Home » इंडिया » Hate Speech Accused Have Three Times More Chances To Win Elections
 

घृणा की राजनीति से सफलता की संभावना तीन गुणा बढ़ जाती है

अभिषेक पराशर | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • पिछले 12 सालों के दौरान चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की तरफ से चुनाव आयोग को दी गई जानकारी का विश्लेषण बताता है कि सामान्य उम्मीदवारों के मुकाबले भड़काऊ भाषण देने वाले उम्मीदवारों के चुनाव जीतने की सफलता दर तीन गुणा अधिक रही है.
  • चुनाव आयोग को दिए गए हलफनाफे के मुताबिक देश भर के 70 से अधिक सांसदों और विधायकों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिए जाने का मामला लंबित है. इसमें सबसे ज्यादा मामले बीजेपी (भारतीय जनता पार्टी) के विधायकों और सांसदों के खिलाफ है.

पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान ऐसे कई मौके आए जब नेताओं की जुबान फिसली. इन बयानों को विवादित कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि जो कुछ भी कहा गया वह सीधे-सीधे किसी समुदाय विशेष के प्रति नफरत फैलाने के लिहाज से दिया गया बयान था. भड़काऊ बयानबाजी की वजह से कुछ को चुनाव आयोग की चेतावनी मिली तो कुछ नेताओं के खिलाफ मामले भी दर्ज हुए.

लेकिन इससे होने वाला फायदा कहीं बड़ा था. आंकड़े बताते हैं कि भड़काऊ भाषण देने वाले उम्मीदवारों के चुनाव जीतने की सफलता दर तीन गुणा अधिक रही. 

पिछले 12 सालों के दौरान चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की तरफ से चुनाव आयोग को दी गई जानकारी का विश्लेषण बताता है कि सामान्य उम्मीदवारों के मुकाबले भड़काऊ भाषण देने वाले उम्मीदवारों के चुनाव जीतने की बढ़ जाती है.

इंडिया स्पेंड नामक एक वेबसाइट की एनालिसिस बताती है कि पिछले 12 सालों में 10 फीसदी वैसे उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहे जिनके खिलाफ कोई मुकदमा नहीं हुआ. 

साफ शब्दों में कहे तो 10 फीसदी उम्मीदवार बेदाग छवि के थे. वहीं अगर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं की सफलता की बात करें तो ऐसे करीब 20 फीसदी उम्मीदवारों को जीत मिली. जबकि भड़काऊ भाषण देने वाले नेताओं के चुनाव जीतने की दर 30 फीसदी रही.

बीते 12 सालों में संसद और विधानसभा चुनाव में बेदाग छवि के उम्मीदवारों की संख्या 82,970 थी और इसमें से 8,103 (10 फीसदी) उम्मीदवारों को जीत मिली.

इसी प्रकार किसी भी तरह की आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 17,892 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा और इनमें 3,597 उम्मीदवारों को जीत मिली जो कि कुल उम्मीदवारी का 20 फीसदी है.

भड़काऊ भाषण दिए जाने के मामले में चुनाव जीतने वाले उम्मीदवारों की सफलता दर 30 फीसदी रही

इन दोनों मामलों के विपरीत भड़काऊ भाषण (जिनके खिलाफ आईपीसी के तहत मामले दर्ज हैं) देने वाले 399 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा और इनमें से 121 उम्मीवार सांसद या विधायक बनने में सफल रहे. यानी इस मामले में उम्मीदवारों की सफलता की दर 30 फीसदी रही.

भड़काऊ भाषण देने वाले ज्यादातर उम्मीदवारों के खिलाफ आईपीसी की धारा 154 ए, 154 बी, 295 ए, 505 (2), आरपी एक्ट की धारा 125 के तहत मुकदमे दर्ज हुए थे.

बीजेपी सबसे ऊपर

चुनाव आयोग को दिए गए हलफनाफे के मुताबिक देश भर के 70 से अधिक सांसदों और विधायकों के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने का मामला दर्ज है. इसमें सबसे ज्यादा मामले बीजेपी (भारतीय जनता पार्टी) के विधायकों और सांसदों के खिलाफ है.

हाल के दिनों में रामशंकर कठेरिया, साध्वी प्राची, साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ जैसे तमाम नेता समुदाय विशेष के खिलाफ आपत्तिजनक बयानबाजी करते रहे हैं. लिहाजा भाजपा का इस सूची में सबसे ऊपर होना कोई नई बात नहीं है.

बीजेपी के 28 मौजूदा सांसदों और विधायकों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिए जाने का मामला लंबित है. भड़काऊ बयानबाजी के मामले में गांधी परिवार के सदस्य और भाजपा सांसद वरुण गांधी भी शामिल हैं. इन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव में पीलीभीत संसदीय क्षेत्र में प्रचार के दौरान मुसलमानोंं के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक बातें कही थी.

भड़काऊ भाषण के मामले में दूसरे स्थान पर तेलंगाना राष्ट्र समिति आती है. इसके 9 मौजूदा विधायक और सांसदों के खिलाफ सामुदायिक वैमनस्य फैलाने के मामले लंबित है.

भड़काऊ भाषण देने के मामले में असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम तीसरे नंबर पर है. तेलुगू देशम पार्टी के खिलाफ ऐसे चार मामले चल रहे हैं. 

उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी समाजवादी पार्टी के 5 सांसदों और विधायकों के खिलाफ तो कांग्रेस के तीन सांसदों और विधायकों के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने का मामला चल रहा है.

पार्टियों के दुलारे

पिछले 12 साल के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों ने अलग-अलग चुनावों में ऐसे 399 उम्मीदवारों को टिकट दिया जिनके खिलाफ भड़काऊ भाषण देने का मामला दर्ज था. 97 उम्मीदवारों के साथ बीजेपी इस सूची में सबसे ऊपर रही वहीं बसपा ने ऐसे 28 उम्मीदवारों को अपना प्रत्याशी बनाया.

इतने ही उम्मीदवारोंं को कांग्रेस ने भी विधायक और सांसद का उम्मीदवार बनाया. समाजवादी पार्टी ने 25, टीआरएस ने 15 तो जनता दल-यूनाइटेड ने 10 ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया.

कांग्रेस ने 28 ऐसे नेताओं को विधायक और सांसद का उम्मीदवार बनाया जिनके खिलाफ भड़काऊ भाषण देने का मामला दर्ज था

इस सर्वेक्षण में सबसे चौंंकाने वाला पक्ष यह है कि अक्सर विवादित संपादकीय और विवादित बयानों की वजह से सुर्खियों में रहने वाली महाराष्ट्र की शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना इस सूची में बेहद नीचे है. 

पिछले 12 सालों में शिवसेना ने भड़काऊ भाषण देने वाले 14 उम्मीदवारों को अपना प्रत्याशी बनाया. वहीं एआईएमआईएम ने 12 ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया. एआईएमआईएम भी अक्सर ओवैसी बंधुओं की विवादित बयानबाजी से सुर्खियों में रहती है.

बदलाव की उम्मीद नहीं

पिछले कुछ सालों के दौरान चुनाव को लेकर लोगों की जागरूकता बढ़ी है और मतदान के पर्सेंटेज़ में इजाफा हुआ है. मतदाताओं में बढ़ती जागरूकता की वजह से राजनीतिक दलों पर भी साफ-सुथरी छवि के उम्मीदवारों को टिकट देने का दबाव बना है लेकिन अधिकांश मामलों में पार्टियां जीत और हार के समीकरण को देखते हुए दागदार छवि के उम्मीदवारों को टिकट देने से पीछे नहीं हटती हैं.

एडीआर के आंकड़ों के मुताबिक पिछले आम चुनाव में 17 फीसदी (1,398) ऐसे उम्मीदवारों को टिकट मिला जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे. इसी प्रकार गंभीर आपराधिक मामलों के आरोपियों की संख्या 11 फीसदी (889) रही.

426 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बीजेपी इस मामले में पहले पायदान पर रही. पार्टी ने ऐसे 89 उम्मीदवारों (21 फीसदी) को अपना प्रत्याशी बनाया जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक धाराओं में मुकदमे दर्ज थे. 

वहीं 462 सीटों पर लड़ने वाली कांग्रेस ने आपराधिक रिकर्ड वाले 61 (13 फीसदी) उम्मीदवारों को अपना प्रत्याशी बनाया. साफ-सुथरी राजनीति का दावा कर सियासत करने आई आम आदमी पार्टी ने 42 ऐसे लोगों को टिकट दिया जिनके खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज थे.

बिहार चुनाव में भी नहीं बदली सूरत

आम चुनाव के ठीक बाद हुए बिहार विधानसभा चुनाव में भी राजनीतिक दलों ने आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को टिकट देने से परहेज नहीं किया.

गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को टिकट देने में लालू प्रसाद की पार्टी आरजेडी सबसे आगे रही. पार्टी ने 47 फीसदी टिकट ऐसे उम्मीदवारों को दिया जिनके खिलाफ गंभीर मामलों में मुकदमे दर्ज थे. वहीं जेडी-यू ने 41 फीसदी तो बीजेपी ने 39 फीसदी ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया.

ADR Data.

ग्राफिक्स: एडीआर (बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में पार्टी के आधार पर दागी उम्मीदवारों की सूची) 

अगले महीने पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं. ऐसे में राजनीतिक दलों के सामने जनता के समक्ष बेदाग छवि के उम्मीदवारों को उतारने का विकल्प है. हालांकि इसकी संभावना कम ही दिखाई देती है. 

First published: 29 March 2016, 1:54 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी