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माननीय सुप्रीम कोर्ट: क्या वायु प्रदूषण की सारी लड़ाई दिल्ली तक ही सीमित है?

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

वायु की गुणवत्ता पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ताजा रिपोर्ट न केवल हमारे शहरों की हवा की स्थिति का खुलासा करती है, बल्कि इस कड़वे सच से भी पर्दा उठाती है कि हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं.

दिल्ली के साथ ग्वालियर, इलाहाबाद, पटना और रायपुर दुनिया के उन 10 शहरों की सूची में शामिल हैं जहां की आबोहवा सबसे अधिक प्रदूषित है. इन शहरों का स्थान दिल्ली से ऊपर है. और इलाहाबाद को छोड़कर इनमें से बाकी शहर पिछले साल भी दस सर्वाधिक वायु प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल थे.

इनके साथ थे अहमदाबाद, लखनऊ और फिरोजाबाद. फिर भी हमारा ध्यान ऐसे शहरों पर नहीं गया, न ही यहां वायु प्रदूषण से संबंधित याचिकाओं, आकलन और नियंत्रण का कोई प्रभावी तरीका उपलब्ध है.

ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और उच्चतम न्यायालय जैसी राष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं ने केवल दिल्ली के वायु प्रदूषण पर ही सारा अधिक ध्यान केंद्रित कर रखा है.

केंद्र सरकार में पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु की गुणवत्ता को सुधारने के लिए उनकी सरकार की ओर से उठाये गये कदमों के बारे में ट्वीट करते रहते हैं, लेकिन शायद ही उन्होंने बाकी शहरों के बारे में कभी एक शब्द भी कहा हो.  

एनजीटी का इकलौता बड़ा दखल

राष्ट्रीय मीडिया में भी बहसें और अभियान केवल दिल्ली की हवा की गुणवत्ता के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है. इस मामले में न्यायपालिका की ओर से एकमात्र बड़ा हस्तक्षेप एनजीटी ने किया है.

छह जनवरी 2016 के एक आदेश में ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली मुख्य पीठ ने कई राज्यों से कहा था कि वे अपने शहरों में वायु प्रदूषण पर एक विस्तृत शपथपत्र दाखिल करें, जिसमें इन शहरों की वायु की गुणवत्ता का उल्लेख हो और उन उपायों का भी, जो प्रदूषण को रोकने के लिए ये शहर कर रहे हैं.

लेकिन यह आदेश भी महज 15 शहरों तक सीमित है.इन शहरों का नाम याचिका दाखिल करने वालों और मामले में पेश सरकारी वकीलों ने सुझाया था. और 15 शहरों की इस सूची में पिछले साल की विश्व स्वास्थ्य संगठन की सूची में सामिल रहे शहरों में से केवल पटना और लखनऊ का नाम ही शामिल किया गया.

कहां एक ओर महज एक शपथपत्र और दूसरी ओर दिल्ली में प्रदूषण को लेकर न्यायालयों की ओर से दिये गये कठोर आदेशों की एक लंबी फेहरिस्त, मसलन कचरा जलाने पर भारी जुर्माना, पुराने वाहनों पर प्रतिबंध, ट्रकों के प्रवेश पर रोक (एनजीटी के अध्यक्ष खुद ही आदेश के अनुपालन की निगरानी करने के लिए पहले दिन दिल्ली की सीमा पर खड़े थे) और डीजल से चलने वाली टैक्सियों से जुड़ी अभी हाल की रस्साकशी. 

दूसरे शहरों पर दरियादिली नहीं

दरअसल जब पिछले साल सर्दियों में दिल्ली की हवा की गुणवत्ता के बारे में चिंताएं तेजी बढ़ती दिखीं, तो उच्चतम न्यायालय ने तय किया कि वह यहां की हवा से जुड़े सारे मामले तय करेगा. लेकिन अन्य शहरों के बारे में उसने यह दरियादिली नहीं दिखाई है.

छोटे शहरों के वायु प्रदूषण के बारे में हमारी सामूहिक उपेक्षा की वजह क्या है? सबसे पहली बात तो यह है कि हम इस प्रदूषण को उचित तरीके से माप भी नहीं रहे हैं. डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक देश में सबसे अधिक निगरानी केंद्र दिल्ली में हैं.

केंद्र सरकार के पास केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधीन दिल्ली में छह निगरानी केंद्र हैं. इसके अलावा दिल्ली सरकार की दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति के पास छह और ऐसे केंद्र हैं. हालांकि, ध्यान देने वाली बात यह भी है कि केंद्र सरकार के पास ग्वालियर, इलाहाबाद और रायपुर में एक भी वायु प्रदूषण निगरानी केंद्र नहीं है. 

प्रदूषण निगरानी का नाकाम तंत्र

इसके पास केवल एक ऐसा केंद्र पटना में है. इलाहाबाद की बात करें तो हवा की गुणवत्ता का आंकड़ा उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के महज पांच निगरानी केंद्रों से आता है. ग्वालियर के मामले में, मध्य प्रदेश पीसीबी के दो केंद्रों से.बिहार पीसीबी और छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण बोर्ड की वेबसाइट पर वायु प्रदूषण निगरानी केंद्रों के बारे में कोई सूचना नहीं है.

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, पटना में दो निगरानी केंद्र हैं, जबकि रायपुर में तीन. दरअसल पटना और दिल्ली को छोड़ दिया जाये, तो इन सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से कोई भी शहर मुख्य प्रदूषक पीएम2.5 (पार्टिकुलेट मैटर या स्वास्थ्य के लिए घातक धूल के कण, जिनका व्यास 2.5 माइक्रोन होता है) के स्तरों को माप तक नहीं सकता.

इन शहरों के प्रदूषण का विश्लेषण पीएम10 के आंकड़ों से किया गया है.हालांकि, पर्यावरण मंत्रालय इस बारे में अनभिज्ञता भी जाहिर नहीं कर सकता. दरअसल राष्ट्रीय वायु निगरानी कार्यक्रम के तहत इसने राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ मिल कर 23 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशो में कुल 95 प्रदूषित शहरों की पहचान की थी.

इस बारे में आगे क्या हुआ, किसी को नहीं पता.जनगणना 2011 के आंकड़ों के मुताबिक, डब्ल्यूएचओ की ताजा सूची में दिल्ली के साथ शामिल चार शहरों में दिल्ली की जनसंख्या के आधे लोग रहते हैं.

यह जनसंख्या और अधिक है अगर आप नगरीय सीमाओं को छोड़ कर पूरे जिले को शामिल करें (और हमें ऐसा ही करना चाहिए क्योंकि हवा तो बहती रहती है). लेकिन दिल्ली के प्रति झुकाव को नकारना मुश्किल है. क्या डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट हमें नींद से जगा सकेगी?

First published: 17 May 2016, 8:00 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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