसी से जुड़ी कहानियां करते हैं.

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