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भारत में लगातार बढ़ती गर्मी की वजह क्या है और उपाय क्या है?

द कन्वर्सेशन | Updated on: 30 May 2016, 22:28 IST
(गेट्टी)

भारत के राजस्थान राज्य में फलोंदी नामक शहर में 19 मई को तापमान रिकॉर्ड 51 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया. ये 1956 के पुराने रिकॉर्ड तापमान से 0.4 डिग्री सेल्सियस अधिक था.

भारत में गर्मी में तापमान अक्सर 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहता है. जब तापमान 45 डिग्री सेल्सियस पहुंच जाता है तो मौसम विभाग के अधिकारी लू की चेतावनी जारी करते हैं.

लेकिन इस साल तापमान कई बार 45 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर पहुंचा. भारत के कई हिस्से लू की चपेट में आए. आखिर भारत में इस बार इतनी गर्मी की क्या वजह है?

भारत में इस समय भारी सूखा पड़ा हुआ है. पूरे देश में पानी का संकट है. सूखे के कारण जो ताप ऊर्जा वाष्पीकरण में काम आती है वो वायुमंडल का तापमान बढ़ाने लगती है.

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सूखे और लू का आपसी संबंध पर वैज्ञानिक शोधरत हैं. हालांकि हम इतना जरूर जानते हैं कि सूखा से लू का प्रभाव और अवधि बढ़ सकती है. 

मध्य भारत और दक्षिण भारत में अप्रैल में लू का कारण सूखा भी हो सकता है. मई में राजस्थान में अक्सर तापमान बहुत ज्यादा होता है इसलिए इस साल भी यहां सबसे अधिक तापमान होने पर किसी को हैरानी नहीं हुई.

अल-नीनो प्रभाव

इस साल अल-नीनो प्रभाव में भी रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई. अल-नीनो का वैश्विक तापमान से सीधा संबंध हैं.

भारत के कई इलाकों में लू के पीछे भी अल-नीनो का असर देखा जा रहा है. हालांकि अल-नीनो से राजस्थान के तापमान का कोई सीधा संबंध नहीं है.

भारत में प्रदूषण की समस्या भी काफी गंभीर है. घरेलू ईंधन और लकड़ी के जलावन की इस प्रदूषण में बड़ी भूमिका होती है. भारत में हर साल इसकी वजह से चार लाख लोग काल के गले में समा जाते हैं.

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इस तरह के प्रदूषण में एयरोसोल नामक सूक्ष्मकण पाया जाता है. एयरोसोल सूर्य की किरणों को धरती पर पहुंचने से पहले ही वापस कर देता है या सोख लेता है. जिससे वातावरण ठंडा होता है. इसकी अत्यधिक उच्च तापमान की संभावना कम हो जाती है.

स्मॉग से तापमान पर लगने वाली ऐसी लगाम के बावजूूद राजस्थान में तापमान 51 डिग्री सेल्सियस चले जाना चिंताजनक है.

अत्यधिक गर्मी की अवधि

2013 में हुए एक अध्ययन के अनुसार 1951 से 2010 के बीच भारत में अत्यधिक तापमान के ट्रेंड में कोई बड़ा बदलाव नहीं नजर आता है. अत्यधिक वायु प्रदूषण तापमान के एक सीमा से कम रहने के पीछे एक बड़ा कारण हो सकता है. 

हालांकि इस अध्ययन में ये बात भी सामने आई कि अत्यधिक तापमान के मामले में भले ही कोई चिंताजनक बढ़ोतरी न हुई हो लेकिन गर्मी की अवधि बढ़ती जा रही है.

कम से कम छह दिन तक अत्यधिक गर्मी रहने पर उसे लू माना जाता है. चिंताजनक बात है कि भारत में 1951-2010 के बीच हर दशक में अत्यधिक तापमान वाले दिन की अवधि में औसतन तीन दिन की बढ़ोतरी हो रही है. जो पूरी दुनिया में सर्वाधिक वृद्धि दर है.

भारत में अधिकतम तापमान में बहुत चिंताजनक बढ़ोतरी नहीं हुई है लेकिन तेज गर्मी की अवधि में काफी वृद्धि हुई है

'गरम हवा अवधि सूचकांक' से पता चलता है कि भारत में 1961-90 के औसत अवधि में काफी अधिक वृद्धि हुई है.

ये ध्यान रखने की बात है कि ये सूचकांक सालान ट्रेंड को दिखाता है. क्लाइमडेक्स पर मौजूद मासिक ट्रेंड को देखा जाए तो भी मई में औसत भारतीय तापमान में पिछले 60 सालों में काफी वृद्धि हुई है. 

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार 1961-2010 के दौरान मार्च से जुलाई के बीच देश में औसतन आठ दिन लू के रहे. 'सामान्य' और 'तेज' लू की अवधि में पिछले एक दशक में ज्यादा बढ़ोतरी हुई है.

अल-नीनो प्रभाव के बाद उत्तर-पश्चिम भारत में लू का प्रभाव ज्यादा होने की संभावना होती है. आशंका है कि गर्मी का असर आने वाले सालों में बढ़ेगा लेकिन इसका स्पष्ट ट्रेंड क्या रहेगा ये अभी साफ नहीं है.

भविष्य क्या होगा?

ज्यादातर जलवायु मॉडल भारत में तापमान की वृद्धि का ट्रेंड पकड़ने में विफल रहते हैं क्योंकि उनमें एयरोसोल जैसे स्थानीय कारणों को जरूरी तवज्जो नहीं दी जाती. 

इसलिए इस संदर्भ में किसी तरह की भविष्यवाणी करने में ऐसे मॉडल बहुत मददगार नहीं साबित होते.

भारत में वायु प्रदूषण जारी रहने या बढ़ने पर तापमान बढ़ेगा या नहीं ये कहना मुश्लिक है. हालांकि सैद्धांतिक तौर पर इसके बढ़ने की ही आशंका है.

यूरोप में 1980 के दशक में तापमान स्थिर रहता लेकिन जब वहां वायु प्रदूषण निंयत्रित हुआ तो तापमान में तेज बढ़ोतरी हुई.

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ऐसे में बहुत संभव है कि भारत के लिए प्रदूषण अत्यधिक गर्मी से ढाल का काम कर रहा है. प्रदूषण दूर होने के क स्थानीय स्वास्थ्य लाभ होंगे लेकिन इससे भविष्य में लू के तेज होने की भी आशंका रहेगी. जलवायु परिवर्तन से होने वाली ग्लोबल वार्मिंग से भी गर्मी के बढ़ने की आशंका है.पिछले साल भारत और पाकिस्तान में गर्मी से मरने वालों की बड़ी तादात रही थी. इस साल अब तक एक हजार से अधिक लोगों की गर्मी के कारण मौत हो चुकी है.

जाहिर है दोनों देशों को इसके समाधान की दिशा में तत्काल कदम उठाना होगा. इसकी शुरुआत ग्लोबल वार्मिंग पर हुए पेरिस समझौते को गंभीरता से लेने से की जा सकती है. तभी भारत समेत इस पूरे क्षेत्र को अत्यधिक गर्मी और लू से बचाया जा सकता है.

(साराह पर्किन-कर्कपैट्रिक, यूएनएसडब्ल्यू में रिसर्च फेलो हैं, एंड्रू किंग, यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबॉर्न में क्लाइमेट एक्सट्रीम रिसर्च फेलो हैं और गीर्ट जैन वैन ओल्डेनबॉर्ग रॉयल डच मेटेरोलॉजिकल इंस्टिट्यूट में क्लाइमेट रिसर्चर हैं.)

ये लेख मूलतः द कॉन्वर्सेशन पर प्रकाशित हुआ है. मूल आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं.

First published: 30 May 2016, 22:28 IST
 
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