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सीमावर्ती इलाकों के ग्रामीणों के 'चीन चलो' अभियान से चिंतित सुरक्षा एजेंसियां

राजीव खन्ना | Updated on: 24 June 2016, 15:46 IST

भारतीय सीमा में चीन के जबरन प्रवेश की खबरें समय-समय पर भारतीय संसद में गूंजती रहती हैं. ऐसे में भारतीय एजेंसियां सीमावर्ती गांवों के लोगों को ले बारे में काफी सजग रहते हैं कि कहीं वे पड़ोसी देश के साथ हमदर्दी या निकटता तो नहीं दिखा रहे.

एजेंसियां ऐसी किसी भावना को रोकने के लिए इन ग्रामीणों को साथ मिला कर चलने की कोशिश करती हैं. लेकिन यहां असल मसला यह है कि चूंकि हिमालय में बसे ये सीमावर्ती गांव विकास से वंचित हैं और इनमें मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, ऐसे में समय-समय पर इस तरह की आवाजें उठना स्वाभाविक ही है.

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इस बारे में ताजा उदाहरण उन रिपोर्टों के रूप में आया है जिनमें कहा गया है कि भारतीय सेना ने हिमाचल प्रदेश के स्पिति क्षेत्र में पिन घाटी के जनजातियों की मदद करने की घोषणा की है. यह कदम उस घटना के दो साल बाद उठाया गया है जब विकास के वादे पूरा न करने वाली सरकारों से निराश हो कर कुछ जनजातीय लोगों ने टूटी सड़कों-पुलों की मरम्मत और बुनियादी ढांचे से जुड़े अन्य कामों में चीन की मदद लेने की धमकी दी थी.

हालांकि तभी से अधिकारियों ने लोगों तक अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिशें तेज कर दी हैं. सेना के लोग प्रेरणास्पद बातें कर रहे हैं और क्षेत्र में मेडिकल कैंप आयोजित करने की उनकी योजना की भी खबरें आ रही हैं. दूसरी ओर राज्य प्रशासन क्षेत्र में जरूरी मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने की कोशिश कर रहा है.

गुस्से में दी धमकी

दो साल पहले, कुंगरी और सगनाम पंचायतों के दो पूर्व प्रधानों को गिरफ्तार किया गया था और कथित तौर पर ‘चलो चीन’ का नारा देने के कारण उन पर राजद्रोह का अभियोग लगाया गया था. 

स्पिति में रहने वाले एक प्रेक्षक बताते हैं, “हालांकि यह घोर निराशा में उठाये गये कदम से ज्यादा नहीं था, लेकिन इस मामले पर मीडिया में आई रिपोर्टें सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़े धक्के की तरह थीं जिनके चौकन्ने लोगों ने क्षेत्र में जमघट लगा रखा था. जून 2012 में किरी (एक छोटी नदी) में आयी बाढ़ ने उस पुल को नुकसान पहुंचाया था, जो पिन घाटी के 13 गांवों को राज्य के बाकी हिस्सों से जोड़ता है. वह पुल स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े सहारे की तरह था. लेकिन सरकार उस पुल को बनाने की कोई कोशिश नहीं कर रही थी और ग्रामीण उस नदी को पार करने की कोशिश में अपनी जान जोखिम में डाल रहे थे. ऐसे में उपजे गुस्से की वजह से वह धमकी सामने आयी थी. ग्रामीण खास तौर पर इस बात से आंदोलित थे कि अपनी मटर की फसल वे बाहर नहीं ले जा पा रहे थे. तब से सरकार ने वहां काफी अधिक काम किया है. वहां सड़कें बनी हैं, एक नया पुल बन रहा है और मोबाइल टावर लग रहे हैं.” 

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पिन घाटी दरअसल स्पिति रिवर कैचमेंट का एक हिस्सा है और तिब्बत की सीमा के नजदीक है. सांस्कृतिक लिहाज से भी यह सीमा पार के पड़ोसी गांवों के काफी नजदीक है.

स्थानीय विधायक रवि ठाकुर दावा करते हैं कि वहां विकास की गति तेज करने की पहल राज्य सरकार ने की है, न कि सेना ने. वह कहते हैं, “सेना तभी हस्तक्षेप करेगी जब राज्य सरकार ऐसा करने का अनुरोध करेगी. मामले का हल निकाल लिया गया है लेकिन विपक्षी दल भाजपा के कुछ लोग समय-समय पर इसे फिर से उभारने की कोशिश करते रहते हैं. हम लोग मुध और भाभा गांवों के बीच 80 किलोमीटर स्टेट हाइवे बना रहे हैं, स्पिति में 1000 मेगावॉट के सौर ऊर्जा संयंत्र के लिए 2500 बीघा जमीन आवंटित की गयी है, इसकी लागत 5,000 करोड़ रुपये होगी. इसके अलावा 2.5 मेगावॉट का एक प्लांट भी बन रहा है.”

उत्तराखंड के हालात

हिमाचल प्रदेश से अपने आप में यह एक अलग तरह की घटना है जिसकी खबर आने के बाद सीमावर्ती गांवों की दिक्कतों का हल निकालने में काफी हद तक मदद मिली है. लेकिन उत्तराखंड में हालात खराब बने हुए हैं. 

राज्य में तिब्बत और नेपाल की सीमा पर बसे गांवों से लोगों का पलायन जारी है जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय है. वहीं न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र सरकार इस मामले को प्रभावी तरीके से हल कर सके हैं.

उत्तराखंड के पांच जिले अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगते हैं

सामाजिक कार्यकर्ता अनिल जोशी कहते हैं, “पड़ोसी देशों के साथ निकटता की आवाजें तब तक उठती रहेंगी जब तक सरकारें सीमावर्ती गांवों के लोगों के लिए एक ठोस योजना ले कर नहीं आतीं. सरकारें चुप रह जाती हैं अगर निकटता म्यांमार या नेपाल जैसे छोटे देशों के साथ दिखायी जाती है, जिनसे कोई खतरा नहीं है. लेकिन चीन और पाकिस्तान की बात आने पर मामला अलग हो जाता है.

राज्य के पांच जिले अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से लगे हैं. इन जिलों में हजारों की संख्या में उजाड़ गांव हैं. ऐसे गांव को उजाड़ गांव कहा जा सकता है जहां महज कुछ परिवार रह रहे हों. इन गांवों से लोगों के बाहर जाने की औसत दर लगभग 40 फीसदी है. सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम के पैसों का उपयोग स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं की बेहतरी में करने में सरकारें नाकाम रही हैं.” जोशी ने सितंबर से पूरे राज्य में दूसरी ‘गांव बचाओ यात्रा’ शुरू करने की योजना बनायी है.

इसी तरह का एक प्रत्यक्ष उदाहरण तब दिखा जब राज्य के अधिकारियों ने पिथौरागढ़ के नामिक गांव के लोगों का मान-मनौव्वल करने की कोशिश की कि वे जिला मुख्यालय तक प्रस्तावित अपनी 165 किलोमीटर की यात्रा न करें. ये लोग

मूलभूत सुविधाओं की अपनी मांगों के प्रति सरकारी उदासीनता के खिलाफ यह यात्रा निकाल रहे थे. 

अधिकारियों ने वादा किया है कि सड़कें बनाने के अलावा गांव में एक एएनएम सेंटर खोला जायेगा. यह सुविधा अभी वहां से 27 किलोमीटर दूर नचनी में उपलब्ध है. जो अन्य वादे किये गये हैं उनमें शामिल हैं पोस्ट ऑफिस के जरिये छात्रवृत्ति और वेलफेयर पेंशन दिलाना और गांव के हाईस्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति.

क्षेत्र के एक राजनीतिक और सामाजिक प्रेक्षक कहते हैं कि नामिक दरअसल गढ़वाल और कुमाऊं दोनों ही क्षेत्रों में सीमावर्ती गांवों की खराब स्थिति का प्रतीक है. वह कहते हैं, “क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि यातायात का कोई साधन पकड़ने के लिए लोगों को पहाड़ों के बीच 27 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के तहत गांव में मिल जाने वाले सामान के अलावा अन्य चीजों के लिए लोगों को 54 किलोमीटर का आना-जाना करना पड़ता है. अगर उन्हें नमक, कपड़े, साबुन या अन्य सामान अपने गांव में ही खरीदना हो, तो इसके लिए उन्हें उनकी खुदरा कीमत का आठ से दस गुना चुकाना पड़ता है क्योंकि खच्चर से सामान गांव ले आकर बेचने वाले अधिक मुनाफा वसूलते हैं.”

कई गर्भवती औरतों ने नचनी आते समय रास्ते में दम तोड़ दिया. बुजुर्गों को अपनी पेंशन के लिए 37 किलोमीटर चल कर नचनी के नजदीक क्विती आना पड़ता है, क्योंकि बैंक वहीं पर है.

एजेंसियों की नींद

हाल ही में चुने गये राज्य सभा सांसद प्रदीप टम्टा ऐसे लोगों में से हैं जो एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर और एक राजनीतिज्ञ के तौर पर भी इन मसलों को काफी प्रमुखता से उठाते रहे हैं. वह टनकपुर से ले कर बागेश्वर के बीच रेलवे लाइन की लगातार मांग करते रहे हैं. 

यह मांग आजादी के पहले से ही लंबित है. यह रेलवे लाइन न केवल आर्थिक विकास के लिहाज से बल्कि रणनीतिक दृष्टिकोण से भी काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह क्षेत्र नेपाल और चीन की सीमा से लगा है. वह चाहते हैं कि यह परियोजना सामाजिक रूप से आवश्यक रेल संपर्क प्रस्ताव (सोशली डिजायरेबल रेल कनेक्टिविटी प्रपोजल्स) के तहत मंजूर हो जाये.

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साल 2014 तक एक लोक सभा सांसद के तौर पर उन्होंने एक जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को जोड़ने वाले ट्रांस हिमालयन हाइवे के लिए कोशिशें कीं. उनका कहना है कि यह आर्थिक विकास और पर्यटन को बढ़ावा देने के अलावा रणनीतिक रूप से भी काफी महत्वपूर्ण है.

उन्होंने कैच को बताया, “मैं अब इन मसलों को फिर से उठाऊंगा, खास तौर पर इस बात को कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने बीके चतुर्वेदी समिति की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. देश के पर्यावरण सेवा दाताओं के तौर पर काम करने वाले हिमालयन राज्यों को देश के नियोजित बजट का दो फीसदी देने की बात इस समिति की रिपोर्ट में कही गयी थी. यह पैसा सीमावर्ती गांवों में रह रहे लोगों की दिक्कतों को दूर करने में खर्च किया जायेगा. यूपीए सरकार ने इसे लागू करने को मंजूरी दे दी थी.”

सीमा पर बसे गांवों तक जब तक बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचंगी, तब तक यहां पड़ोसी देशों से निकटता का शोर उठता रहेगा. और इससे सुरक्षा एजेंसियों और राजनीतिक संस्थाओं की नींद उड़ती रहेगी.

First published: 24 June 2016, 15:46 IST
 
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