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सुप्रीम कोर्ट के वो 5 फैसले जो साल 2019 में बदल देंगे आपकी जिंदगी, अवैध संबंध को भी दी कानूनी मान्यता

दीपक कुमार सिंह | Updated on: 1 January 2019, 8:28 IST

साल 2018 को अलविदा कहने का वक्त आ गया है. अब इस साल की ढेर सारी खट्टी-मीठी यादें सिर्फ बची रह जाएंगी. लेकिन यहां हम उन ऐतिहासिक निर्णयों पर चर्चा करेंगे जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय / सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 के दौरान लिया था, जिसने हमारे जीवन के तरीके को बदल दिया है और इसका प्रभाव आने वाले कई सालों तक रहेगा.सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में ऐसे फैसले सुनाए जिसने संविधान पर आम जनता का भरोसा बरकरार रखा है और सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी मान्यताओं को भी ख़ारिज किया है. सुप्रीम कोर्ट ने मानवता को सर्वोपरी मानते हुए कई ऐसे फैसले दिए हैं जिससे आम लोगों को बड़ी राहत मिली है.

व्यभिचार (अवैध संबंध) कोई अपराध नहीं

व्यभिचार को अब तक अपराध की श्रेणी में रखा जाता था. व्यभिचार यानि अवैध संबंध, यानि अगर आप शादी के बाद भी किसी से सेक्सुअल रिलेशन बनाते हैं और एक-दूसरे की सहमति हो तो शीर्ष अदालत ने इसे कोई अपराध नहीं माना है. सुप्रीम कोर्ट ने 150 साल पुराने कानून सर्वसम्मति से रद्द कर दिया है. अवैध संबंध आई धारा 497 के तहत इस मामले को परिभाषित किया गया है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर बड़ी रहत दी है.

आधार स्वैच्छिक और अनिवार्य नहीं

उच्चतम न्यायालय की पांच-न्यायाधीशों वाली पीठ ने 26 सितंबर, 2018 को आधार को संवैधानिक माना था लेकिन सरकार की सेवाओं का लाभ उठाने के लिए इसे अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जबकि आधार-पैन लिंकिंग अनिवार्य था लेकिन आधार के लिए पूछने वाली बैंक और टेलीकॉम कंपनियां का असंवैधानिक कार्य हैं.

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध पर छूट का

सुप्रीम कोर्ट ने एक पुराने प्रतिबंध को हटा दिया जिसमें कहा गया था कि (10-50) वर्ष की आयु की महिलाओं को मंदिर परिसर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी. अदालत ने कहा कि "भक्ति लिंग भेदभाव के अधीन नहीं हो सकती है," और सबरीमाला मेटर में कोई अपवाद नहीं है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर, जस्टिस रोहिंटन एफ नरीमन और धनंजय वाई चंद्रचूड़ ने पक्ष में मतदान किया.

धारा 377 समलैंगिक यौन संबंध

सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में धारा को आंशिक रूप से कम कर दिया था और भारत में समलैंगिक यौन संबंध को कम कर दिया था, जिसका अर्थ है कि दो सहमति वाले वयस्क चाहे वह पुरुष हो या महिला एक साथ रह सकते हैं और यौन संबंध बना सकते हैं. मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि आईपीसी की धारा 377 निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है.

सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग

सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग का आदेश देते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि "सूर्य की रोशनी सबसे अच्छा कीटाणुनाशक है।" लेकिन न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने एक अलग फैसला दिया.

First published: 31 December 2018, 21:03 IST
 
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