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'मुंहतोड़ जवाब' से उत्तरप्रदेश में भाजपा को कितना फायदा मिलेगा?

सुहास मुंशी | Updated on: 4 October 2016, 7:47 IST
QUICK PILL
  • यूपी में पिछड़े वर्ग के किसी भी बड़े राजनेता ने सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर प्रतिक्रिया नहीं की है. 
  • उना की घटना ज्यादा असरदार है. दलित-अत्याचार और मुस्लिम असुरक्षा के मुद्दे सर्जिकल स्ट्राइक से ज्यादा दिन टिकने वाले चुनावी मुद्दे हैं.

उत्तरप्रदेश में भाजपा अपनी चुनावी मुहिम में सर्जिकल स्ट्राइक से तुरंत लाभ नहीं ले सकेगी. चुनावी माहौल में अभी गर्मी नहीं है, चुनाव कम से कम पांच महीने दूर हैं, तब तक 'मुंहतोड़ जवाब' और 'मोदी का 56 इंच सीना' की ओर मतदाताओं का ध्यान खींचने में शायद काफी देर हो जाए. और तब तक सर्जिकल स्ट्राइक भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में एक बहुत ही मामूली घटना बन कर रह सकती है.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कैच को बताया कि किसी भी तरह की रैली निकालने या सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर जनता की भावनाओं को भुनाने की हमारी कोई योजना नहीं है. पूरे देश में भाजपा ने कहीं भी जश्न नहीं मनाए, जो शुरू में लोगों को हैरान कर सकते हैं.

कोझिकोड से प्रधानमंत्री ने वादा किया था कि उरी हमले में सैनिकों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी, पर उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की है और अमित शाह ने ट्विटर पर केवल बेपरवाही से बधाई संदेश दिया. गौरतलब है कि सर्जिकल स्ट्राइक के दिन अमित शाह को मीडिया से संवाद करना था, जिसे अंत समय में कैंसल कर दिया गया था.

सबको यह वजह बताई गई कि सेना इन स्ट्राइक्स का खुद श्रेय नहीं लेना चाहती. जबकि सच यह है कि पार्टी जानती है कि इस समय सीना ठोकना फायदेमंद नहीं रहेगा.

पिछले मंगलवार को हुए सर्जिकल स्ट्राइक से भाजपा को स्थितियां अपने पक्ष में लगी होंगी, पर यदि पाकिस्तान पलटवार करना तय करता है और अपना दांव खेलता है, तो भाजपा अपनी प्रतिक्रिया को लेकर बहुत स्पष्ट नहीं है. पलटवार तो पाकिस्तान देर-सवेर करेगा ही. बारामुला में हुआ आतंकी हमला इसकी एक बानगी भर है.

छोटे स्तर पर किया गया युद्ध निश्चित रूप से भाजपा के पक्ष में रहेगा. पर यह तो तय है कि 2019 के आम चुनावों से पहले पार्टी के कार्यकर्ता अपने उत्साह को खत्म नहीं करना चाहते, जबकि यह युद्ध उन्हें जबरदस्त फायदा दे सकता है.

इसके अलावा पहले हुए चुनावों में भी भाजपा अपनी प्रतिक्रियाओं को भुना नहीं सकी थी. भाजपा आतंकी हमलों के समय में भी लोगों का अपनी ओर ध्यान खींचने में ज्यादा सफल नहीं रही थी. और तब भी जब उसके नेतृत्व वाली सरकार ने आतंकियों और पाकिस्तान तक के खिलाफ आक्रामकता दिखाई.

करगिल युद्ध का ही उदाहरण लें. सब मान रहे थे कि युद्ध का भाजपा के भविष्य पर पूरे देश में सकारात्मक असर रहेगा (दावा जिस पर बहस की जा सकती है), सच्चाई यह है कि जैसे ही देश में चुनाव हुए उत्तरप्रदेश में पार्टी को हार देखनी पड़ी- उसकी सीटें आधी गिर गईं.

राज्य में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले उत्तर प्रदेश में हुए स्थानीय हमलों का भी उदाहरण ले सकते हैं. मार्च 2006 में वाराणसी में सीरियल ब्लास्ट हुए, 28 मरे और 101 लोग हताहत हुए. उस समय भाजपा ने पाकिस्तान के खिलाफ काफी बड़ा आंदोलन शुरू किया था. पर एक साल बाद जब राज्य में चुनाव हुए, बसपा भारी बहुमत से जीती. और भाजपा की सीटें पूर्व विधानसभा की तुलना में 40 फीसदी से ज्यादा गिर गईं.

2006 बम विस्फोट चुनाव 2002 2007

चुनाव       2002                                                         2007

सपा         143 सपा  97 बसपा 98 भाजपा कांग्रेस 25          206 बसपा, 88 सपा, भाजपा 51, कांग्रेस 22

करगिल युद्ध मई-जुलाई 1999 चुनाव सितंबर-अक्टूबर 1999

और फिर उत्तरप्रदेश में अल्पसंख्यक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग इससे किताना प्रभावित होते हैं, और राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे को लेकर भाजपा के सर्जिकल स्ट्राइकों के  प्रलोभन को वे किस रूप में लेते हैं, इस समय स्पष्ट नहीं है. जो बात साफ है, वह यह कि यूपी में पिछड़े वर्ग के किसी भी बड़े राजनेता ने सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर प्रतिक्रिया नहीं की है.

मायावती ने जरूर बेमन से स्ट्राइक की तारीफ की, पर पठानकोट हमले के लिए इसे देर से प्रतिक्रिया बताई. सच तो यह है कि उना की घटना उत्तरप्रदेश में ज्यादा असरदार है. दलित-अत्याचार और मुस्लिम असुरक्षा के मुद्दे सर्जिकल स्ट्राइक से ज्यादा दिन टिकने वाले चुनावी मुद्दे हैं.

मोदी के एलओसी पार सर्जिकल स्ट्राइक के आदेश से एक हफ्ते पहले, दस साल के एक पिछड़ी जाति के लड़के को तथाकथित भैंस चुराने के आरोप में कोड़े मारे गए और उसके गुप्तांगों पर पेट्रोल डाला गया. भाजपा को ये मुद्दे बार-बार तंग करते रहेंगे, खासकर जिग्नेश मेवानी जैसे नए और युवा नेता करेंगे, जिन्होंने उत्तरप्रदेश में दलितों के अत्याचार और भाजपा के खिलाफ रैलियां निकालने का वादा किया है.

पार्टी की फिलहाल ब्राह्मणों के बीच भी स्थिति अच्छी नहीं है. वे खुद को पार्टी से उपेक्षित महसूस करते हैं. ब्राह्मणों के दयाशंकर सिंह जैसे ठाकुर नेताओं को, मायावती को पहले वैश्या कहने और फिर गली के कुत्ते से तुलना करने पर पार्टी से बाहर फेंक दिया गया. इन सब वजहों से भी राज्य में भाजपा को अपना मकसद पूरा करने में मदद नहीं मिलेगी. धम्म चेतना यात्रा के माध्यम से भाजपा की दलितों तक पहुंचने की कोशिश भी उन्हें अपनी ओर नहीं खींच पाई.

क्या सीएम उम्मीदवार के नाम की घोषणा होगी?

अंत में पार्टी के सामने यूपी में काफी चुनौतियां हैं. पहला मुद्दा मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार का है. वे चुनाव से पहले मुख्यमंत्री के लिए उम्मीदवार की घोषणा करेंगे या नहीं. पार्टी के सूत्रों के मुताबिक इस पर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है. जब भी इस संबंध में फैसला लिया जाएगा, इसका असर मतदाताओं के कई वर्गों पर होगा और पार्टी के भीतर अहं टकराएंगे.

योगी आदित्यनाथ इस शीर्ष पद के लिए दावा कर रहे हैं, जबकि माना जा रहा है कि राजनाथ सिंह इस दौड़ से बाहर हैं. पार्टी के सामने दूसरी चुनौती आपसी मतभेद की है. पार्टी ने हर पार्टी से नेता लिए हैं-बसपा, सपा और कांग्रेस. और इससे पार्टी में गंभीर टकराहट, मतभेद और गैरविश्वासकी भावना आई है.

जाहिर है, पार्टी के कार्यकर्ता जो यहां पिछले कई सालों से काम कर रहे हैं, पार्टी में आए नए लोगों का हस्तक्षेप पसंद नहीं कर रहे हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, राज्य के सबसे वरिष्ठ पार्टी के नेता और अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और पूर्व बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य में आई दरार, जिन्होंने हाल में भाजपा जॉइन की है.

स्वामी प्रसाद मौर्य बसपा-लोकतांत्रिक बहुजन मंच से अलग होने के बाद भाजपा के बैनर तले जन रैलियां निकाल रहे हैं. इससे राज्य के नेता खुश नहीं हैं. स्वामी प्रसाद मौर्य ने बसपा नेता के तौर पर हिंदू देवी-देवताओं की जिस तरह खिल्ली उड़ाई थी, उसे भी संघ के कार्यकर्ता भूले नहीं है.

इसलिए पार्टी और संघ के कार्यकर्ता इन 'आउटसाइडर्स' से बेहद खफा हैं. कहा जा रहा है कि आरएसस ने हस्तक्षेप करके 'आउटसाइडर्स' के लिए अधिकतम संख्या तय कर दी है, जिसे भाजपा स्वीकार कर सकता है. पर यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि इस सलाह को भाजपा कितनी गंभीरता से लेगी.

हालांकि सर्जिकल स्ट्राइक से पार्टी के तनाव में कमी आई हो, और अपने कार्यकर्ताओं को कुछ समय के लिए खरीद लिया है, पर पार्टी जो संघर्ष उरी हमले से पहले कर रही थी, वही करती रहेगी. यदि पाकिस्तान उसके विरोध में कोई बड़ा कदम नहीं उठाता है (पर उसकी आशंका है), तो पार्टी 'मुंहतोड़ जवाब' का फायदा जरूर उठाने की कोशिश करेगी. ज्यादा से ज्यादा यह संभव है कि सर्जिकल स्ट्राइक उसे अपने साथ कुछ लोगों को जोडऩे में मदद करेंगे. उसके बाद भाजपा नेता क्या कहते हैं, देखना बाकी है.

First published: 4 October 2016, 7:47 IST
 
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