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भगत सिंह की बेगुनाही साबित करने के लिए पाकिस्तान में लगेगी अदालत

कैच ब्यूरो | Updated on: 1 February 2016, 23:07 IST
QUICK PILL
  • इस मामले में लाहौर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एजाजुल एहसन ने न्यायमूर्ति खालिद महमूद की अध्यक्षता में एक खंडपीठ बनाई है. यह खंडपीठ आगामी तीन फरवरी को भगत सिंह के मामले में सुनवाई करेगी. 
  • हुए इस मामले की सुनवाई के लिए भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष और वकील इम्तियाज राशिद कुरैशी ने नवंबर में लाहौर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. 

ब्रिटिश अधिकारी जेपी सांडर्स की हत्या में सजा दिए जाने के करीब 85 साल बाद स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और शहीद-ए-आजम भगत सिंह को बेगुनाह साबित करने की एक नई कोशिश शुरू हो गई हैं. पाकिस्तान की एक अदालत में बुधवार से इस मामले की सुनवाई होगी.

इस मामले में लाहौर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एजाजुल एहसन ने न्यायमूर्ति खालिद महमूद की अध्यक्षता में एक खंडपीठ बनाई है. यह खंडपीठ आगामी तीन फरवरी को भगत सिंह के मामले में सुनवाई करेगी. 

इससे पहले याचिका पर अंतिम बार न्यायमूर्ति शुजात अली खान ने मई 2013 में सुनवाई की थी. जिसके बाद उन्होंने मामले को एक बड़ी पीठ को सौंपने का आग्रह करते हुए इसे मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया था. 

2014 में लाहौर पुलिस ने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या से जुड़ी मूल एफआईआर की कॉपी उपलब्ध कराई थी. मालूम हो कि 17 दिसंबर 1928 को अनारकली थाने में उर्दू जुबान में दर्ज एफआईआर में दो अज्ञात बंदूकधारियों का नाम था. 

अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह करने के कारण 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई थी

इस मामले की सुनवाई के लिए भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष और वकील इम्तियाज राशिद कुरैशी ने नवंबर में लाहौर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. 

कुरैशी के मुताबिक भगत सिंह एक स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने तत्कालीन भारत को आजादी दिलाने के लिए लड़ाई लड़ी थी. कोर्ट में दायर याचिका में उन्होंने कहा कि अविभाजित भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले भगत सिंह को खुद पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने भी श्रद्धांजलि दी थी. वह हिंदुस्तान ही नहीं पाकिस्तान के भी स्वतंत्रता सेनानी हैं. 

गौरतलब है कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह करने के कारण 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई थी. 

क्या था मामला

दरअसल 1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिए जबर्दस्त प्रदर्शन हुए थे. इनमें भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठीचार्ज भी किया. इसी लाठीचार्ज में घायल होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गयी. जिसके बाद भगत सिंह से रहा न गया. एक गुप्त योजना के तहत कथित तौर पर भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ पुलिस अधिकारी को मारने की योजना बनाई. 

17 दिसंबर 1928 को करीब सवा चार बजे, एएसपी सांडर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी. इसके बाद भगत सिंह ने 3-4 गोली दागीं. ये दोनों जैसे ही भागने लगे एक सिपाही चनन सिंह ने पीछा शुरू कर दिया. आज़ाद ने उसे रोका लेकिन नहीं मानने पर आज़ाद ने उसे गोली मार दी. 

इसके बाद मामला चला और 24 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी देने की तारीख मुकर्रर हुई. लेकिन ब्रिटिश पुलिस ने जनाक्रोश से बचने के लिए 23 मार्च 1931 की शाम 7.30 पर इन्हें लाहौर जेल में फांसी पर लटका दिया. केवल 23 वर्ष 5 माह और 23 दिन की उम्र में ही भगत सिंह को फांसी की सजा दे दी गई थी.

First published: 1 February 2016, 23:07 IST
 
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