Home » इंडिया » Catch Hindi: Hindi News Papers Review 3 January 2016
 

...और लालू-नीतीश के बीच दरार खोज निकाली गई

जितेंद्र कुमार | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • बीते सप्ताह के दरम्यान प्रमुख हिंदी अखबारों में छाई रही खबरों और गतिविधियों की साप्ताहिक समीक्षा का कॉलम
  • इस हफ्ते बिहार में \'जंगलराज\' की वापसी, अरुण जेटली और कीर्ति आजाद विवाद, अरविंद केजरीवाल का जेटली विरोधी अभियान सुर्खियों में रहे.
बिहार के दरभंगा जिले में सड़क निर्माण से जुड़ी निजी कंपनी के दो इंजीनियरों की हत्या को बिहार से निकलने वाले सभी अखबारों ने 27 दिसंबर को पहले पेज पर लीड स्टोरी बनाकर छापा. अखबारों की भाषा ऐसी रही मानो बिहार में जंगलराज की वापसी हो गई है. लेकिन जैसे-जैसे इस खबर की परतें खुलीं अखबारों का सुर भी बदला. बाद में सारा जोर अखबारों ने लालू और नीतीश के बीच दरार दिखने की कोशिशों में लगाया.

प्रभात खबर को छोड़कर लगभग सभी अखबारों को दोनों नेताओं के बीच इतनी दरार दिखा दी कि राजनीति से कम वास्ता रखने वाला यह मान ले कि नीतीश सरकार के दिन गिने-चुने रह गए हैं. इस बीच अमर उजाला ने 29 दिसबंर को ‘सुशासन बाबू की चुनौती’ नाम से एक संतुलित संपादकीय लिखा. इसमें कहा गया है कि नीतीश सरकार की पहली प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि वह अपराधियों और रंगदारी मांगने वाले संगठित गिरोहों का खात्मा करे, क्योंकि इससे उसकी साख जुड़ी हुई है.

पढ़ेंः नरेंद्र मोदी की लाहौर यात्रा ही रहा मास्टरस्ट्रोक

यह हफ्ता कई घटनाओं के कारण चर्चा में रहा लेकिन जो घटना दिल्ली की मीडिया में सबसे प्रमुखता से छाई रही वो दिल्ली जिला क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) से जुड़ा भ्रष्टाचार का मामला था. पिछले हफ्ते डीडीसीए में हुए भ्रष्टाचार को लेकर राज्य के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मोदी सरकार के सबसे ताकतवर व प्रभावशाली मंत्री अरुण जेटली पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था. केजरीवाल का आरोप था कि उनके दफ्तर पर सीबीआई की छापेमारी उनके प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के खिलाफ जांच के लिए नहीं की गई थी बल्कि जेटली के खिलाफ डीडीसीए मामले की फाइलें जब्त करने के लिए की गई थी.

अमर उजाला के अनुसार नीतीश की पहली प्राथमिकता अपराधियों और रंगदारी मांगने वाले संगठित गिरोहों का खात्मा होनी चाहिए

‘भ्रष्टाचार’ के खिलाफ इस लड़ाई में बीजेपी सांसद कीर्ति आजाद ने भी अरुण जेटली के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. बहुत कम लोगों को पता होगा कि कीर्ति आजाद और अरुण जेटली की आपसी लड़ाई काफी पुरानी है. यह कड़वाहट 2009 से बढ़ती रही है. उस बरस अरुण जेटली ने दरभंगा से कीर्ति आजाद का टिकट काटकर बिहार विधान परिषद् के सदस्य संजय झा को दे दिया था. तब लालकृष्ण आडवाणी के पुत्र जयन्त आडवाणी ने हस्तक्षेप किया था और कीर्ति आजाद अपनी टिकट बचाने में सफल रहे थे (एलके आडवाणी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार जो थे).

28 दिसबंर, सोमवार को नवभारत टाइम्स ने खबर लगाई- जेटली को क्लीन चिट पर बीजेपी-आप भिड़े. सबसे दिलचस्प और एकतरफा शीर्षक दैनिक जागरण का रहा. अखबार ने लिखा ‘जेटली पर घिरे केजरीवाल’ उसका सब हेडिंग है ‘डीडीसीए की जांच रिपोर्ट में जेटली का नाम नहीं’. अखबार ने अपनी तरफ से जेटली को क्लीनचिट दे दी और केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के पक्ष को ठीक से जगह भी नहीं दी.

पढ़ेंः आप की गुगली, पिच पर जेटली'

दैनिक जागरण की संपादकीय की माने तो अरविंद केजरीवाल ने देश में राजनीति को निम्न स्तरीय बना दिया है. अखबार ‘राजनीति का गिरता स्तर’ नाम से गंभीर संपादकीय चिंतन में लिखता है- ‘यदि केजरीवाल के पास डीडीसीए में हुए घोटालों के पीछे अरुण जेटली का हाथ होने के प्रमाण हैं तो फिर उन्हें हंगामा मचाने के बजाय किसी अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए... यह ठीक है कि केजरीवाल राजनीतिक रूप से कम अनुभवी हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह अलग राजनीति करने के नाम पर राजनीति के स्तर को गिराने का काम करें.’

दैनिक जागरण ने संपादकीय में अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार को कठघड़े में खड़ा किया गया है

मजेदार बात है कि जागरण ने उसी दिन एक और संपादकीय ‘लगे अंकुश’ शीर्षक से भी लिखा और उसका विषय भी केजरीवाल निंदा ही है. अखबार लिखता है कि यह ठीक है कि सरकार ने तत्काल कार्रवाई करते हुए तीन अधिकारियों को निलंबित कर दिया है. लेकिन सवाल उठता है कि परिवहन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अब तक कठोर कदम क्यों नहीं उठाए गए?

अगले दिन जागरण ने ‘डीडीसीए पर जंग तेज’ शीर्षक से पहले पेज पर एक खबर छापी है. सब हेडिंग है, ‘जांच आयोग ने एनएसए से मांगे अफसर, केन्द्र ने हास्यास्पद बताया.’ जागरण ब्यूरो की खबर के मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) को लिखे पत्र को केन्द्र सरकार ने हास्यास्पद करार दिया है. अखबार के मुताबिक सरकार का कहना है कि एनएसए की किसी भी अधिकारी के कामकामज के निर्धारण में कोई भूमिका नहीं होती है. ऐसी मांग कार्मिक या गृह मंत्रालय से की जानी चाहिए थी.

सबसे हास्यास्पद बात यह रही कि जब अखबार इस पहल को हास्यास्पद बता रहा है तब वह इस बात का जिक्र तक नहीं करता कि सरकार के किस अधिकारी या विभाग ने इसे हास्यास्पद बताया है!

पढ़ेंः संसद सत्र, चेन्नई बाढ़ और जलवायु परिवर्तन की बहस में बीता सप्ताह

First published: 3 January 2016, 7:30 IST
 
जितेंद्र कुमार @catchhindi

पेशे से पत्रकार हैं लेकिन ख्वाहिश फणीश्वरनाथ रेणु वाली है- उपन्यास लिखते हुए खेतीबाड़ी करें. वैसे शौकिया खाना और बात दोनों बनाते हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी