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पलट गए दत्तात्रेय होसबाले, समलैंगिकों को इलाज की जरूरत

कैच ब्यूरो | Updated on: 18 March 2016, 13:33 IST

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के संयुक्त महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने शुक्रवार को कहा है कि समलैंगिकता अपराध नहीं है पर यह हमारे समाज में अनैतिक है.

होसबाले का मानना है कि समलैंगिक लोगों को सजा देने की जरूरत नहीं है लेकिन इसे मनोवैज्ञानिक बीमारी मानते हुए उनका इलाज किया जाना चाहिए.

आईपीसी की धारा-377 में समलैंगिकता को अपराध माना गया है और इसके लिए अधिकतम 10 साल की सजा हो सकती है.

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गुरुवार को दत्तात्रेय होसबाले ने इंडिया टुडे कॉनक्लेव में एक प्रश्न के जवाब में कहा, 'किसी का भी सेक्स चुनाव अपराध नहीं है जब तक कि वह दूसरों के जीवन पर असर नहीं डालता. मैं नहीं समझता कि समलैंगिकता को अपराध माना जाना चाहिए.'

उन्होंने आगे कहा कि यौन पसंद निजी और व्यक्तिगत मसला है. इस पर आरएसएस को सार्वजनिक रूप से अपनी बात क्यों कहनी चाहिए? आरएसएस की इस पर कोई राय नहीं है. लोग इस पर खुद फैसला करें. आरएसएस में सेक्स पर कोई बात नहीं होती है और हम इस पर कोई बात करना भी नहीं चाहते.'

दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध मानने से इंकार किया

2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाने का फैसला दिया था. लेकिन कोर्ट के फैसले को केंद्र सरकार ने चुनौती दी.

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सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर, 2013 में हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए समलैंगिकता को आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध बरकरार रखा. दो जजों की बेंच ने इस फैसले पर दाखिल पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी थी. दोनों जज अब रिटायर हो चुके हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध माना

11 दिसंबर,  2013 सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की पीठ ने अपने फैसले में अप्राकृतिक यौन अपराधों से संबंधित भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 की वैधता बरकरार रखी थी.

LGBT community/Live/Patrika

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय की पीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 को बदलने के लिए कोई संवैधानिक गुंजाइश नहीं है.

धारा 377 के तहत दो व्यस्कों के बीच समलैंगिक रिश्ते को अपराध माना गया है. उस समय तत्कालीन यूपीए सरकार के कई मंत्रियों ने कोर्ट से फैसले से निराशा जताई थी.

ट्रांसजेंडरों को मिली तीसरे लिंग के तौर पर मान्यता

15 अप्रैल 2014 को भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में ट्रांसजेंडरों को तीसरे लिंग के तौर पर मान्यता दी है. ट्रांसजेंडरों को ओबीसी केटेगरी में आरक्षण और दूसरी सुविधाएं देने के आदेश दिए थे.

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हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता के आदेश पर कोई टिप्पणी नहीं की थी. कोर्ट के फैसले के बाद कई राज्य सरकारों ने भी अपनी ट्रांसजेंडर नीति जारी की है.

First published: 18 March 2016, 13:33 IST
 
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