Home » इंडिया » Haryana's social fabric is in tatters
 

दंगों ने चौड़ी की हरियाणा के समाज में मौजूद जाति की खाई

राजीव खन्ना | Updated on: 27 February 2016, 19:42 IST
QUICK PILL
  • जाट आंदोलन से सबसे ज्यादा नुकसान हरियाणा के सामाजिक ताने-बाने को हुआ है. यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि आरक्षण आंदोलन ने एक तरह से हरियाणा में जातिगत संघर्ष को जन्म दिया है.
  • इन दंगों में अभी तक कुल 16 लोगों की मौत हुई है जबकि 183 लोग घायल हुए हैं. कथित तौर पर मुरथल में कुछ महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार भी हुआ है.

हरियाणा में हुई हिंसा के बाद जातियों के बीच आपसी भाईचारे और भरोसे की खाई चौड़ी हो गई है जिसे भरने में काफी लंबा समय लगेगा. सच्चाई यह है कि जाट आंदोलन से सबसे ज्यादा नुकसान हरियाणा के सामाजिक ताने-बाने को हुआ है. यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि आरक्षण आंदोलन ने एक तरह से हरियाणा में जातिगत संघर्ष को जन्म दिया है.

लोगों के बीच 'हमारी और उसकी' भावना गहरा चुकी है. लोग दंगों के दौरान उस मानसिकता पर सवाल उठा रहे हैं जिसके तहत कुछ विशेष जातियों की संपत्ति को चुन-चुनकर नुकसान पहुंचाया गया. जाटों को छोड़कर हर समुदाय का व्यक्ति यह सवाल पूछ रहा है कि आखिर उसे क्यों निशाना बनाया गया.

गोहाना में हमें उन दुकानों को दिखाया गया जिसे दंगाइयों ने लूट कर आग के हवाले कर दिया. यह संपत्तियां एक निश्चित जाति विशेष से जुड़े लोगों की थी. दंगों के दौरान कई समुदायों को यह लग रहा था कि उन्हें कई कारणों की वजह से निशाना बनाया गया.

डर का माहौल

 

गोहाना के एक व्यक्ति ने बताया, 'लोगों में अभी भी भय है और यह डर दूर होने में समय लगेगा. जाटों की संलिप्तता सामने आने के बाद इस समुदाय के लोग भी डरे हुए हैं. शहरी इलाकों में रहने वाले जाट भयभीत हैं.'

जन संघर्ष मंच की समाजिक कार्यकर्ता सुनीता त्यागी ने कहा, 'सबसे बुरा असर बच्चों के दिमाग पर पड़ा है क्योंकि उन्होंने अपनी आंखों से हिंसा होते हुए देखा है. उनके मन में अच्छे और बुरे समुदाय की पहचान उभर रही है. हमारे घर में 9 साल का बच्चा है जो अब घर से बाहर जाने से डर रहा है. अब आप उन इलाकों में रहने वाले बच्चों की मानसिक स्थिति का अंदाजा लगाइए जहां लोगों ने दुकानों को लूटा और आग लगाया है.'

और पढ़ें: कथित मुर्थल बलात्कार खट्टर की असफलताओं की एक और बानगी है

त्यागी ने अपने घर में करीब 50 दलित महिलाओं को रहने का ठिकाना मुहैया कराया जब पूरा इलाका दंगे की चपेट में था.

स्थानीय अखबार के पत्रकार भंवर सिंह बताते हैं, 'जब हिंसा भड़की तब हम काम पर बाहर थे और हमने लोगों को समझाया कि वह एक दूसरे की जाति के बारे में नहीं बोले. भाईचारा अब खत्म हो गया है.'

लोग घटना के बारे में बता रहे हैं लेकिन भय और डर की वजह से वह किसी की जाति और उस व्यक्ति का नाम लेने से डर रहे हैं. सामाजिक धुव्रीकरण का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि करीब 90 फीसदी नष्ट की गई संपत्ति गैर जाट, पंजाबी, सैनी और अन्य जातियों की है.

जाट समुदाय से ताल्लुक रखने वाले और रोहतक के मनौवैज्ञानिक देविंंदर सांगवान ने कैच को बताया, 'अब जाटों को ग्लानि महसूस हो रही है. स्थितियों का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता. बड़ी संख्या में जाटों ने आगे आकर लोगों को बचाया भी है. और दूसरी बात कि शुरुआत में दंगाइयों ने बिना किसी भेदभाव के संपत्तियों को आग लगाई और लूटपाट की. हालांकि लोग इसे इसी तरह से देखेंगे कि यह सब कुछ जाट आंदोलन के दौरान हुआ.'

चिंतित युवा समूह

दंगों के बाद सामने आ रही सच्चाई से युवा सबसे ज्यादा चिंतित हैं. शहर में ऑटोमोबाइल शोरूम में काम करने वाले एक जाट युवा ने बताया, 'मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि अब कोई जाट समुदाय के लड़कों को नौकरी पर क्यों रखेगा.'

युवाओं का कहना है कि कुछ असमाजिक तत्वों ने पूरे आंदोलन को बदनाम कर दिया जो मुख्य तौर पर गांवों के रहने वाले थे. दंगों के दौरान गोहाना और सोनीपत में फंसे ड्राइवरों के मुताबिक उन्हें आंदोलनकारियों गांव से खाना तक मुहैया कराया. 

लोग बता रहे हैं कि सरकार की तरफ से कार्रवाई किए जाने के पहले दंगों को भड़काने में सोशल मीडिया की अहम भूमिका रही. सोशल मीडिया पर अफवाहों के साथ नफरत भरे संदेश भेजे गए और इससे दंगाइयों को भड़काया गया. व्हाट्स एप के जरिए यह संदेश भी फैलाया गया कि महर्षि दयानंद युनिवर्सिटी के छात्रों के साथ जातीय आधार पर दुर्व्यहार किया गया.

आगे की कार्रवाई

समझदार और तार्किक लोगों का मानना है कि पूरे मामले में हुए नुकसान की भरपाई लोगों के बीच जागरूकता अभियान चलाकर की जा सकती है. त्यागी ने कहा, 'लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि यह पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था की विफलता है जिसका परिणाम हमें आज देखने को मिल रहा है.'

सांगवान बताते हैं कि लोगों को आरक्षण के बारे में और इसकी शुरुआत के बारे में शिक्षित किए जाने की जरूरत है. डॉ. सुनील सेठी बताते हैं, 'दंगाई एसयूवी में आए थे. उन्होंने अच्छे कपड़े पहन रखे थे और उन्होंने मोबाइल और कपड़ों की दुकानों को लूटा. क्या इन लोगों को आरक्षण की जरूरत है?'

चाय की दुकान पर बैठे एक जाट ने कहा, 'अभी तक जाटों को लेकर लोग मजाक किया करते थे. उम्मीद करता हूं कि यह आने वाले समय में गाली बन जाए.'

और पढ़ें: जाट हिंसा का संदेश है, खट्टर से न हो पाएगा

और पढ़ें: जाट आरक्षण: खट्टर सरकार में दो फाड़

और पढ़ें: खट्टर की राह में लगी आरक्षण की आग

First published: 27 February 2016, 19:42 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी