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हेटर्ड इन द बैलीः अरुंधति की यह किताब अपने आप में ब्राह्मणवाद की समालोचना है.

तेजस हरद | Updated on: 26 September 2016, 4:14 IST
QUICK PILL
  • नवायना अपने आपको भारत का ऐसा पहला पब्लिशिंग हाउस कहता है जो जातिवाद के मुद्दे को जाति विरोधी नजरिये से देखता है. लेकिन जेम्स माइकेल और अक्षय पाठक ने नवायना के बारे में कुछ आश्चर्यजनक खुलासा किया.
  • नवायना द्वारा प्रकाशित और वेबसाइट पर अपलोड की गई 61 लेखकों की सूची में से 37 लेखक ऐसे हैं जो सवर्ण जाति के हैं और समुदाय विशेष से ताल्लुक रखते हैं. इनमें 16 सवर्ण और 21 ऊंची जाति के हैं (इनमें से 16 ब्राह्मण हैं)

अरुंधति राय की किताब ‘हेटर्ड इन द बैली’ लगता है कि उनकी अपनी लेखनी की समीक्षा है, जो लेख उन्होंने बी.आर.अम्बेडकर की कृति एन्निहिलेशन ऑफ कास्ट की भूमिका (द डॉक्टर एंड द सेंट) में लिखा है. लेकिन ऐसा नहीं है. दरअसल यह भारतीय स्कॉलरशिप में उच्च वर्ग के प्रभाव, जाति को लेकर अंधता और प्रतिनिधित्व के मुद्दों को नकारने की उनकी आदत की समीक्षा है. सही मायनों में कहा जाए तो यह किताब अपने आप में ब्राह्मणवाद की समालोचना है.

खुद को जातिवाद विरोधी बताने वाले प्रकाशन नवायना ने 2015 में काफी जोर-शोर से एनिहिलेशन ऑफ कास्ट का एक विशेष एडिशन प्रकाशित किया था. 

अरुंधति रॉय की किताब जितनी लंबी भूमिका में नस्ली और जातीय विचारों के लिए एमके गांधी की आलोचना की गई है. जब आउटलुक और कारवां में इस भूमिका के कुछ अंश छपे तो रॉय को आशंका थी कि गांधी परिवार और चरमपंथी राष्ट्रवादी जरूर उनके खिलाफ उंगली उठाएंगे.

लेकिन इस बार आपत्तियां वहां से आईं, जिसकी उम्मीद नहीं थी; अम्बेडकर के अनुयायियों से. ये सारी आलोचनाएं राउंड टेबल इंडिया नामक वेबसाइट पर प्रसारित हुई. यह वेबसाइट एक स्वतंत्र मीडिया है, जो समाज को जाति के लेंस से देखता है और जातिवाद विरोधी कार्यकर्ताओं की सोशल मीडिया प्रोफाइल का भी विश्लेषण करता है. हेटर्ड इन द बैली ऐसे ही समालोचनात्मक निबंधों, विचारों, भाषणों और साक्षात्कारों का संग्रह है.

पक्षपात

किताब जातियों के समानुपातिक प्रतिनिधित्व की बात करती है. यह किताब किसी दलित या अम्बेडकरवादी को एनहिलेशन ऑफ कास्ट की भूमिका लिखने का दायित्व नहीं सौंपने के लिए नवायना को आड़े हाथ लेती है. 

पब्लिशिंग हाउस ने इसके लिए रॉय को चुना जिनका न तो जाति और न ही अम्बेडकर से कोई लेना-देना है. रॉय सवर्ण हिन्दू और सीरियाई क्रिश्चियन हैं. उनका व्यक्तित्व और भारत में विभिन्न आंदोलनों से जुड़ा होना भी किताब में विचारणीय प्रश्न है. उन पर ऐसे गद्यांश को उचित ठहराने का आरोप है देश भर में जातिवाद विरोधी संघर्ष पर आधारित है, जिसका अनुवाद जातिवाद विरोधी स्वयंसेवकों ने कई भाषाओं में किया है और अपने खर्चे पर इसे प्रकाशित कर बांटा है.

रॉय ने एनिहिलेशन ऑफ कास्ट के अतीत में जाने की कोशिश नहीं की, जब से इसका पहला प्रकाशन 1936 में हुआ. न ही उन्होंने एक पैरे से ज्यादा किताब को पढ़ा. बजाय इसके पूरी भूमिका में वे गांधीजी के लेखों की बात करती रही हैं. दूसरा उनकी यह भूमिका या आमुख मुख्य पाठ्य सामग्री से तीन गुना ज्यादा लंबा है.

महान अम्बेडकर

जब हिन्दू सुधारवादी समूह जात-पात तोडक मंडल ने अपने एक कार्यक्रम के लिए अम्बेडकर के अध्यक्षीय भाषण पर आपत्ति जताते हुए उसे बदलने की मांग की थी तो उन्होंने इनकार कर दिया था कि वे इसका एक कॉमा भी नही बदलेंगे. इस पर उन्हें कार्यक्रम में आने से ही मना कर दिया गया. इस पर अम्बेडकर ने इसी भाषण को एक बुकलेट के रूप में पब्लिश करके इसे बांटने का काम भी खुद ही किया. तभी से इस किताब के कई एडिशन विभिन्न भारतीय भाषाओं में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं. इसी किताब की इलैक्ट्रॉनिक कॉपी कोलम्बिया यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर फ्री में उपलब्ध है.

इसके बावजूद नवायना का विशेष एडिशन लाना लगता है सवर्णों और पाश्चात्य पाठकों को लुभाने का व्यावसायिक प्रयास है. नवायना अपने आपको भारत का ऐसा पहला पब्लिशिंग हाउस कहता है जो जातिवाद के मुद्दे को जाति विरोधी नजरिये से देखता है. लेकिन जेम्स माइकेल और अक्षय पाठक ने नवायना के बारे में कुछ आश्चर्यजनक खुलासा किया.

नवायना द्वारा प्रकाशित और वेबसाइट पर अपलोड की गई 61 लेखकों की सूची में से 37 लेखक ऐसे हैं जो सवर्ण जाति के हैं और समुदाय विशेष से ताल्लुक रखते हैं. इनमें 16 सवर्ण और 21 ऊंची जाति के हैं (इनमें से 16 ब्राह्मण हैं)-हेटर्ड इन द बैली -पेज 161.

कार्तिक आरएम स्पष्ट करते हैं कि यह किस प्रकार परेशानी का सबब है. आज के भारत में राष्ट्रवादियों, विभिन्न सामाजिक दलों, उदारवादियों, एंटी-मार्डन, एंटी यूरोसेंट्रिक, एंटी एनलाइटमेंटलिस्ट, एंटी कॉलोनियलिस्ट, महिलावादी, इतने सारे समूह हैं कि यह बताना मुश्किल है कि कौन सी जाति इन अलग-अलग राजनीतिक, बुद्धिजीवी समूह के उदाहरण को सही तरीके से व्यक्त करती है?

वे आगे पूछते हैं, जब ब्राह्मण यह तय करते हैं कि प्रभाव का दर्शन शास्त्र क्या है; ब्राह्मण ही तय करते हैं कि ‘निरपेक्ष यानी बिना पक्षपात वाला उदारवाद क्या है और ब्राह्मण ही तय करते हैं कि इसका प्रतिकार क्या है तो विरोधी या प्रतिरोधी विचारधारा की गुंजाइश रह कहां जाती है? (हेटर्ड इन द बैली, पेज 188)

अवलोकन

भारतीय अध्ययन में ईमानदारी से आत्मावलोकन की जरूरत है. हेटर्ड इन द बैली इस मुद्दे के इर्द-गिर्द बहस को जन्म देती है. इसे जारी रखने और आगे ले जाने की जरूरत है. भारतीय अकादमिक और मीडिया में निचले तबकों की आवाजें दबाने का चलन है. सवाल उठता है कि विशेषाधिर प्राप्त वर्ग के प्रति यह गुस्सा कभी भी भड़कता है। यह सबके लिए हितकर होगा यदि हम पूर्वाग्रह से ग्रसित विचारों को नजरंदाज करें और ऐसी आलोचना को तुरंत खारिज कर दें.

हेटर्ड इन द बैली एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जिसे पढ़ा ही जाना चाहिए. यह पाठकों को पैटर्नवादी, खराब स्थिति और हिंसा से दूर रहने के लिए कहती है. कह सकते है कि नवायना का एन्हिलेशन ऑफ कास्ट एक सजग कहानी है.

First published: 26 September 2016, 4:14 IST
 
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