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शोरगुलः आहत भावनाओं के कारोबारियों का मुकाबला कौन करेगा?

रंगनाथ सिंह | Updated on: 25 June 2016, 10:07 IST
(पोस्टर)

भारत में फिल्मों की राह में कोई एक रोड़ा नहीं होता. किसी फिल्म को प्रोड्यूसर और डिस्ट्रिब्यूटर मिल जाएं तो भी रिलीज होने के लिए उसे सेंसर बोर्ड रूपी आग के दरिया डूब कर पार करना होता है.

पिछले एक हफ्ते से भारतीय सेंसर बोर्ड हिंदी की उड़ता पंजाब और हरामखोर के पर कतरने की कोशिश को लेकर खबरों में है. वहीं उसकी क्षेत्रीय इकाइयां मलयाली फिल्म कथकली और गुजराती फिल्म 'सलागतो सवाम अमानत' को सेंसर करके 'नाम' कमा रही हैं.

लेकिन फिल्म बनाना कोई 'इश्क-मोहब्बत' नहीं जिसमें बस 'आग का दरिया' पार करने से काम बन जाए. आधिकारिक तौर पर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड कहे जाने वाले सेंसर बोर्ड से पार होने के बाद भारत में रिलीज होने वाली फिल्मों को विभिन्न धार्मिक, जातीय या राजनीतिक या किसी अन्य तरह के संगठनों की भावनाओं के अघोषित 'सेंसर' को पार करना होता है.

हॉलीवुड फिल्म 'इंडिपेंडेंस डेः रिसर्जेंस' के शुक्रवार को रिलीज होने से पहले मीडिया में खबर आ गई कि फिल्म के निर्माताओं ने 'भारतीयों की अति संवदेनशील प्रकृति' को ध्यान में रखते हुए फिल्म में भारत से जुड़े दृश्य न रखने का फैसला किया था.

अंग्रेजी अखबार मुंबई मिरर फिल्म ने निर्माता 20 सेंचुरी फ़ॉक्स के सूत्र के हवाले से खबर चलाई कि इस साइंस फिक्शन में जिन जगहों को बर्बाद होते दिखाया जाना था उनमें भारत के गेटवे ऑफ इंडिया या ताजमहल भी शामिल थे. बाद में स्टूडियो ने 'भारतीयों की अति संवदेनशील प्रकृति' को ध्यान में रखते हुए ये विचार त्याग दिया.

जाहिर है, भारतीयों की छुईमुई तबीयत के बारे में पूरी दुनिया को खबर है. सभी जानते हैं कि भारत में किसी भी फिल्म से कोई भी धार्मिक, जातीय या राजनीतिक समूह किसी भी वक्त आहत हो सकता है. 

खास बात ये है कि भारतीय संगठन अक्सर फिल्म की रिलीज से पहले ही उसके ट्रेलर या उससे जुड़ी खबर देखकर आहत हो जाते हैं. उन्हें इसके लिए पूरी फिल्म देखनी की जरूरत ही नहीं पड़ती.

ताजा मामला हिंदी फिल्म 'शोरगुल' का है. कहा जा रहा है कि ये फिल्म साल 2013 के यूपी के मुजफ्फरनगर दंगों पर आधारित है. फिल्म को सेंसर बोर्ड से हरी झंडी मिल चुकी थी. उसके बाद भी इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. 

अदालत ने भी इसे रिलीज करने की इजाजत दे दी फिर भी लेकिन फिल्म 24 जून की निर्धारित तारीख को रिलीज नहीं हो सकी. क्योंकि अब इससे बीजेपी विधायक संगीत सोम आहत हो गए. साथ ही, फिल्म के हीरो जिमी शेरगिल के खिलाफ एक मुस्लिम संगठन ने 'धार्मिक भावनाएं भड़काने' के लिए फतवा जारी किया है.

खबरों के अनुसार फिल्म का एक किरदार सोम पर आधारित है. सोम ने गुरुवार को मीडिया से कहा कि उनके किरदार को फिल्म में गलत तरीके से दिखाया गया है. सोम ने फिल्म के निर्माताओं को चेतावनी दी थी कि अगर शुक्रवार को फिल्म रिलीज हुई तो उनके समर्थक मेरठ और मुजफ्फरनगर में सिनेमाघरों के बाहर विरोध प्रदर्शन करेंगे.

राज्य सरकार द्वारा फिल्म पर बैन न लगाए जाने के बावजूद शायद ये सोम की धमकी का ही असर था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सिनेमाघर मालिकों ने फिल्म न दिखाने की घोषणा की है. जिसके बाद फिल्म के निर्माताओं ने इसकी रिलीज एक हफ्ते आगे (1 जुलाई) के लिए बढ़ा दी है.

करीब एक दशक पहले 2006 में डैन ब्राउन के काल्पनिक नॉवेल द विंची कोड पर इसी नाम से फिल्म जिन देशों में सबसे पहले बैन हुई उनमें भारत भी था. इस फिल्म से आहत होने वालों में भारतीय ईसाई अगली कतार में थे.

एक आहत ईसाई समूह ने भारतीय सुप्रीम कोर्ट से इस फिल्म पर बैन लगाने की अपील की. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी मांग पर इस आधार पर खारिज की दी कि दुनिया के प्रमुख ईसाई देशों ने फिल्म पर बैन नहीं लगाया था.

इसके बावजूद भारत के नागालैंड, आंध्र प्रदेश, गोवा, तमिलनाडु और पंजाब जैसे राज्यों ने आहत भावनाओं का संज्ञान लेते हुए द विंची कोड पर प्रतिबंध लगा दिया. 

उड़ता पंजाब से पंजाब का कम, हिंदी सिनेमा का सच ज्यादा उजागर होता है

2007 में माधुरी दीक्षित की कम-बैक फिल्म 'आजा नच ले' के एक गाने की पंक्ति 'मोची भी खुद को सुनार बोले...' से बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती समेत कई जातीय समूह आहत हो गए. 2009 में नंदिता दास की फिल्म फिराक़ को रिलीज से पहले 'आहत' गुजरात सरकार ने बैन कर दिया.

साल 2010 में अनुषा रिजवी की फिल्म 'पीपली लाइव' एक गाने 'महंगाई डायन खाए जात है...' से कांग्रेस पार्टी आहत हो गई थी. साल 2011 में प्रकाश झा की फिल्म आरक्षण से रामदास अठावले और छगन भुजबल जैसे नेताओं समेत कई जातीय समूह आहत हो गए थे. झा को रिलीज से पहले फिल्म से कई दृश्य और संवाद हटाने पड़े थे.

भावनाओं के आहत होने के कारोबार में केवल राजनीतिक दल, जातीय, धार्मिक या अन्य संगठन ही नहीं, बड़े कार्पोरेट घराने भी शामिल हैं. साल 2012 में ही प्रकाश झा की फिल्म 'चक्रव्यूह' के एक गाने से बाटा और बिड़ला समूह आहत हो गया था. 

बाटा समूह ने फिल्म के एक गाने से टाटा, बिरला और बाटा जैसे शब्दों को हटवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी थी. ठीक ऐसी ही अर्जी बिड़ला समूह ने कोलकाता हाईकोर्ट में दायर की थी. 

सुप्रीम कोर्ट ने 'स्पष्टीकरण' और भविष्य में ऐसे प्रयोग न करने के साथ ही फिल्म के निर्माताओं को रिलीज की अनुमति दे दी थी. कोलकाता हाईकोर्ट ने भी ऐसा ही फैसला दिया था.

'उड़ता पंजाब' की गाली से नहीं 'राजनीतिक संदेश' से डर है

साल 2014 में विशाल भारद्वाज की फिल्म 'हैदर' से सेंसर और विभिन्न संगठनों की भावनाओं से बचते-बचाते रिलीज भी हुई तो इससे बहुत से ट्विटरबाज आहत हो गए. फिल्म रिलीज के बाद ट्विटर पर BoycottHaider (हैदर का बहिष्कार करो) ट्रेंड करने लगा. 

2014 में ही पंजाबी फिल्म 'कौम द हीरे' पर केंद्र सरकार ने बैन लगा दिया. बीजेपी और कांग्रेस की पंजाब इकाई ने फिल्म को बैन लगाने की मांग की थी. फिल्म निर्माता पर घूस देकर सेंसर बोर्ड से प्रमाणपत्र पाने का आरोप भी लगा था.

2015 में ब्रितानी डाक्यूमेंट्री इंडियाज डॉटर से भारत सरकार ही 'आहत' हो गई और इसपर बैन लगा दिया. तो 2016 में विवेक अग्नहोत्री की 'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम' से कुछ वामपंथी छात्र संगठन आहत हो गए. उन्होंने इसके खिलाफ धरना प्रदर्शन किया.

अब तक आप समझ चुके होंगे कि भारत में सेंसर बोर्ड से अपनी जान बचा लेने के बावजूद हर साल कोई न कोई चर्चित फिल्म 'आहत भावनाओं का शिकार हो जाती है. लेकिन ये 'भावनाएं' अक्सर किसी बोर्ड, किसी पार्टी, किसी संगठन की होती हैं. जिसका कोई न कोई एजेंडा होता है. 

'आहत भावनाओं का कारोबार' केवल फिल्मों तक सीमित नहीं है. बुद्धिजीवी, लेखक, पेंटर या संगीतकार अलग-अलग मय पर इसके शिकार होते रहे हैं.

आपने शायद ही सुना हो कि किसी फिल्म को देखने के बाद बाद आम दर्शकों ने सिनेमाघर से निकलकर कोई विरोध प्रदर्शन किया हो या किसी फिल्म को बैन करने की मांग की हो. (किसी पेंटिंग या किताब के खिलाफ भी शायद ही कभी ऐसा जनाक्रोश देखा गया होगा)

सेंसर ने बिना कट के पास की 'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम'

भारतीय लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता में निहित है. वही जनता प्रत्यक्ष तौर पर विधायक और सांसद चुनती है, परोक्ष रूप से सीएम और पीएम चुनती है लेकिन वो कौन सी फिल्म देखेगी ये 'आहत' होने वाले  संगठन चुनते हैं, जनता नहीं.

'आहत भावनाओं का कारोबारियों' के सामने ज्यादातर फिल्मकार, लेखक, कलाकार या पत्रकार बेबस हैं. वो उनके हुड़दंग या तोड़फोड़ करने की ताकत का मुकाबला नहीं कर सकते.

ऐसे में जनता को ही फैसला करना होगा कि क्या भारत के वयस्क दर्शकों के विवेक पर भरोसा नहीं किया जा सकता? क्या भारत के बालिग नागरिकों को भी ऐसे हेडमास्टरों की जरूरत है जो उसे ये बताते रहें कि वो क्या देखे, क्या पढ़े या क्या न देखे, क्या न पढ़े?

First published: 25 June 2016, 10:07 IST
 
रंगनाथ सिंह @singhrangnath

पेशा लिखना, शौक़ पढ़ना, ख़्वाब सिनेमा, सुख-संपत्ति यार-दोस्त.

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