Home » इंडिया » History needs to do justice with socialist Jay Prakash Narayan
 

इतिहास को जेपी के साथ न्याय करना अभी बाकी है

रामबहादुर राय | Updated on: 11 October 2016, 7:40 IST
(गेटी इमेजेज़)
QUICK PILL
  • आज जेपी (जय प्रकाश नारायण) की 114वीं जयंती हैं. इस देश में गांधीजी के बाद दूसरी शख्सियत के तौर पर जेपी के आस-पास कोई नहीं ठहरता. उन्होंने देश को दूसरी आजादी दिलाई थी. इतिहास में उन्हें यह स्थान मिलना अभी बाकी है.

आजादी के बाद से अब तक के दौर में जेपी (जय प्रकाश नारायण) सबसे ज्यादा आज की तारीख में है. आज देश में अमीरी और गरीबी की खाई बहुत बढ़ गई बढ़ गई है. अगर हमें जेपी को और उनकी संपूर्ण क्रांति आंदोलन को समझे तो उसके दो प्रमुख लक्ष्य थे. पहला लक्ष्य था राज्य व्यवस्था की पुनर्रचना, और दूसरा था गरीबी को कम करना.

गरीबी अगर कम होगी, अशिक्षा कम होगी तो कई सममस्याएं खुद बखुद दूर हो जाएंगी. आज देश के एक तिहाई से ज्यादा जिले माओवाद की चपेट में है. जेपी भूदान आंदोलन शांत होने के बाद विचार मंथन के लिए पहाड़ों पर चले गए थे. वहां वे आगे की रणनीति औक राजनीति पर विचार कर रहे थे. ये सन 70 के आस पास की बात है.

उन्हीं दिनों उन्हें एक चिट्ठी मिली. जिससे सूचना मिली की बिहार के मुसहरी में सर्वोदय के कार्यकर्ताओं को नक्सलियों ने जान से मारने की धमकी दी है. उसकी तारीख भी तय कर दी है. जेपी तत्काल ही पहाड़ से वापस लौटे. वे दिल्ली-पटना होते हुए सीधे मुसहरी पहुंचे. वहां उन्होंने घोषणा कर दी कि या तो मुसहरी से नक्सलवाद खत्म होगा या फिर जेपी की हड्डिया गिरेगी. वे अगले साल डेढ़ साल तक वहीं डटे रहे, कहीं गए नहीं.

नक्सलवाद हो या माओवाद. यह गरीबी के ऊपर ही पलता है. उसका शोषण माओवादी करते हैं. लोगों को बरगलाते हैं. राज्य के खिलाफ हथियार उठाने के लिए प्रेरित करते हैं. लोगों को भी लगता है कि हथियार लगाने से मुक्ति मिल जाएगी. बाद में उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है. आज हम देखते ही कि बड़ी संख्या में लोगों का माओवाद से मोहभंग हो रहा है.

आज जेपी की प्रासंगिकता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि संपूर्ण क्रांति के दोनों ही लक्ष्य अब तक अपूर्ण हैं. संपूर्ण क्रांति की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है.

वामपंथी रुझान

कुछ लोग अक्सर ऐसा कहते रहे हैं कि जेपी के व्यक्तित्व में एक किस्म का अंतर्विरोध था. मैं उसे दूसरे तरह से देखता हूं. जेपी हाईस्कूल तक पढ़ने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चले गए थे. जहां वे पढ़ रहे थे वहां मर्क्सवाद का बोलबाला था. वे पढ़ने-लिखने में बेहद तेज थे. पढ़ाई-लिखाई के अलावा उन्होंने वहां मार्क्सवाद का भी अध्ययन किया.

इस अध्ययन के दौरान ही उनके अंदर मार्क्सवाद के प्रति रुझान पैदा हुआआ. पर वे वामपंथी नहीं थे. मार्क्सवाद को पढ़कर मार्क्सवादी होना एक बात है लेकिन वामपंथी या कम्युनिस्ट वे कभी नहीं रहे. उस समय अमेरिका या विदेश में पढ़ रहे तमाम समकालीन नेताओं को देखिए, चाहे ज्योति बसु हों, चाहे इंद्रजीत गुप्त हों या रेणु चक्रवर्ती हों ये सब लोग ऑक्सफोर्ड में पढ़े और मार्क्सवाद के प्रभाव में आकर कम्युनिस्ट हो गए. इसके ठीक विपरीत जेपी अमेरिका में पढ़े, वे मार्क्सवादी तो थे लेकिन कम्युनिस्ट नहीं थे. कभी भी वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य नहीं रहे.

उस समय तक अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट पार्टी अमेरिका में भी काफी सक्रिय थी. मैं दावे से कहता हूं कि जेपी कम्युनिस्ट नहीं थे, वे गरीबों के पक्षधर थे लिहाजा उन्होंने सैद्धांतिक रूप से इस विचार को गहराई से समझा बूझा था. जब वो भारत लौटे उसके बाद उनके व्यक्तित्व को हम अगर समझ लें तो हमें आसानी हो जाएगी. जेपी के भीतर भारतीय संस्कार थे, पारिवारिक संस्कार थे. इसलिए जब वे भारत लौटे तो उनकी पत्नी प्रभावती उनका स्वागत करने पहुंची. उन्होंने ही जेपी को साबरमती आश्रम आने का न्यौता दिया. वहीं पर वो गांधीजी से भी मिले.

उन्हीं दिनों नेहरू से जेपी की मुलाकात साबरमती आश्रम में हुई. दोनों ने गर्मजोशी से एक दूसरे से हाथ मिलाया. यहां से जेपी और नेहरू की दोस्ती शुरू हुई जो आजीवन बनी रही.

गांधीजी के प्रभाव में कम लेकिन प्रभावती के सदाचरण से जेपी में बदलाव आना शुरू हुआ था. हालाकि वे पूरी तरह गांधीमय बहुत बाद में हुए. इसमें एक लंबा अरसा लगा. वे स्वाधीनता के आंदोलन में तो कूद गए पर पूरी तरह से गांधीवादी होने में उन्होंने लंबा समय बिताया. जेपी का जो व्यक्तित्व हम देखते हैं वह एक लंबे अरसे में निर्मित हुआ था. इनका एक सतत विकास हुआ है.

निजी संबंध

प्रबावती और जेपी के संबंधों को लेकर भी काफी कुछ कहा सुना जाता है. कहा जाता है कि जेपी गांधी से खुश नहीं थे. पर मैंने ऐसा किसी विश्वसनीय स्रोत से कुछ पढ़ा नहीं है. शादी के बाद जेपी अमेरिका चले गए, प्रबावती के पिता ब्रजकिशोर बाबू आजादी के आंदोलन में कूद गए.

इस स्थिति में प्रभावती को उन्होंने साबरमती आश्रम में छोड़ दिया. आश्रम की जो दिनचर्या थी और गांधीजी जिस तरह के नियम कानून में वहां लोगों को प्रशिक्षित करते थे उसमें प्रभावती भी ढल गईं. और धीरे-धीरे उन्होंने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया. उन्होंने इसे आजीवन निभाया भी.

इतना जरूर सुनने में आया कि जब जेपी अमेरिका से लौटे और उन्हें प्रभावती के ब्रह्मचर्य की बात पता चली तो वे थोड़ा परेशान हुए थे. लेकिन इससे उनके निजी संबंधों में किसी तरह के दुराव या भटकाव की बात कभी देखने सुनने में नहीं आई. इसका एक मतलब यह हुआ कि जेपी ने इसे हकीकत मान कर स्वीकार कर लिया था.

इंदिरा जेपी संबंध

नेहरू और जेपी की दोस्ती थी गहरी थी. नेहरू हमेशा चाहते थे कि वे राजनीति में आएं. लेकिन जेपी ने उसे अस्वीकार कर दिया था. नेहरू में एक आत्मविश्वास था अपने नेतृत्व के प्रति. ये आत्म विश्वास इंदिरा गांधी में नहीं था.

जेपी इंदिरा को इंदू कहते थे. जेपी का अगर देखेंगे तो नेहरू के साथ उनका जो संबंध है वैसा ही संबंध प्रभावती का कमला नेहरू से भी था. इसके बावजूद इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व में एक असुरक्षा बोध हमेशा से मौजूद था.

जिन परिस्थितियों में इंदिरा गांधी को सत्ता मिली थी उसने उन्हें और भी शंकालु बना दिया था. आजादी के बाद के दौर में जो लोग इंदिरा के जो आंख-कान बने थे इनमें पीएन हक्सर वगैरह शामिल थे, उन लोगों ने भी इंदिरा गांधी के अंदर असुरक्षा बोध पैदा किया. धीरे-धीरे स्वाधीनता संग्राम के मूल्य कमजोर पड़ते गए. जेपी उसी मूल्य को पकड़े हुए थे. अंतत इंदिरा के करीब ऐसे लोग बढ़ गए जो स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों से बहुत दूर थे. इसके चलते उनका जेपी से टकराव भी बढ़ा.

31 अक्टूबर 1974 को इंदिरा ने अपने दूतों को भेजकर जेपी को दिल्ली बुलाया था. यहां दिल्ली में जेपी की मुलाकात तब के कांग्रेसी नेता और बाद में देश के प्रधानमंत्री बने स्वर्गीय चंद्रशेखर से हुई. चंद्रशेखर से बातचीत में जेपी को पता चला कि उन्हें दिल्ली इंदिरा ने बुलाया तो है पर कांग्रेस के अन्य नेताओं को इसकी जानकारी नहीं है. उन्होंने चंद्रशेखर से कहा कि वे बड़ी दुविधा में हैं.

चंद्रशेखर ने जेपी से बताया कि किसी अन्य को जानकारी न देने की एक वजह यह है कि अगर इंदिरा से आपकी बातचीत टूट जाती है तो इसकी जिम्मेदारी आपके सिर डाल दी जाएगी. इसीलिए किसी और नेता को इसकी जानकारी नहीं दी गई है. संभावना के मुताबिक ही बातचीत अगले दिन टूट गई. इससे राजनीति की दिशा बदल गई. इसके बाद दोनों के बीच शक्ति परीक्षण का दौर शुरू हुआ जो अंतत: इमरजेंसी के रूप में सामने आया और जेपी को इंदिरा ने नजरबंद कर दिया.

इस देश में गांधीजी के बाद दूसरी शख्सियत के तौर पर जेपी के आस-पास कोई नहीं ठहरता. उन्होंने देश को दूसरी आजादी दिलाई थी. इतिहास में उन्हें यह स्थान मिलना अभी बाकी है.

First published: 11 October 2016, 7:40 IST
 
रामबहादुर राय @catch_hindi

वरिष्ठ पत्रकार और यथावत पत्रिका के प्रधान संपादक

पिछली कहानी
अगली कहानी