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हिमाचल प्रदेश: राजनेताओं को हाईकोर्ट की फटकार से सबक लेेने की जरूरत?

राजीव खन्ना | Updated on: 2 September 2016, 8:32 IST

हिमाचल प्रदेश में गैरकानूनी भवनों के नियमन को लेकर उच्च न्यायालय ने सरकार की तीखी आलोचना करके राजनेताओं को कड़ा संदेश दिया है. दरअसल वे नियमों को ताक पर रखकर दशकों से ऐसे अवैध निर्माण की अनुमति दे रहे हैं और जान-माल को भयंकर संकट में डाल रहे हैं. न्यायालय ने सरकार की इस बात को लेकर भी खिंचाई की कि वह वन भूमि पर हो रहे अवैध कब्जों को भी बेदखल करने का प्रयास नहीं कर रही है.

गैरकानूनी निर्माण और अवैध कब्जों को पूरे राज्य में बिना किसी दंड के राजनेताओं की स्वीकृति से संपन्न किया जा रहा है, जो ऐसे उल्लंघन को नियमित करने के लिए समझौता शुल्क लेकर रिटेंशन नीतियों के साथ जब तब आ रहे हैं. राजनेताओं के ये कारनामे भारत के लिए नए नहीं हैं, पर हिमालयी इलाकों की जब बात आती है, तो उनका असर अपेक्षाकृत काफी विनाशकारी होता है, जो पारिस्थितिकी दृष्टि से कमजोर और भूकंप के लिए अति सवंदनशील हैं.

ये कड़ी आलोचनाएं उसके तुरंत बाद हुईं, जब राज्य विधानसभा ने हाल में 'हिमाचल प्रदेश टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (अमेंडमेंट बिल)-2016' को पारित किया, जिसमें 'जैसा है वैसा' के आधार पर मानदंडों में ढील देकर 70 फीसदी तक शुल्क में अंतर कर दिया गया.

विडंबना है कि विपक्षी बीजेपी से लेकर कांग्रेस सरकार तक ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की. आलोचकों का मानना है कि यह चुप्पी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के कारण है और कोई भी अपने मतदाताओं को नाराज नहीं करना चाहता.

संशोधित विधेयक 'टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (संशोधन) अध्यादेश' का कमजोर संस्करण है, जो इस साल 8 जून को घोषित किया गया था. इसमें उन भवनों के नियमन के प्रावधान हैं, जो बहुत कम शुल्क पर अन्य छूट के साथ स्वीकृत किए गए थे. इसमें अन्य मकसद से पार्किंग फ्लोर्स भी शामिल हैं.

रपट के मुताबिक ये नियम बार-बार गड़बड़ी के आरोपियों को भी छूट देते हैं, जिन्होंने पहले की रिटेंशन नीतियों का लाभ उठाया है. समझौता शुल्क, जो अध्यादेश में नाम मात्र का है, को लगभग आधा कर दिया गया है और रपट के अनुसार शहरी इलाकों में 800 रुपए प्रति वर्ग मीटर की फ्लैट रेट पर और ग्रामीण इलाकों में 400 रुपए प्रति वर्ग मीटर मूल्य पर लिया जाएगा.

इसका मतलब है कि करोड़ों की कीमत वाले अनधिकृत भवनों को कुछ हजार रुपए का भुगतान करके नियमित किया जाएगा. एक मुकदमे में वन की रखवाली करने वाले गार्ड को दोषी ठहराते समय न्यायाधीश राजीव वर्मा और न्यायाधीश सुरेश्वर सिंह ठाकुर की खंडपीठ ने सरकार की तीखी आलोचना की, जो कि सरकार के लिए शर्म की बात है.

लोग अनधिकृत निर्माण और सरकारी जमीन पर कब्जा करते रहे और सरकारी मशीनरी मूक दर्शक बनी रही

न्यायाधीशों ने कहा, 'राज्य सरकार को अनधिकृत निर्माण का नियमन नहीं करना चाहिए और अवैध कब्जों को भी स्वीकृत नहीं करना चाहिए, जो वन भूमि पर हैं. राज्य से उम्मीद की जाती है कि वे कानून के राज को बनाए रखे. अनधिकृत निर्माण या कब्जों का नियमन करने की राज्य सरकार की कार्यवाही शासनहीनता का संकेत है. राज्य को बेईमानी की जगह ईमानदारी को प्रोत्साहित करना चाहिए.'

न्यायालय ने इस बात को रेखांकित किया कि हजारों की संख्या में बने अनधिकृत निर्माण रातों रात नहीं बन गए. उसने टिप्पणी की कि- 'लोग अनधिकृत निर्माण और सरकारी जमीन पर कब्जा करते रहे और सरकारी मशीनरी मूक दर्शक बनी रही. अधिकारियों की नाक के नीचे अनधिकृत निर्माण की स्वीकृति देना और बाद में उनका नियमन करना, संवैधानिक तंत्र या मशीनरी की विफलता दर्शाता है. राज्य के अधिकारियों या मशीनरी का यह रवैया शुतुरमुर्ग जैसा है.'

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि हजारों की संख्या में नियमित गैरकानूनी घर बनावट की दृष्टि से भी महफूज नहीं हैं. कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि हिमालय पर्वत शृंखलाएं भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील हैं. न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकारी संपत्ति का ट्रस्टी है और वह उसके विनाश का भागीदार नहीं बन सकता. साथ ही राज्य की संपत्ति पर अनैतिक लोगों को कब्जा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती.

उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को वन भूमि पर कब्जा और वहां फल के पेड़ लगाने वालों को चिह्नित करने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं. उनको वहां से बेदखल करने के आवश्यक कदम उठाने को कहा है. उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक को वन भूमि पर कब्जा करने वाले उन लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने को कहा है, जिन्होंने वहां फल वाले पौधे लगाए हैं और गलत तरीके से धन इकट्टा किया है. और वे अगले तीन महीनों के भीतर काले धन को वैध बनाने में लगे हैं.

इस बात को रेखांकित करना जरूरी है कि राज्य गैरकानूनी निर्माण की अबाध वृद्धि का साक्षी रहा है. शिमला, सोलन, मंडी और कुलू की स्थिति और भी खराब है. शिमला और सोलन में भवन खतरनाक जगहों पर जोखिम में लटक रहे हैं, जबकि अन्य दो जगहों पर वे जल-स्रोतों के पास हैं और यदि नदी हल्का-सा भी अपना रुख बदलती है, तो वे कभी भी गिर सकते हैं. विडंबना की बात है कि गैरकानूनी निर्माण जिला न्यायालयों के काफी नजदीक बने हुए हैं.

यह खुला राज है कि नक्शों और वास्तविक निर्माण में कोई संगति नहीं है क्योंकि नगर निकाय और अन्य विभाग के अधिकारियों ने भवन बनाने के लिए बिल्डर्स को बिना किसी जांच के एनओसी दे दी. स्थानीय नगर निकाय के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, 'हाल में एक बिल्डर ने फ्लैट्स बनाए हैं, जहां पहले एक सार्वजनिक शौचालय था.'

सोलन और शिमला पर दबाव ज्यादा है क्योंकि ऊंची पहुंच वाले लोग अपने परिवार को यहां शिफ्ट करना चाहते हैं

एक कांग्रेसी नेता ने कहा, 'सभी जानते हैं कि क्या चल रहा है, बस अप्रिय निर्णय लेने की राजनीतिक इच्छा नहीं है.' सोलन और शिमला पर दबाव ज्यादा है क्योंकि ऊंची पहुंच वाले लोग अपने परिवार को यहां शिफ्ट करना चाहते हैं ताकि वहां की शिक्षण संस्थाओं में उनके बच्चों को सही शिक्षा मिल सके.

शिमला शहरी स्लम का पक्का चित्र है. यह अपने बूते से बाहर ज्यादा भवन और जनसंख्या के बोझ तले दब रहा है. मीडिया की खबरों के अनुसार, जो गत साल के अंत में छपी थीं कि जो जगह ब्रिटिश राज के समय गर्मियों में राजधानी हुआ करती थी, आज वहां दो लाख से ज्यादा जनसंख्या है और 80,000 रजिस्टर्ड वाहन हैं, जबकि पार्किंग सुविधा केवल 1000 वाहनों की है.

सन 2000 में 414 हैक्टेयर जमीन पर 17 ग्रीन बेल्ट बनाए जाने के बावजूद खबर है कि कई हस्तियों नेे इन बेल्ट्स में होटल, व्यावसायिक अपार्टमेंट्स बनाने की स्वीकृति ले रखी है. इसके लिए गत वर्ष नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के हस्तक्षेप की जरूरत थी, ताकि वह ग्रीन बेल्ट में निर्माण प्रतिबंधित करने के लिए सरकार पर दबाव डाल सके.

कुछ समय पहले एक अधिकारी ने इस रिपोर्टर को बताया, 'आपदा प्रबंधन के लिए हम चाहे कितना ही प्रशिक्षण दें, सब व्यर्थ रहेगा, क्योंकि यदि कोई आपदा घटती है, तो पीड़ितों और उन जगहों तक पहुंचना ही मुश्किल है.' सोलन के आरटीआई कार्यकर्ता प्रेम सिंह तंजानिया, जो गैरकानूनी निर्माण करने वालों की आफत मचाने में लगे हैं, कहते हैं, 'उच्च न्यायलय के निर्देश और टिप्पणियां स्वागत योग्य हैं, उनसे राहत मिलती है.

आलोचकों का कहना है कि जब तक उच्च न्यायालय स्वतंत्र सर्वे के आदेश नहीं देता, ऐसी भयानक सच्चाई की सही स्थिति प्रकाश में नहीं आएगी. कुलू के एक वरिष्ठ मीडियाकर्मी ने कहा, 'कोर्ट सरकारी आंकड़ों पर भरोसा नहीं कर सकती, क्योंकि ये ऐसे ही अधिकारियों द्वारा दिए जाते हैं, जो इस तरह के निर्माण की स्वीकृति देते हैं. इसके लिए एक विशेश कर्मी दल नियुक्त किए जाने की आवश्यकता है, जो स्वतंत्र रूप से सर्वे करे.'

उम्मीद की जाती है कि राजनीतिक वर्ग समय रहते इससे सबक लेगा.

First published: 2 September 2016, 8:32 IST
 
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