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‘पिंजरे का तोता’: क्या सरकार सीबीआई से सांठ-गांठ करने में लगी है?

सादिक़ नक़वी | Updated on: 8 December 2016, 7:32 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • राकेश अस्थाना को सीबीआई का कार्यवाहक निदेशक नियुक्त करके क्या मोदी सरकार सीबीआई के साथ सांठ-गांठ करने में लगी है? 
  • मोदी सरकार को सीबीआई का कार्यवाहक निदेशक नियुक्त करने की क्यों जरूरत पड़ी? उन्होंने नियुक्ति की रीति-नीति क्यों नहीं अपनाई?

यह चौंकाने वाली बात है कि भारत की प्रमुख जांच एजेंसी, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) 2 दिसंबर 2016 से स्थाई निदेशक के बिना काम कर रहा है. केंद्र सरकार की निदेशक नियुक्त करने की विफलता ने उनकी नीयत को लेकर सवाल उठाए हैं. आरोप है कि वह एजेंसी के साथ सांठ-गांठ बैठाना चाहती है. उस एजेंसी के साथ, जो सुर्खियों में रहने वाले राजनीतिक और आपराधिक मामलों की जांच करती है. 

पिछले हफ्ते सरकार ने राकेश अस्थाना को कार्यवाहक निदेशक नियुक्त किया. अस्थाना गुजरात काडर के 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं. उनके मुताबिक उनकी साफ-सुथरी छवि रही है और वे सीबीआई में एसपी और डीआईजी के तौर पर काम कर चुके हैं. फिलहाल वे सीबीआई में अतिरिक्त निदेशक के रूप में काम कर रहे हैं. ऐसा सीबीआई के पहले के निदेशकों के चयन में नहीं हुआ.   

सरकार को निदेशक अनिल सिन्हा की सेवानिवृति से पहले चुनाव समिति की अहम बैठक बुलानी थी, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं, पर उसने ऐसा नहीं किया और अस्थाना को अतिरिक्त दायित्व दे दिया.

अस्थाना और भाजपा

एक पूर्व सीबीआई अधिकारी का कहना है कि इस तरह अस्थाई नियुक्ति पहले कभी नहीं हुई. यह विशेष रूप से चौंकाने वाली घटना है. खासकर इसलिए क्योंकि ऐसी घटनाएं नहीं हों, इसे आश्वस्त करने के लिए कई वैधानिक परिवर्तन किए गए हैं. एक बार ‘बंदी तोता’ बनने के बाद, वह सरकारी नियंत्रण में है.

आरोप लगाया जा रहा है कि अस्थाना को यह काम इसलिए मिला क्योंकि उनकी भाजपा नेताओं से नजदीकी है. वे गुजरात काडर के हैं (जहां मोदी मुख्यमंत्री रहे और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह गृहमंत्री) और वहां महत्वपूर्ण जांचों का हिस्सा थे. इसमें 2002 का गोधारा कांड भी शामिल है, जिसकी जांच स्पेशल इंवेस्टिगेटिव टीम ने की थी.

अस्थाना भारतीय पुलिस सेवा के अन्य कई अधिकारियों से जूनियर हैं. मसलन भारत-तिब्बत बॉर्डर पुलिस के महानिदेशक कृष्ण चौधरी 1979 बैच के अधिकारी हैं. राष्ट्रीय जांच एजेंसी के प्रमुख शरद कुमार, जिनकी सेवाएं बढ़ाई गई थीं, 1979 बैच के हैं. इनके उलट अस्थाना को अब तक महानिदेशक के पैनल में शामिल नहीं किया गया है. 

अस्थाना को इसी साल गुजरात से बुलाकर अप्रैल में सह निदेशक बनाया गया था. फिर दो दिन पहले जब अनिल सिन्हा को ऑफिस से इस्तीफा देना था, सरकार ने सबसे वरिष्ठ सीबीआई अधिकारी, विशेष निदेशक आरके दत्ता का गृह मंत्रालय में ट्रांसफर कर दिया और अस्थाना को कार्यवाहक निदेशक बनाने के लिए रास्ता साफ कर दिया. 

सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल

सुप्रीम कोर्ट में एनजीओ कॉमन कॉज की ओर से फाइल की गई पीआईएल में आरोप लगाया गया है कि ‘सरकार ने राकेश अस्थाना को सीबीआई का निदेशक बनाने के लिए बिल्कुल बदनीयती का, मनमाना और अवैध तरीका अपनाया है.’

पीआईएल में कहा गया है कि ‘केंद्र सरकार ने चयन समिति की बैठक नहीं बुलाई, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं, हालांकि उन्हें पूरी तरह पता था कि 2 दिसंबर 2016 को अनिल सिन्हा सीबीआई के निदेशक पद से इस्तीफा देंगे. जानबूझकर की गई यह लापरवाही 1946 के डीएसपीई एक्ट का पूरी तरह से उल्लंघन है, जिसमें 2013 के लोकपाल एक्ट से संशोधन किया गया था.’ 

अस्थाना को दायित्व देने से पहले इस पद के लिए कई वरिष्ठ अधिकारियों के नाम आ रहे थे. दत्ता के अलावा दिल्ली पुलिस के वर्तमान कमिशनर आलोक कुमार वर्मा, सीबीआई में अपनी सेवाएं दे चुकीं तमिलनाडु काडर की अधिकारी अर्चना रामचंद्रन, आईटीबीपी के डीजी कृष्ण चौधरी और महाराष्ट्र पुलिस के डीजीपी सतीश माथुर आदि नाम प्रमुख हैं.

दिलचस्प है कि जब पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा, सह निदेशक पद के लिए रामचंद्रन को केंद्रीय सतर्कता आयोग (प्रोटोकल के हिसाब से) की सहमति के बिना लाए, तो सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस कदम को खारिज कर दिया. 

यूपीए सरकार में भी आरोप

पिछली यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान कई कहानियां गढ़ी गईं, जिनमें वृहत स्तर पर राजनीतिक और कारपोरेट हस्तक्षेप का उल्लेख था. इसका मुख्य उदाहरण पूर्व सीबीआई प्रमुख रंजीत सिन्हा का था, जिन्हें अपने घर पर कोयला घोटाले के कई आरोपियों के साथ मुलाकात करते पाया गया.

हस्तक्षेप का दूसरा प्रत्यक्ष उदाहरण तब सामने आया, जब तत्कालीन कानून मंत्री अश्विनी कुमार को सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई की घोटाले की रिपोर्ट पेश करने से पहले उसकी फाइलें जांचते पकड़ा गया. जिस तरह से एजेंसी ने कई कारपोरेट हस्तियों को निर्दोष बताया, उस पर भी सवाल उठाए गए. इसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा, और सीवीसी को इन क्लीन चिट्स की जांच करने के निर्देश देने पड़े. 

फिर सीवीसी ने एजेंसी को 64 में से कम से कम 14 मामलों में एफआईआर दर्ज करने को कहा, जिसकी उसने विस्तार से जांच की थी. जिन कुछ कंपनियों को राहत मिली, उनमें टाटा ग्रुप, आदित्य बिड़ला ग्रुप, रिलायंस इंडस्ट्रीज और एसकेएस इस्पात थे. 

अंदरूनी सूत्रों से जानकारी मिली थी कि सीवीसी को टाटा, बिड़ला और जिंदल के मुकदमे खत्म करने में कोई परेशानी नहीं थी, पर रिलायंस और सासन, सिंगरोली में प्राप्त ब्लॉक्स के लिए उन्होंने मंजूरी खुल कर नहीं दी थी. सीवीसी के हस्तक्षेप के बाद, एजेंसी ने चार और एफआईआर दर्ज करवाई. पूर्व कारपोरेट मामलों के मंत्री प्रमोद कुमार गुप्ता, और उनके करीबी सहयोगी लालू प्रसाद यादव के खिलाफ, एसकेएस इस्पात के खिलाफ, जिसपर आरोप है कि यह पूर्व कैबिनेट मंत्री सुबोध कांत सहाय की फर्म है. 

इशरत जहां के एनकाउंटर मामले में भी सीबीआई की जांच संदेह के घेरे में आई. राजनीतिक दांव-पेंच के बाद एजेंसी को अंतत: मानना पड़ा कि गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री के खिलाफ चार्जशीट फाइल करने के लिए कोई प्रमाण नहीं है. दिलचस्प है कि प्रवर्तन निदेशालय ने हाल में सीबीआई को रंजीत सिन्हा और एक अन्य पूर्व निदेशक एपी सिंह की जांच करने के लिए लिखा है. एपी सिंह पर मोईन कुरैशी से मिले होने का आरोप है, जिसकी जांच प्रवर्तन निदेशालय कर रहा था.

एनडीए सरकार के अधीन आरोप

भाजपा सरकार के बनने के बाद भी एजेंसी पर आरोप था कि वह महत्वपूर्ण जांचें बहुत धीमी गति से कर रही है. जब एजेंसी शोहराबुद्दीन शेख मामले में सेशन कोर्ट को चुनौती नहीं दे सकी, जिसने अमित शाह को बर्खास्त कर दिया था, और खुद की चार्जशीट को बचाने में विफल रहे थे, तब फिर सीबीआई पर आरोप लगा कि वह राजनीतिक दबाव में काम कर रही है. 

सीबीआई को एक और मामले में गंभीर शर्मिंदगी झेलनी पड़ी, जब सेवारत अधिकारी बीके बंसल और उनके परिवार ने आत्महत्या कर ली थी. यह सीबीआई अधिकारियों द्वारा परेशान किए जाने का मामला था, जिसमें डीआईजी संजीव गौतम शामिल थे. गौतम ने हाल में अपना कार्यकाल पूरा किया है.

एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि यह मामला उन अधिकारियों की नियुक्ति का नतीजा है, जिन्हें सीबीआई का कम अनुभव है, और वे हत्या जैसे विशेष अपराधों की तरह ही भ्रष्टाचार के मामलों को रफा-दफा कर देते हैं. 

प्रधानमंत्री मोदी के सामने इन गड़बड़ियों से बचने और उन्हें दुरुस्त करने का मौका था. वे एजेंसी को प्रभावित कर सकते हैं या उसकी विश्वसनीयता को बहाल कर सकते हैं. पर तभी जब वे निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार खुद चलते और सिन्हा के उत्तराधिकारी का नाम बताते.

पर जिस तरह मोदी सरकार ने कार्यवाहक निदेशक की नियुक्ति की है, उससे उठे सवालों से निपटने के लिए हो सकता है कि कोर्ट को एक बार फिर हस्तक्षेप करना पड़े.

First published: 8 December 2016, 7:32 IST
 
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