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हिमाचल प्रदेशः नशे का नाश करने के लिए सरकारी अभियान

राजीव खन्ना | Updated on: 22 August 2016, 7:36 IST

चूंकि पंजाब में विधानसभा चुनावों के मददेनजर नशा एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है तो पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में भी हर्बल और सिंथेटिक दोनों प्रकार की नशीली दवाओं के सेवन पर रोक लगाने की कवायद शुरू कर दी गई है. भांग-अफीम के पौधों को जड़ से उखाड़ फेंकने के अभियान के अलावा राज्य सरकार ने एक कार्य योजना तैयार की है, जिसके अनुसार रोकथाम के अन्य उपायों के साथ ही, सिंथेटिक दवाओं के दुरुपयोग पर पाबंदी लगाई जाएगी.

राज्य सरकार इसकी शुरुआत 22 अगस्त से एक 15 दिवसीय अभियान चला कर करेगी, जिसके तहत भांग के पौधे उखाड़े जाएंगे. इस मौसम में भांग की फसल भरपूर होती है. साथ ही शहरी इलाकों में पांव पसार रही सिंथेटिक दवाओं की लत पर भी रोक लगाने के उपाय किए जाएंगे. 

दशकों से हिमाचल प्रदेश भांग और इसके और अन्य रूपों खासकर सुल्फा, चरस या हशीश के लिए दुनिया भर में मशहूर है. दुनिया भर से यहां पर्यटक आते हैं. बस आपको इतना करना है थोड़ा जोर से बोलना है ‘मलाना क्रीम’ और लोग खुद-ब-खुद चले आएंगे, खास तौर पर विदेशी, चाहे देश की कोई भी मेट्रो सिटी हो. मलाना क्रीम कुल्लु जिले के मलाना गांव के चारों ओर के इलाकों की लोकप्रिय भांग है.

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यह गांव इसलिए भी जाना जाता है कि यहां अब भी सदियों पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है और स्थानीय लोगों का कहना है कि यह गांव दुनिया का सबसे पहला लोकतांत्रिक गांव है.

कुल्लू के अलावा भांग के उपभोक्ता मंडी, शिमला एवं सोलन और सिरमौर के गांवों में भी काफी संख्या में मिलते हैं. राज्य से देश के दूसरे भागों, यहां तक कि विदेशों में हशीश की तस्करी की जाती है.

यद्यपि भांग और इसी की तरह के और नशे के पदार्थों के सेवन की परंपरा रही है लेकिन जैविक होने के कारण इन्हें नुकसानदेह नहीं माना जाता, सिंथेटिक दवाएं युवाओं के बीच अधिक लोकप्रिय हो रही हैं. युवा जल्द ही इनकी गिरफ्त में आ जाते हैं, खास तौर पर शहरी इलाकों में, जहां काफी संख्या में निजी शिक्षण संस्थान और औद्योगिक क्षेत्र हैं.

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ग्रामीण क्षेत्रों में भांग का करोबारी महत्व भी काफी है. यह फसल कई ग्रामीणों के लिए सीधी नगदी ही है

राज्य के मुख्य सचिव वीसी फरका ने प्रदेश के लोगों का आह्वान किया है कि वे सार्वजनिक और निजी दोनों जमीनों पर से भांग के पौधे हटा दें. पुलिस के अलावा जंगल, राजस्व तथा ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग के कर्मचारी भी इस अभियान में भाग लेंगे. सरकार इसमें युवक मंडलों, महिला मंडलों और एनएसएस व एनसीसी के स्वयंसेवकों को भी शामिल करेगी.

फरका ने कानूनी एजेंसियों को सही जानकारी देने के लिए समाज का आह्वान करते हुए कहा कि वे इस अभियान में मंदिर अधिकारियों, शैक्षणिक संस्थानों और काॅरर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के तहत पावर प्रोजेक्ट आदि को शामिल करने की संभावनाएं तलाशें. सीएसआर के तहत ये एजेंसियां इस नेक काम में शामिल हो कर नशा मुक्ति केंद्र स्थापित कर सकती हैं.

ग्रामीण क्षेत्रों में भांग का करोबारी महत्व भी काफी है. यह फसल कई ग्रामीणों के लिए सीधी नगदी ही है. कई जगह देखा गया है कि ग्रामीणों ने पौधों से चरस निकालने के लिए श्रमिकों को नौकरी पर रखा है.

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सूत्रों ने बताया कि फसल के एक हिस्से को लकड़ी के पट्टे पर पीट-पीट कर चरस जल्दी निकाल लिया जाता है.

गौरतलब है कि यहां पैदा होने वाली यह भांग अपेक्षाकृत नेपाली किस्म से सस्ती है, जिसे दूसरे राज्यों के पर्यटकों को दिया जाता है और असली हिमाचली हशीश को गोआ और विदेशों में तस्करी के लिए  या फिरंगियों के लिए अलग रख दिया जाता है. नेपाली और हिमाचली किस्म की तुलना की जाए तो इनकी कीमतों में 15 गुना का फर्क नजर आता है.

सूत्रों का कहना है कि नेपाली हशीश की कीमतें 10,000 से 12,000 रुपये प्रति किलोग्राम हैं जबकि मलाना की कीमत 2.5 लाख से लेकर 3 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक है. नशीली दवाओं के आपूर्तिकर्ता और ड्रग माफिया द्वारा राज्य में लाए गए युवाओं के लिए इस व्यापार में बहुत ज्यादा फायदा है.

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चरस लेने के लिए हिमाचल जाने वाले पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के युवाओं की संख्या अब विदेशियों से अधिक है

हिमाचली किस्म की तस्करी करने के लिए नित नए तरीके अपनाए जाते हैं. जैसे खाली नारियल के खोल में कंडोमों के रूप, धार्मिक किताबों, फल के डिब्बों यहां तक कि अचार और शहद के जारों में.

एक रिपोर्ट के मुताबिक चरस लेने के लिए हिमाचल जाने वाले पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के युवाओं की संख्या अब विदेशियों से अधिक है. पर्यवेक्षकों का कहना है कि आज की तारीख में राज्य के लिए बड़ी चुनौती है सिंथेटिक दवाएं.

शिमला में एक पत्रकार ने कहा, ‘‘हिमाचल के भीतर भांग कभी कोई बड़ी समस्या नहीं रही, बस इसकी तस्करी और विदेशों से तार जुड़े होना शर्मिंदगी का कारण है. लेकिन सिंथेटिक दवाओं ने स्थानीय लोगों को अपने जाल में जकड़ रखा है. सरकार को समय-समय पर विश्वसनीय एजेंसियों के माध्यम से सर्वे करवाने की जरूरत है ताकि समस्या की जड़ तक पहुंचा जा सके और लघु व दीर्घकालिक रणनीति तैयार की जा सके. और तो और सिंथेटिक दवाओं का खतरा बड़ी चिंता है, खासकर शहरी क्षेत्रों में जहां निजी शिक्षण संस्थान और औद्योगिक क्षेत्र अधिक है."

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राज्य के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने संकेत दिए हैं कि ड्रग निर्माताओं पर नकेल कसने की जरूरत है. साथ ही नियम-कानून में संषोधन करने की भी ताकि ड्रग निर्माता, विक्रेता और डीलरों के बीच के गिरोह को तोड़ा जा सके, जो युवाओं को नशे की लत के गर्त में धकेल रहेे हैं.

दूसरी तरफ नगदी फसलों के उगाने को प्रोत्साहन देने का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा, हालांकि हिमाचल को पूर्णतः नशा मुक्त राज्य बनने में अभी समय लगेगा लेकिन इस बुराई को सही मायनों में जड़ से खत्म करने के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं, उसमें सबकी भागीदारी जरूरी है.

कुछ ही दिनों पूर्व शिमला में आयोजित एक बैठक में उन्होंने यह निणर्य लिया था कि स्वास्थ्य विभाग में और ड्रग निरीक्षकों की भर्ती की जाए ताकि ऐसी दवाएं बेचने वाले दुकानदारों को सामने लाया जा सके.

इससे कानून का उल्लंघन करने वालों को दंड दिया जाएगा और यह अपराध गैर जमानती होगा

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सिंह ने और अधिक नशा मुक्ति केंद्र खोलने के लिए सिविल सोसायटी संगठनों का आह्वान किया है, खासकर बड़ी-बारोटीवाला-नालागढ़ क्षेत्र में जो कि बड़ा औद्योगिक हब बन कर उभरा है. यहां युवाओं में नशीली दवाओं की लत में बढोतरी देखने को मिली है.

प्रधान सचिव (स्वास्थ्य) प्रबोध सक्सेना दवा एवं सौंदर्य प्रसाधन ने अधिनियम में संशोधन की बात कही. उन्होंने कहा कि इससे कानून का उल्लंघन करने वालों को दंड दिया जाएगा और यह अपराध गैर जमानती होगा.

उन्होंने यह भी कहा कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को एक पत्र लिखा जाएगा, जिसमें उनसे आग्रह किया जाएगाा कि वे कुछ दवाओं को नियंत्रित दवाओं की श्रेणी में बदलें. इससे दवा विक्रेताओं पर छापे आदि मार कर दवाओं की मात्रा आदि पर निगरानी रखी जा सकेगी.

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प्रदेश दवा नियंत्रक नवनीत मारवाह ने कैच न्यूज से बातचीत में कहा, ‘दवा और सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम की धारा 18 (सी) में एक संशोधन की जरूरत है जिसके अनुसार बिना लाइसेंस सिंथेटिक दवाएं नहीं रखी जा सकेंगी. यहां तक कि फार्मा उत्पाद जैसे कफ सीरप, पेन किलर और अन्य मामूली दवाओं के आम उपभोक्ताओं को भी ये दवाएं रखने के लिए डाॅ. की पर्ची रखनी होगी, क्योंकि ये दवाएं नशे के आदी भी खरीदते हैं. सिंथेटिक दवाओं के दुरुपयोग की रोकथाम के लिए काफी मशक्कत करनी होगी.

First published: 22 August 2016, 7:36 IST
 
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