Home » इंडिया » Has Varun Gandhi Ended His Possibilities In BJP By Praising India's First PM Jawahar Lal Nehru
 

नेहरू की तारीफ क्या बीजेपी में वरुण गांधी की संभावनाओं का अंत है?

अभिषेक पराशर | Updated on: 4 September 2016, 8:38 IST
QUICK PILL
  • उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद वरुण गांधी ने लखनऊ के एक कार्यक्रम में युवाओं को संबोधित करते हुए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के योगदान का जिस अंदाज में जिक्र किया, वह सियासी हलकों में चर्चा और उससे कहीं ज्यादा आने वाले दिनों में बनने वाले नए सियासी समीकरण का विषय बन गया है.
  • वरुण गांधी उत्तर प्रदेश में युवा राजनीति का चेहरा हैं. लेकिन इसके बावजूद चुनाव से पहले बीजेपी की रणनीति में वरुण गांधी के लिए कहीं कोई भूमिका नजर नहीं आती.
  • मेनका गांधी और सोनिया गांधी के बीच बेहद खराब रिश्ते होने के बावजूद वरुण और राहुल एवं प्रियंका गांधी के बीच बेहतर रिश्ते हैं. 

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद वरुण गांधी ने लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान युवाओं को संबोधित करते हुए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के योगदान का जिस अंदाज में जिक्र किया, वह सियासी हलकों में चर्चा और उससे कहीं ज्यादा आने वाले दिनों में बनने वाले नए सियासी समीकरण का मुद्दा बन गया है.

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले वरुण गांधी का यह बयान बीजेपी को असहज करने के लिए काफी है. वरुण गांधी की मां मेनका गांधी को नरेंद्र मोदी कैबिनेट में महिला कल्याण और विकास मंत्रालय जैसा अहम विभाग मिला हुआ है. 

वहीं वरुण गांधी उत्तर प्रदेश में युवा राजनीति का चेहरा माने जाते हैं. लेकिन इसके बावजूद चुनाव से पहले बीजेपी की रणनीति में वरुण गांधी के लिए कहीं कोई भूमिका नजर नहीं आती.

बीजेपी में होने के बावजूद वरुण गांधी कभी भी कांग्रेस के वाइस प्रेसिडेंट राहुल गांधी के खिलाफ कोई बयान नहीं देते और ऐसा ही राहुल गांधी भी करते हैं. मेनका गांधी और सोनिया गांधी के बीच बेहद खराब रिश्ते होने के बावजूद वरुण और राहुल एवं प्रियंका गांधी के बीच बेहतर रिश्ते हैं. 

सियासत में निजी कटुता की जगह विचारधारा का स्थान अहम होता है और इस बार वरुण गांधी ने नेहरू के बारे में बयान देकर उस विचारधारा को ही चुनौती दे डाली है जो देश के पहले प्रधानमंत्री के तौर पर जवाहर लाल नेहरू को देश की कई समस्याओं के लिए जिम्मेदार मानते हुए उन्हें इतिहास में वाजिब जगह देने को तैयार नहीं होता.

बीजेपी और आरएसएस की राजनीति में जवाहर लाल नेहरू को अन्य पूर्व प्रधानमंत्रियों की तरह सम्मान से नहीं देखा जाता

बीजेपी और आरएसएस की राजनीति में जवाहर लाल नेहरू को अन्य पूर्व प्रधानमंत्रियों की तुलना में सम्मान से नहीं देखा जाता. इस तरह के तमाम उदाहरण हैं जब संघ और भाजपा ने नेहरू की हिकारत की है. एक झलक कुछ महीने पहले उस वक्त देखने को मिली जब जून महीने में इलाहाबाद में बीजेपी की दो दिनों की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल होने गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अल्फ्रेड पार्क जाकर शहीद चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धांजलि दी लेकिन उन्होंने आजादी के आंदोलन का गढ़ रहे आनंद भवन जाने की जरूरत नहीं समझी. आनंद भवन नेहरू का पुश्तैनी निवास है.

नरेंद्र मोदी अक्सर अपने भाषणों में देश के अन्य प्रधानमंत्रियों के योगदान और अन्य शख्सियतों का जिक्र करते हैं लेकिन वह कभी भूल से भी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का नाम तक नहीं लेते. तो क्या वरुण गांधी ने नेहरू के बारे में बयान देकर यह साफ कर दिया है वह बीजेपी में अपना राजनीतिक भविष्य नहीं तलाश रहे?

उत्तर प्रदेश में बीजेपी जिस रणनीति के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही हैं उसमें वरुण गांधी को कोई बड़ी भूमिका मिलने की संभावना अब न के बराबर है. यूं भी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्या ने उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र के बाहर सक्रियता न दिखाने का फरमान सुना दिया है.

लेकिन कांग्रेस जिस रणनीति से प्रदेश में अपने कदम बढ़ा रही है, वहां वरुण गांधी के लिए असीमित संभावनाएं हैं. जल्द ही कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के हाथों से निकलकर राहुल गांधी के हाथों में जाने वाली है. 

गांधी ने नेहरू के बारे में बयान देकर यह साफ कर दिया है कि वह कुछ मामलों में पार्टी की विचारधारा से बंधे हुए नहीं हैं लेकिन नेहरू ऐसा मसला है जिस पर बीजेपी और आरएसएस समझौता करने को तैयार नहीं हो सकती.

विचारधारार पर वरुण का हमला

वरुण गांधी ने जिस संदर्भ के साथ नेहरू को याद किया वह इसलिए अहम है क्योंकि पिछले आम चुनाव में नेहरू को लेकर जबरदस्त ट्रॉलिंग हुई थी और उन्हें निहायत की गंदी छवि में पेश किया गया. ऐसे में वरुण गांधी का नेहरू की छवि को लेकर दिया गया बयान अहम हो जाता है.

गांधी ने कहा, 'लोगों को लगता है कि नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री थे और उन्होंने अपनी जिंदगी राजा की तरह जिया. जिसमें आराम और सुविधाएं थीं. लेकिन वह नेहरू के बारे में यह नहीं जानते कि उन्होंने यह उपलब्धि हासिल करने के लिए जेल में साढे पंद्रह साल काटे.' 

उन्होंने कहा, 'अगर आज कोई मुझे जेल में डाल दें और कहें कि मैं आपको पंद्रह साल बाद बड़ा पद दूंगा तो मैं कहूंगा कि माफ कीजिए, मैं ऐसा नहीं कर सकता.'

तो क्या वरुण गांधी बीजेपी और आरएसएस की नेहरू विरोध की प्रत्यक्ष और परोक्ष नीति से उब चुके हैं? या फिर वे पार्टी में खुद को हाशिए पर रखे जाने से नाराज हैं. वरुण गांधी की पहचान सोच-समझकर बोलने वाले नेताओं की रही है. वह यूं ही बयान देने वाले नेताओं में शामिल नहीं हैं. 

वरुण यही नहीं रुके. उन्होंने बोलने और लिखने की आजादी पर मंडरा रहे खतरे पर भी चिंता जताई. उनका यह बयान भी अपनी ही सरकार के खिलाफ चला गया.

गांधी ने कहा, 'पिछले एक साल से एक बड़ा समाचार पत्र बिना विज्ञापन के प्रकाशित हो रहा है और ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि एक विशेष राज्य की सरकार उन्हें विज्ञापन नहीं देना चाहती. मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता. लेकिन यह जानना जरूरी है कि यह समाचार पत्र राज्य का सबसे बड़ा समाचार पत्र है.'

वरुण गांधी ने लखनऊ में जो कुछ भी कहा वह सीधे-सीधे उनकी पार्टी के वैचारिक नजरिए से टकराता है. जाहिर है देर-सबेर पार्टी और संघ दोनों ही इस मसले पर वरुण से सवाल करेंगे.

राहुल और वरुण में मधुर रिश्ते

वरुण गांधी ने अपनी शादी में सोनिया गांधी और पूरे परिवार को न्यौता दिया था लेकिन उनकी शादी में कोई शामिल नहीं हुआ. बाद में वरुण ने इस बारे में सफाई देते हुए कहा, 'प्रियंका दीदी खराब सेहत की वजह से नहीं आ सकीं जबकि राहुल अपने पैर का इलाज करा रहे थे.' 

लेकिन बाद में जब वरुण की 20 दिन की बेटी का देहांत हुआ तब राहुल और प्रियंका दोनों ही जोर बाग स्थित वरुण के घर पहुंचकर उन्हें संभाला. अब नेहरू की तारीफ कर वरुण गांधी ने अपनी रणनीति साफ कर दी है.

यह आम धारणा है कि अमित शाह वरुण को पसंद नहीं करते. दूसरी तरफ वरुण गांधी जिस विरासत के साझीदार हैं उसे देखते हुए यह माना जा सकता है कि महज एक सांसद भर की राजनीति वे नहीं करना चाहेंगे. यह काम वे बिना किसी पार्टी के भी कर सकते हैं. उनकी मां मेनका गांधी लंबे समय से बिना किसी पार्टी के समर्थन के पीलीभीत संसदीय सीट से ऐसा करती आ रही थीं.

नेहरू की तारीफ और अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ बोलकर वरुण गांधी ने एक तरह से बीजेपी में अपनी संभावनाओं का अंत किया है. लेकिन साथ ही उन्होंने अपने लिए नए रास्ते भी खोल लिए हैं. वरुण और राहुल गांधी के साथ आने की अटकलें समय-समय पर सुर्खियां बनती रही हैं. 

ऐसे में बीजेपी से इतर कहीं और वरुण गांधी की संभावित भूमिका को आकार लेते हुए देखना दिलचस्प होगा.

First published: 4 September 2016, 8:38 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी