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जम्मू-कश्मीर में सदर-ए-रियासत और प्रधानमंत्री का पद बहाल हो: हाईकोर्ट

कैच ब्यूरो | Updated on: 29 December 2015, 20:07 IST
QUICK PILL
  • 50 साल पहले जम्मू में सदर-ए-रियासत और प्रधानमंत्री पद को बदल दिया गया था. जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने फिर से इसे बहाल करने का फैसला सुनाया है.
  • हाईकोर्ट का यह आदेश राज्य में दोबारा स्वायत्तता बहाल करने की मांग को उभार सकता है. राज्य में फिलहाल पीडीपी-बीजेपी की सरकार है.

कई लोग नहीं जानते होंगे कि 1965 तक जम्मू और कश्मीर में राज्यपाल की जगह सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री का पद था. जम्मू कश्मीर (छठे संशोधन) अधिनियम 1965 के जरिए राज्य के संविधान में संशोधन कर सदर-ए-रियासत पद को राज्यपाल और प्रधानमंत्री को मुख्यमंत्री के रूप में बदला गया.

1965 में जब राज्य में संविधान संशोधन हुआ उस समय जीएम सादिक वजीरे-ए-आजम और कर्ण सिंह सदर-ए-रियासत थे. हाईकोर्ट का यह आदेश राज्य में दोबारा स्वायत्तता बहाल करने की मांग को उभार सकता है.

आधी सदी बीत जाने के बाद जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने इस संशोधन को असंवैधानिक बताया है. हाईकोर्ट ने कहा, छठा संशोधन ''संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ'' है. अब यह राज्य विधायिका पर निर्भर करता है कि वह इस पद को बदलती है या फिर इस को जारी रखती है. यह फैसला हाईकोर्ट के जज हसनैन मसूदी ने जम्मू-कश्मीर के झंडे को लेकर दायर याचिका पर सुनाई के दौरान दिया.

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि राज्य विधायिका का यह फर्ज भी बनता है कि जहां जरूरत हो, वहां वह संविधान को उसके मूल स्वरूप में रखे.

आधी सदी पहले जम्मू-कश्मीर में सदर-ए-रियासत और प्रधानमंत्री पद का नाम बदल दिया गया था

हाईकोर्ट के अनुसार राज्य के संविधान की धारा 26 के तहत राज्य का मुखिया (सदर-ए-रियासत) निर्वाचित होना चाहिए. मुखिया का चुनाव चुने हुए प्रतिनिधियों अर्थात विधायकों द्वारा किया जाना चाहिए.

साल 1965 में हुए संशोधन के अनुसार राज्यपाल को राष्ट्रपति नियुक्त करेंगे. इस संशोधन के अनुसार राज्य के मुखिया (सदर-ए-रियासत) को चुनने का अधिकार समाप्त हो गया.

इस फैसले का राज्य में क्या असर पड़ेगा

जम्मू-कश्मीर में पहले से ही धारा 370 कानून लेकर तकरार जारी है. धारा 370 के तहत भारत के सभी राज्यों में लागू होने वाले कानून इस राज्य में लागू नहीं होते हैं. भारत सरकार केवल रक्षा, विदेश नीति, फाइनेंस और संचार जैसे मामलों में ही दखल दे सकती है.

यूपीए सरकार के कार्यकाल में दिलीप पडगांवकर, राधा कुमार और एमएम अंसारी को कश्मीर में शांति बहाल करने के लिए वार्ताकार नियुक्त किया गया था. इन तीनों ने भी सदर-ए-रियासत और वजीर-ए-आजम पद की सिफारिश की थी.

साथ ही उन्होंने नई दिल्ली को सुझाव दिया था कि जिस विशेष परिस्थिति में जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय किया गया उसकी शर्तों का सम्मान किया जाना चाहिए.

राज्य में बीजेपी-पीडीपी की सरकार है. बीजेपी लंबे समय से धारा 370 का विरोध करती रही है

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े थिंकटैंक कश्मीर स्टडी सेंटर ने जुलाई में जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 35(ए) को चुनौती दी थी. जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था. कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान की धारा 35ए राज्य में लागू मौजूदा कानूनों को सुरक्षा देता है.

नौ अक्टूबर 2015 को जस्टिस हसनैन मसूदी और जनक राज कोटवाल की बेंच ने एक आदेश में कहा है, ''धारा 370 को 'अस्थायी, परिवर्ती और विशेष प्रावधान' शीर्षक वाले भाग 21 में रखा गया है. इसके बाद भी संविधान में यह स्थायी तौर पर शामिल है.''

हाईकोर्ट ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत के दूसरे राज्यों की तरह नहीं है. इसे सीमित संप्रभुता मिली हुई है. इसे विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है.

इसमें राष्ट्रपति को संविधान के किसी भी प्रावधान को राज्य में लागू करने का अधिकार है. लेकिन इसके लिए भी राज्य से सलाह लेना जरूरी है. उन्हें किसी भी कानून को लागू करने, बदलने या हटाने का अधिकार है.

साथ ही, यह आदेश ऐसे समय में काफी अहम माना जा सकता है जबकि धारा 370 और धारा 35ए को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं अदालतों में हैं.

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा, संविधान सभा ने 25 जनवरी 1957 को भंग किए जाने से पहले ऐसी कोई अनुशंसा नहीं की. उसने कहा, परिणामस्वरूप, अनुच्छेद 370 के अस्थायी उपबंध वाले शीर्षक के तौर पर उल्लिखित होने के बावजूद यह संविधान का एक स्थायी प्रावधान है.

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के दोनों फैसले राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और बीजेपी के लिए झटका है. संघ और बीजेपी लंबे समय से आर्टिकल 370 रद्द करने के लिए मांग करते रहे हैं.

First published: 29 December 2015, 20:07 IST
 
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