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मलेरकोटला: दंगा कराने की 'साजिश' कैसे हुई विफल?

आदित्य मेनन | Updated on: 30 June 2016, 16:38 IST
(कैच)

पंजाब के मालेरकोटला में 24 जनवरी की रात कुरान शरीफ की बेअदबी कर पंजाब में दंगे भड़काने की साजिश में एक स्वयंभू हिन्दू कट्टरपंथी विजय कुमार को गिरफ्तार किया गया है. 

पुलिस के अनुसार विजय की इस साजिश के पीछे पिछले साल जुलाई में गुरुदासपुर और इस साल जनवरी में हुए पठानकोट हमले का बदला लेना था. 

मूल रूप से हरियाणा के जींद का रहने वाला विजय कुमार कुछ समय के लिए कनाडा गया था. वहां से लौटकर वह दिल्ली में बायो-फर्टीलाइजर का कारोबार करता है.

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पटियाला रेंज के आईजी पीएस उमरानंगल ने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि स्वयंभू हिन्दू कट्टरपंथी विजय किसी भी हिन्दू संगठन से जुड़ा हुआ नहीं है. हालांकि कुछ सूत्रों के मुताबिक विजय विश्व हिंदू परिषद से जुड़ा हुआ है. 

पुलिस के अनुसार हिरासत में वह तमाम तरह की अनर्गल बातें कर रहा था, मसलन भारत में मुसलमानों को तरजीह दी जा रही है, उनकी आबादी विस्फोटक होती जा रही है. उसने एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया था जिसका नाम पाकिस्तान-बैशिंग है.

उसने हिंसा भड़काने के लिए उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में भी यही तरीका अपनाया था. उसके साथ पठानकोट जिले के गांव तारागढ़ निवासी नन्द किशोर गोल्डी और उसके पुत्र गौरव को भी गिरफ्तार किया गया है. ये दोनों भी पठानकोट में हुए आतंकी हमले से खफा थे और विजय के साथ साजिश में शामिल हो गए थे.

क्या विजय को कामयाबी मिली?

कुरान की बेअदबी के बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों ने दर्जनों वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया और शिरोमणि अकाली दल विधायक फरजाना नेसारा खातून के घर तोडफ़ोड़ की. 

हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि उनका निशाना हिन्दू और सिखों के दुकान या घर नहीं थे, बल्कि उनका गुस्सा जिला प्रशासन के खिलाफ था.

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यहां के एक व्यापारी गगनदीप सिंह कहते हैं कि अपना पवित्र धर्मग्रन्थ जलाए जाने से मुसलमान काफी आक्रोशित थे. पर उन्होंने किसी अन्य समुदाय को अपना निशाना नहीं बनाया. उनके निशाने पर तो पुलिस और जिला प्रशासन के लोग थे. 

गगनदीप कहते हैं कि यदि उनका उद्देश्य सिखों और हिन्दुओं पर हमला करना होता तो वे क्यों मुस्लिम नेता (खातून) का घर जलाने का प्रयास करते.

भाई चारे की मिसाल

मालेरकोटला पंजाब का एकमात्र मुस्लिम-बहुल इलाका है. यहां 60 फीसदी मुस्लिम आबादी रहती है. हिन्दू और सिख तो हैं ही, थोड़े बहुत जैन और ईसाई भी यहां हैं. 

मालेरकोटला हमेशा से साम्प्रदायिक सद्भावना का मिसाल रहा है. यह सद्भावना यहां लंबे समय से चली आ रही है. किंवदंती है कि इस कस्बे को गुरु गोविन्द सिंह का आशीर्वाद मिला हुआ है.

माना जाता है कि सरहिन्द के गवर्नर वजीर खान ने गुरुजी के पुत्रों को दीवार में चुनवाने का आदेश दिया था. मालेरकोटला के नवाब शेर मोहम्मद खान ने जब यह सुना तो बोले, यह तो इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है और वे विरोध पर उतर आए. गुरु गोविन्द सिंह को जब यह बात पता चली तो उन्होंने नवाब और इस शहर को अपना आशीर्वाद दिया.

1947 में बंटवारे के बाद जब पंजाब दंगे की चपेट में था तो मालरेकोटला इन दंगों की आंच से अछूता रहा था. आजादी के बाद भी यह शहर साम्प्रदाकि दंगों से मुक्त रहा है. यदा-कदा ही यहां तोडफ़ोड़ की घटनाएं हुईं हैं.

उदाहरण के लिए 1992 में बाबरी विध्वंस की घटना के बाद एक मंदिर और एक जैन हॉल पर हमला हुआ. अमेरिका में कुरान के साथ बेअदबी की घटना के प्रति उत्तर में 2013 में एक चर्च पर हमला हुआ था. पर समुदाय के नेताओं ने मिल-बैठकर इस तरह की हरकतों को फैलने से रोक दिया था.

राजनीतिक हलचल

कुरान की बेअदबी की घटना की शिकायत करने के लिए कुछ लोगों का समूह खातून के घर गया. जनसमूह हिंसक हो गया और भीड़ ने खातून के घर पर हमला कर दिया. 

अनेक लोगों का विश्वास है कि 24 जून की घटना को लेकर खातून के घर पर जो हमला किया गया, वह सत्तारुढ़ शिरोमणि अकाली दल के खिलाफ गुस्से का परिणाम था.

शिरोमणि अकाली दल के खिलाफ पूरे पंजाब में लोगों में काफी गुस्सा है और मालेरकोटला भी इससे अलग नहीं है. मालेरकोटला में कोई भी व्यक्ति से बाहर से नहीं आया. मुस्लिमों का गुस्सा तो केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के खिलाफ है.

आश्चर्यजनक तो यह है कि शहर की राजनीति पर दो पुलिस अफसर हावी हो गए हैं. एक तो पूर्व पुलिस महानिदेशक मोहम्मद इजहार आलम और दूसरे वर्तमान में पंजाब पुलिस में डीजीपी रैंक के अधिकारी मोहम्मद मुस्तफा.

आलम अकाली दल के साथ हैं और वे वर्तमान विधायक के पति हैं. एक प्रभावशाली लेकिन विवादित अधिकारी के रूप में वह चर्चित रहे हैं. खालिस्तान के लिए चल रहा आन्दोलन जब चरम पर था तो वे आलम सेना बनाने वाले व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हो गए थे. इस सेना में वे पुलिस कार्मी शामिल हो गए थे जो आलम के प्रति निष्ठावान थे और कुछ ऐसे पुलिसवाले थे फर्जी मुठभेड़ों के आरोपी थे.

चुनाव लड़ते समय उनकी पत्नी उनके (पति) नाम के इस्तेमाल से बचती रहीं. उन्होंने अपने विवाह के पूर्व नाम फरजाना नेसारा खातून नाम का इस्तेमाल किया बजाए फरजाना आलम के.

मोहम्मद मुस्तफा की पत्नी रजिया सुल्ताना ने 2002 और 2007 में कांग्रेस के टिकट पर यह सीट जीती थी लेकिन 2012 में वह खातून से हार गईं.

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आलम और सुल्ताना हिंसा के लिए एक-दूसरे पर आरोप मढ़ती हैं. लेकिन दोनों के समर्थक कुरान के साथ बेअदबी की घटना के बाद पंजाब पुलिस की कार्रवाई की तारीफ करते हैं.

इस बीच यहां आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता में भी इजाफा हो रहा है. 2014 के आम चुनावों में संगरूर लोकसभा क्षेत्र के मालेरकोटला के 52 फीसदी वोट आप के खाते में गए थे जबकि अकाली दल और कांग्रेस को क्रमश: 25 और 17 फीसदी ही वोट मिले थे. 

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आम आदमी पार्टी आश्वस्त है कि वह अगले साल होने जा रहे चुनावों में यह सीट जीत जाएगी. लेकिन हाल की हिंसा से वोटों के ध्रुवीकरण का डर व्याप्त हो गया है. मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण का फायदा कांग्रेस के हिस्से में और हिन्दू-सिख वोट अकाली-भाजपा के पक्ष में जा सकते हैं.

संगरूर से आप पार्टी के सांसद भगवंत मान 26 जून को मालेरकोटला में थे. उन्होंने साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने की जोरदार अपील तो की ही, साथ ही यह भी संकेत दिया कि इस हिंसा के पीछ राजनीतिक निहित हो सकते हैं. उन्होंने आकाली-भाजपा का नाम लिए बिना कहा कि वे हमारे भाई-चारे और एकता को तोड़ना चाहते हैं. कृपया ऐसा मत होने दीजिए.

उन्होंने कहा कि यहां गुरुदारा भी है और मस्जिद भी. यह मालेरकोटला सद्भाव की मिसाल है. मुस्लिम आबादी तक पहुंच बनाते हुए उन्होंने नरेन्द्र मोदी पर हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस ने कुछ नहीं किया लेकिन क्या वे (भाजपा) हमें बताएंगे कि क्या खाना चाहिए? क्या वे हमें बताएंगे कि हम गुलाम अली को सुनें या नहीं? हमें नुसरत फतह अली खान को सुनना चाहिए या नहीं?

First published: 30 June 2016, 16:38 IST
 
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