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मोदी डिग्री विवाद में कार्रवाई करने वाले आरटीई अधिकारी को सूचना आयोग ने क्यों दंडित किया?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 11 February 2017, 5:45 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री पर सूचना आयुक्त एम श्रीधर आचार्यलु ने हाल ही में जो आदेश दिया था क्या केंद्रीय सूचना आयोग उससे खुश नहीं है. आचार्यलु ने 21 दिसम्बर को आदेश दिया था कि दिल्ली यूनिवर्सिटी को 1978 के अपने सारे रिकॉर्ड जांच के लिए उपलब्ध करवाने चाहिए. यूनिवर्सिटी का दावा है कि इसी साल मोदी ने डिग्री हासिल की थी.

इसके तुरंत बाद सीआईसी ने आचार्यलु से मानव संसाधन विकास मंत्रालय का प्रभार वापस ले लिया. सीआईसी ने 12 दिन पहले ही अपने स्टाफ के बीच काम का बंटवारा किया था. इसके तहत आचार्यलु को एचआरडी मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया था.

हालांकि 10 जनवरी को मुख्य सूचना आयुक्त आरके माथुर ने ‘पूर्व में आवंटित कार्य के पुनरावलोकन के दौरान’ स्वयं को व अन्य आयुक्तों को आवंटित मंत्रालय और विभागों में फेरबदल किया था. इसी प्रक्रिया में एचआरडी मंत्रालय आचार्यलु से लेकर दूसरे आयुक्त एम पाराशर को सौंप दिया गया.

यहां एकबारगी यह माना जा सकता है कि यह प्रशासनिक फैसला है और सीआईसी के अधिकार क्षेत्र में आता है लेकिन इसी वक्त यह निर्णय आना संदेहजनक है. यह मात्र संयोग तो नहीं हो सकता. सीआईसी में आए दिन किसी न किसी मंत्रालय या विभाग से संबंधित आरटीआई अपीलें आती ही रहती हैं. 

दो सप्ताह की छोटी सी अवधि में एक आयुक्त से किसी मंत्रालय विशेष का प्रभार लेकर दूसरे आयुक्त को सौंपने का कोई औचित्य नजर नहीं आता. प्रधानमंत्री की डिग्री को लेकर मांगी गई जानकारी की अपीलें नजरंदाज करने के लिए पहले ही आयोग की आलोचना की जा रही है.

टाली जा रही थी अपीलें

जाहिर है आयोग द्वारा अल्प समय में ही कार्य का दोबारा निर्धारण आचार्यलु के आदेश का ही नतीजा है. जो कि प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री को लेकर पीएमओ, डीयू और गुजरात विश्वविद्यालय द्वारा अब तक अपनाए गए रुख के उलट था. पिछले दो साल से ये सब प्रधानमंत्री की डिग्री के संबंध में जानकारी मांगने संबंधी आवेदनों पर टालमटोल करते आ रहे हैं.

इस मामले में इस नए आदेश से डीयू की 1978 की सारी डिग्रियों की जांच की छूट मिल जाएगी और उसके बाद सच ज्यादा दिन तक छिपे रहने की संभावना नहीं है. ऐसा कौन सा सच है जो सरकार को परेशान किए हुए है?

लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए शिक्षा की योग्यता न तो संविधान में अनिवार्य बताई गई है और न ही यह कोई नैतिक मापदड है

जैसा कि पहले भी कहा गया है कि लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए उच्च शिक्षा की योग्यता न तो संविधान में अनिवार्य बताई गई है और न ही यह चुनाव लड़ने का कोई नैतिक मापदंड है. और अगर प्रधानमंत्री पोस्टग्रेजुएट (स्नातकोत्तर) हैं; जैसा कि सबको बताया जाता है तो इसमें छिपाने वाली बात क्या है? 

और अगर वे नहीं हैं तो भी छिपाने की जरूरत नहीं है. फिर क्यों सरकार इस मामले में छुपम छुपाई का खेल खेल रही है और ऐसे लोगों को क्यों निशाने पर ले रही है जो इस मामले में कुछ अलग रुख अख्तियार कर रहे हैं?

आचार्यलु ने इस संबंध में कोई सार्वजनिक बयान तो जारी नहीं किया लेकिन अपने फेसबुक वॉल पर ऐसी 8 पोस्ट डालीं, जिनमें वे मीडिया रिपोर्ट शेयर की गई, जिनमें आचार्यलु की शक्तियां ‘कम करने’ की बात कही गई थी. उन्होंने अपने वॉल पर ऐसी पहली मीडिया रिपोर्ट ‘नो कमेंट’ की टैगलाइन के साथ पोस्ट की.

पारदर्शिता के पक्षधर आचार्यलु

प्रो. मदभूषणम श्रीधर आचार्यलु (61) विधि के प्रोफसर और लेखक हैं. 22 नवम्बर 2013 को वे सीआईसी में शामिल हुए. इससे पहले वे नेशनल एकैडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रीसर्च (नालसर) में प्रोफेसर थे. सीआईसी का दावा है कि आचार्यलु ने कानून एवं पत्रकारिता पर अंग्रेज़ी व तेलुगु में 30 के करीब किताबें लिखी हैं. इनमें से चार किताबें सूचना के अधिकार पर हैं. आचार्यलु कुछ अंग्रेजी व तेलुगु अखबारों में कॉलम भी लिखते हैं. लॉ में पोस्टग्रेजुएट आचार्यलु उस्मानिया यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में स्नातक हैं.

उनके परिवार के लिए पत्रकारिता नई नहीं है. उनके पिता एम.एस. आचार्य स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने जनधर्म और वारंगल वानी नाम की साप्ताहिक पत्रिकाएं शुरू की. वे इनके संस्थापक संपादक थे. अब कानून, पत्रकारिता और आरटीआई की पृष्ठभूमि वाले आचार्यलु अगर सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता के पक्षधर हों तो कोई अचरज नहीं. उनके कुछ ट्वीट से इस संबंध में उनके विचारों का अंदाजा लगाया जा सकता है. पद की गोपनीयता की शपथ के बारे में मार्च 2016 में किया गया उनका ट्वीट आज प्रासंगिक लग रहा है.

First published: 13 January 2017, 8:00 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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