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मीडिया रिव्यूः नरेंद्र मोदी की लाहौर यात्रा ही रहा मास्टरस्ट्रोक

जीतेन्द्र कुमार | Updated on: 28 December 2015, 20:06 IST
QUICK PILL
  • बीते सप्ताह के दरम्यान प्रमुख हिंदी अखबारों में छाई रही खबरों और गतिविधियों की साप्ताहिक समीक्षा का कॉलम.
  • इस हफ़्ते नरेंद्र मोदी औचक लाहौर यात्रा, सोनिया गांधी और राहुल गांधी को नेशनल हेरल्ड मामले में मिली जमानत, अरुण जेटली पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप इत्यादि प्रमुख रहे.

पिछला हफ्ता हिन्दी प्रिंट मीडिया खबरों की दृष्टिकोण से बहुत हलचल भरा बिल्कुल नहीं था लेकिन जुम्मे के दिन प्रधानमंत्री मोदी का एकाएक काबुल से बिना किसी पूर्व सूचना के लाहौर पहुंच जाने मीडिया में हलचल मच गया. लगभग सभी अखबारों ने इसे प्राथमिकता दिया है. नवभारत टाइम्स और दैनिक जागरण दोनों अखबारों ने शब्दशः एक ही हेडिंग लगाई है, “काबुल में नाश्ता, लाहौर में लंच”. कई अखबारों ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा मियां नवाज शरीफ को उनके जन्मदिन पर दी गई बधाई और बाद में उनके लाहौर पंहुचने पर विभिन्न अखबारों ने संपादकीय टिप्पणी की है.

लेकिन सबसे पहले चर्चा हफ्ता के शुरूआती दिनों के.

20 दिसबंर के दैनिक जागरण ने सोनिया राहुल को मिली जमानत को प्राथमिकता देकर छापा है. लेकिन उसी खबर के बीच प्रशांत मिश्र ने त्वरित टिप्पणी भी कर दी है. अपनी टिप्पणी ‘…तो क्या अब धन्यवाद कहेंगी सोनिया’ शीर्षक से लिखे लेख में मिश्र कहते हैं -समन हो या जमानत, सरकार पर ही ठीकरा फोड़ना न्यायोचित नहीं है और जनहित को नजरअंदाज कर राजनीति राष्ट्रहित में नहीं है.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाहौर यात्रा और नवाज शरीफ़ से मुलाकात हफ्ते की सबसे बड़ी खबर रही

मिश्र का कहना है कि जिस तरह संसद को बाधित किया जा रहा है वह उचित नहीं है. मिश्र जी तो अरूण जेटली पर डीडीसीए मामले को लेकर केजरीवाल और आप के लगाए गए आरोप को खारिज कर जेटली को ‘कैरेक्टर सर्टिफिकेट’ देते हुए लिखते हैं- जिस तरह के आरोप आप के नेताओं ने जेटली पर लगाए हैं, उसमें कोई तथ्य नहीं है. उसी दिन ‘जमानत पर जश्न’ शीर्षक से दैनिक जागरण ने संपादकीय लिखकर राहुल-सोनिया के अलावा कांग्रेस पार्टी को खूब खरी-खोटी सुनाई है और सुझाव दिया है कि उसे परिपक्व और जिम्मेदार राजनीतिक दल की तरह व्यवहार करना चाहिए.


21 दिसबंर को प्रभात खबर ने एमजे अकबर ने ‘निराधार आरोपों से विषाक्त माहौल’ नाम से एक लेख लिखा है जिसमें अकबर ने अरविंद केजरीवाल के आरोपों को तीन श्रेणी में बांटा है- कुंठित, कौतूहलभरी और कुछ खुलासा. भाजपा के राज्यसभा सदस्य एम जे अकबर अरुण जेटली का बचाव करते हुए उन सारे तर्कों और कुतर्कों की सहायता लेते हैं जिसका इस्तेमाल कोई भी व्यक्ति अपने विरोधियों के खिलाफ करता रहा है. लेकिन उसी दिन रविभूषण ने जनकवि विद्रोही पर कबीर-नागार्जुन के बाद ‘विद्रोही ’जनकवि के नाम से भावुक और मार्मिक लेख लिखा है.

अगले दिन जेटली द्वारा केजरीवाल के उपर किए गए मानहानि के मुकदमे को सभी अखबारों ने प्रमुखता से छापा है. ‘तीन साल बाद’ शीर्षक से हिन्दुस्तान ने एक संतुलित संपादकीय लिखा है जिसमें कहा गया है कि पिछले तीन वर्षों में जितना भी शोरगुल मचा हो- महिलाएं अब भी उतनी ही असुरक्षित हैं, सरकारी संस्थाएं उतना ही अकर्मण्य और लापरवाह हैं, समाज उतना ही अनुदार, हिंसक और पुरूषवादी है. अखबार ने सुझाया है कि अपवयस्क कानूनों में ऐसे फेरबदल किए जाएं जिनसे न्याय की संभावना और मजबूत हो, साथ ही अपवयस्कों के अधिकारों की रक्षा भी हो. हिन्दुस्तान के अनुसार सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, समाज के तमाम क्षेत्रों के नेतृत्व को अपने गिरेबान में झांकना होगा, तभी बेटियों को ज्यादा सुरक्षा और आत्मविश्वास मिल सकेगा.

हिन्दुस्तान में रंजना कुमार ने “जहां हम सब असहाय हैं” शीर्षक से लेख लिखा है, वह चौंकानेवाला है. वह सारी जुवेनाइल कानून को खारिज करते हुए अपवयस्क को पुनर्परिभाषित करने पर तर्क दे रही हैं. कुल मिलाकर ऐसा लगा कि अगर बाल अपराधियों की उम्र घटाकर 16 साल कर दिए जाएं तो समस्या खत्म हो जाएगी. बहरहाल, हफ्ता बीतते बीतते राज्य सभा ने भी इस कानून को अपनी मंजूरी दे दी. लोक सभा तो इसे पहले ही पारित कर चुका है.

गंभीर अपराधों के मामले में बालिग माने जाने की उम्र 18 से घटाकर 16 किए जाने पर मीडिया में तीखी बहस चली

मंगलवार को दैनिक जागरण ने तीन साल पहले हुए बलात्कार और हत्या के मामले में नाबालिग को सुप्रीम कोर्ट से मिली रिहाई की घटना को पहले पेज पर छापा है जिसका शीर्षक है- ‘अब आजाद घूमेगा नाबालिग दुष्कर्मी’. अगर इस हेडिंग पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि किसी ने आपके चेहरे पर जोर से तमांचा जड़ दिया हो जबकि हकीकत यह है कि उस नाबालिग को अपने किए कुकर्म और अपराध की सजा मिली है और उसे भारतीय कानून के तहत ही रिहा किया गया है.

बुधवार को लगभग सभी अखबारों ने 16 साल की उम्र का बालिग मानने के बिल को प्रमुखता से छापा है. उसी दिन हिन्दुस्तान अखबार ने अर्थशास्त्री सुदीप्तो मंडल का एक लेख छापा है. इस लेख में मंडल ने ‘बिहार और गुजरात के विकास मॉडलों’ की चर्चा की है. मंडल अपने लेख में बताते हैं कि जिस तरह का मॉडल नीतीश कुमार ने विकसित किया है वह पिछड़े राज्यों के लिए मुफीद है लेकिन अगर सुदीप्तो बिहार के शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की भी पड़ताल करते तो पता चल जाता कि सामाजिक न्याय के दोनों पुरोद्धाओं (लालू-नीतीश) ने अपने कार्यकाल में इन दोनों मूलभूत जरूरतों को नेस्तनाबूद कर दिया.

प्रभात खबर ने 23 दिसबंर को पवन के वर्मा का लेख ‘मौलिक अधिकार से वंचना क्यों’ छापा है जिसमें  वर्मा ने सवाल उठाया है कि जब लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए किसी शैक्षणिक योग्यता की जरूरत नहीं है तो फिर पंचायत चुनाव में इसकी क्योंकर जरूरत पड़ गई. वर्मा पूछते हैं कि कानून में ये बदलाव चुनाव के ठीक पहले किए गए हैं अगर इसे धीरे-धीरे लागू करके लोगों को प्रोत्साहित किया जा सकता था.

भाजपा सांसद कीर्ति आजाद का निलंबन भी मीडिया में चर्चा का विषय रहा. आजाद ने डीडीसीए में घोटाले का मुद्दा उठाया था

गुरुवार को लगभग सभी अखबारों ने कीर्ति आजाद को भाजपा से निलंबित किए जाने को पहले पेज पर जगह दी है जबकि अखबार ने ‘वही पुरानी कहानी’ शीर्षक से संपादकीय लिखकर कहा है कि इस बार संसद के शीतकालीन सत्र में कुछ कामकाज होने की उम्मीद थी लेकिन यह भी पिछले कई सत्रों की तरह बेनतीजा रहा. उसी दिन बद्री नारायण ने हिन्दुस्तान अखबार में एक लेख लिखकर उत्तर प्रदेश में हुए पंचायत चुनाव के परिणाम का विश्लेषण किया है. अपने लेख में बद्री लिखते हैं कि इस चुनाव में बड़ी संख्या में रसूखदार लोगों के रिश्तेदार जीतकर आए हैं.  उनका कहना है कि स्थानीय चुनाव में दो प्रवृतियां उभर रही हैं- गांव कस्बों के चुनाव में भी विधानसभा चुनावों की तरह पैसे का खेल के अलावा हिंसा बढ़ी है. और दूसरा, महिलाओं की भागेदारी बढ़ी है. लेकिन वह मानते हैं कि चुनी हुई महिलाओं की सबसे बड़ी चुनौती अपने पतियों को प्रधानपति बनने से रोकने की है. बद्री नारायण कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र मं एक तरफ उच्च लोकतांत्रिक नैतिकता का दवाब है तो दूसरी तरफ व्यवहारिक राजनीतिक का दबाव, फिर भी इन्हीं अंतर्विरोधों के बीच भारतीय लोकतंत्र को आगे बढ़ना है.

अगले दिन शुक्रवार को दैनिक जागरण ने पहले पेज पर ‘बुजुर्गों ने चढ़ाया सियारी पारा’ शीर्षक से पहले पेज पर खबर लगाई है. लेकिन एडिट पेज पर भाजपा के विधानपरिषद् के सदस्य हृदयनारायण दीक्षित का लेख ‘अयोध्या पर बेजा उबाल’ छापा है. जबकि शुक्रवार को हिन्दुस्तान ने पहले पेज पर ‘सांसदों का वेतन दोगुना करने पर हो रहा विचार’ शीर्षक से खबर छापी है. खबर के मुताबिक अगर वित्त आयोग इसे मंजूरी दे देता है तो सांसदों को 2.80 लाख रुपए महीने मिल सकेंगे.  इसी दिन हिन्दुस्तान ने भारतीय राजनीति पर एक विशेष पेज छापा है जिसमें रामनारायण श्रीवास्तव और पंकज कुमार पांडे ने वर्ष 2015 का लेखा-जोखा पेश किया है. अपने लेखा-जोखा में लेखक बताते हैं कि कैसे विश्व राजनीति में मोदी का कद बढ़ा है. शायद लेखकद्वय मोदी के विदेश यात्रा से ही विश्व राजनीति में मोदी की दखलअंदाजी मानते हैं. 

हिन्दुस्तान ने ‘मोदी अचानक पाकिस्तान पहुंचे’ शीर्षक से पहले पेज की खबर छापी है. ‘लाहौर का पड़ाव’ नाम से लिखे संपादकीय में अखबार ने प्रधानमंत्री के औचक पाकिस्तान के दौरे का स्वागत किया है और कहा है कि मोदी के इस यात्रा से दोनों देश के बीच गर्मजोशी बढ़ जाएगी लेकिन तुरंत कोई नतीजा आने की संभावना नहीं है.

बिहार के अखबारों में जातीय सम्मेलनों से जुड़ी खबरें प्रमुखता से छपती हैं लेकिन उनमें कार्यक्रम का ब्योरा नहीं होता

‘पुराने रिश्तों में नई गरमी’ शीर्षक से पूर्व विदेश सचिव शशांक ने एक लेख उसी अखबार में लिखा है. अपने लेख में पूर्व विदेश सचिव रूस के साथ भारत की पुरानी दोस्ती को याद करते हुए बताते हैं कि नवें के दशक में इसमें थोड़ी कमी आई थी लेकिन फिर से इसमें गरमाहट लाकर दोनों देशों ने सकारात्मक कदम उठाए हैं.

लेकिन सबसे मजेदार शीर्षक प्रभात खबर ने ‘बड़े दिलवाला’ शीर्षक लगाया है जबकि इसका उपशीर्षक है- ‘काबुल को संसद दी, शरीफ को घर जाकर खुशी से नवाजा’. अमर उजाला ने ‘मोदी का कूटनीतिक मास्टर स्ट्रोक’ हेडिंग से पहले पेज पर लीड लगाया है जबकि ‘लाहौर वाया काबुल’ शीर्षक से लिखे संपादकीय में अखबार का कहना है कि पाकिस्तान के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने की प्रधानमंत्री मोदी की नीयत पर सवाल नहीं किए जा सकते पर राजनीति को नई दिशा देने की उनकी उन पहल में जोखिम भी कम नहीं है. 

दैनिक जागरण ने पिछले सात दिनों में चार अग्र लेख- सुभाष कश्यप का ‘समस्या बनी संसद’,  विजय अग्रवाल का ‘संसद में सुधार का वक्त’ और राजीव चंद्रशेखर का लेख ‘संसद में जनता से अन्याय’ छापा है जिसमें घुमा-फिराकर कहा गया है कि संसद अपनी भूमिका निभाने में असफल रहा है. कुल मिलाकर इन लेखों का मतलब यह है कि संसद का जो भी करना हो, करिए लेकिन मोदीजी के उपर संसद चलाने का ठीकरा मत फोड़िए क्योंकि अरुण जेटली तो कह ही चुके हैं कि राज्य सभा की जरूरत नहीं रह गया है. हालांकि जेटली खुद लोक सभा चुनाव हारने के बाद राज्य सभा सदस्य बनकर ही मंत्री बने हैं.

चूंकि मैं इस बार ज्यादातर वही अखबार देख पाया जिसकी पहुंच बिहार के गांव-गांव और संभवतः घर-घर तक है. राष्ट्रीय स्तर पर हमें जो खबरें नहीं दिखाई पड़ती हैं वे विभिन्न जाति समूहों के सम्मेलन से जुड़ी होती हैं. धानुक सम्मेलन, केवट सम्मेलन, ब्राह्मण महासभा, कोइरी प्रांतीय तैयारी समिति जैसी खबरें सभी अखबारों में होती है. मजेदार बात यह है कि ये वो खबरें हैं जिसमें संगठन को मजबूत बनाने की बात होती है लेकिन उनके लिए कोई कार्यक्रम नहीं होता है. कुल मिलाकर इन जातीय संगठन या महासभा में एकजुटता की बात तो हो रही है लेकिन उस समाज के लिए कोई भावी योजना नहीं है. इसी तरह सभी अखबारों में शिक्षकों की कमी या स्कूल में पढ़ाई न होने की बात किसी न किसी रूप में सभी अखबारों में जगह पाती है लेकिन उसके निदान की दिशा में कोई कदम उठाया जा रहा है या नहीं, इसके बारे में जानकारी नहीं होती है.

First published: 28 December 2015, 20:06 IST
 
जीतेन्द्र कुमार

Senior journalist and social activist

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