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कोहिनूर क्या लाएंगे, जो है उसी को बचाने में अक्षम है भारतीय कानून

सौरव दत्ता | Updated on: 23 April 2016, 12:25 IST

एक बार फिर 'कोहिनूर को वापस लाओ' का विवाद सुर्खियों में है. लेकिन भारत की ऐतिहासिक विरासत की उन हजारों वस्तुओं की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया, जिन्हें चुरा लिया गया, तस्करी कर विदेशों में भेज दिया गया और फिर आसमान छूते दामों पर बेच दिया गया.

भारत ऐतिहासिक कलाकृतियों की प्रचुरता के कारण इतिहास के लुटेरों और कला के विशाल नीलामीघरों विशेषकर क्रिस्टी और सदबी के लिए सदा से एक परिपक्व बाजार रहा है.

कोई भी ऐसी चीज जो 100 साल या इससे अधिक पुरानी हो तो वह 'पुरातात्विक' है

ऐसे हालात पैदा करने का श्रेय ऐतिहासिक कलाकृतियों का एकमात्र संरक्षक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के एंटीक्वटीज एंड आर्ट ट्रेजर्स एक्ट, 1972 को जाता है. यह कानून 1976 से लागू हुआ. इसका मकसद भारतीय सांस्कृतिक विरासत की बहुमूल्य वस्तुओं की लूट और उन्हें गैर-कानूनी माध्यमों से देश से बाहर भेजने पर रोक लगाना था.

हालांकि, इसके सिर्फ नकारात्मक और अनपेक्षित परिणामों का अतिरेक ही सामने आया. ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि यह कानून इतने कड़े और अभावग्रस्त नियमों से भरा हुआ है कि बेईमान 'कला के सौदागर' सरकारी अधिकारियों और कस्टम अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर अपना रास्ता निकाल ही लेते हैं.

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इसी बीच, जो लोग वास्तव में कला को संजोने और सहेजने के इच्छुक होते हैं, उनकी राह में बाधा डाली जाती है. देश में कलाकृतियों की कीमत धड़ाम से नीचे गिर जाती है, जबकि इसी दौरान विदेशों में तेजी से ऊपर जाती है.

अस्पष्ट परिभाषाएं और उनसे होने वाले नुकसान

अधिनियम के अनुच्छेद 2(1) (अ) के अनुसार कोई भी ऐसी चीज जो 'ऐतिहासिक महत्व' की हो या 100 साल या इससे अधिक पुरानी हो तो वह 'पुरातात्विक' है. और हर किसी को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पास ऐसी प्रत्येक वस्तु का पंजीकरण कराना और उसके चित्र खिंचवाना अनिवार्य होता है फिर भले ही चाहे वह कोई व्यक्ति हो, कोई संगठन हो या कोई संस्थान (उदाहरण के तौर पर कोई मंदिर).

अब, जब इतिहास इतनी विवादास्पद जागीर है, कोई एक निश्चित तरीके से किसी वस्तु का 'ऐतिहासिक महत्व' कैसे बता सकता है? हो सकता है किसी के पास 200 साल पुरानी पारिवारिक विरासत हो, लेकिन क्या जरूरी है कि वह 'ऐतिहासिक महत्व' की होगी? और मंदिरों में स्थापित प्रतिमाओं का क्या? दक्षिण भारत के मंदिरों में तो विभिन्न देवी-देवताओं की ऐसी प्रतिमाओं के पूरे ढेर लगे हैं, जो सदियों पुरानी हैं.

कानून और सरकारी उदासीनता ही यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि भारत की ऐतिहासिक धरोहर की लूट जारी रहे

ठीक यही बचाव का रास्ता है, जिसके सहारे सुभाष चंद्र कपूर ने इस अधिनियम का शोषण किया और लाखों रुपए कमा लिए. कपूर न्यूयॉर्क के उच्च स्तरीय इलाके मैनहैट्टन में 'आर्ट ऑफ द पास्ट' नाम की गैलरी के मालिक थे, जो अब बंद की जा चुकी है. कपूर ने सालों तक कला तस्करी का बड़ा रैकेट चलाया और अब चेन्नई की जेल में अपने दिन काट रहे हैं.

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कपूर अपने एजेंटों के जरिए मूर्तियों और अन्य कलाकृतियों को चुराता था, उन्हें गलत रास्ते से निर्यात करता था और फिर विदेशों में संग्रहालयों और नीलामी-घरों को बेच देता था.

कई बार तो उसने अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए संग्राहलयों को ऐसी वस्तुएं 'दान' भी की.

कपूर ने अपना यह 'बिजनेस' 1980 में शुरू कर दिया था और आखिरकार 2011 में पुलिस की गिरफ्त में आया. 2012 में उसे सजा भी सुना दी गई. लेकिन सवाल यह है कि आखिर वह इतने लंबे समय तक कैसे और क्यों बचा रहा?

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क्योंकि पुरातत्व कानून के तहत वस्तुओं काे 'दान' करना अपराध नहीं है. यह कानून सिर्फ उन कलाकृतियों के निपटारे के लिए बना है जो 'चुराई' गई हों और जिनके बारे में साबित हो गया हो कि वे चुराई गई हैं. इस कानून के अनुच्छेद 14 के अनुसार 'चोरी' का अपराध साबित करने के लिए आपराधिक कानून के सिद्धांत लागू करना अनिवार्य है. उन्हीं सिद्धांतों के आधार पर तय होता है कि क्या चुराया गया है और क्या नहीं. ऐसे में किसी भी एजेंसी के लिए इसे साबित करना कठिन कार्य हो जाता है.

दक्षिण भारत के मंदिरों में तो विभिन्न देवी-देवताओं की ऐसी प्रतिमाओं के पूरे ढेर लगे हैं, जो सदियों पुरानी हैं

वहीं, कानून का अनुच्छेद 11 पुरावशेषों और कलाकृतियों के आयात, निर्यात और देश के भीतर भी एक जगह से दूसरी जगह लाने-ले जाने को नियंत्रित करता है और किसी भी व्यक्ति के ऐसा करने पर प्रतिबंध लगाता है. ऐसा करने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार या उसकी किसी एजेंसी को होता है. यदि कोई व्यक्ति ऐसा करना चाहे तो उसे (यदि वस्तु काे देश के भीतर ही एक जगह से दूसरी जगह ले जाता है) इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति लेनी होगी. यदि उस वस्तु का आयात या निर्यात किया जाना है तो विदेश व्यापार के महानिदेशक एवं कस्टम विभाग से अनुमति लेनी होगी.

'कोहिनूर' मसले पर केंद्र सरकार का यू टर्न

इस नियम ने संपन्न अंडरग्राउंड रैकेट के लिए रास्ता खोल दिया और जो लोग वास्तव में इतिहास एवं कला में रुचि रखते हैं, उन्हें हतोत्साहित कर दिया.

सुधार की धीमी कोशिशें

पिछले साल सितंबर में केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने कानून मंत्रालय के एक सेवानिवृत्त सचिव को काम सौंपा कि वे इस कानून की सभी खामियों को दूर करने, सुधार के उपायाें और नए सिरे से कानून बनाने पर प्रस्ताव बनाएं.

हालांकि, सेवानिवृत्त न्यायाधीश मुकुल मुदगल समिति ने इस कानून में सुधार के लिए अपनी रिपोर्ट के रूप में 2012 में प्रस्तावित उपायों का जो चिट्ठा सौंपा था, वह धूल ही फांक रहा है.

इस प्रकार, यह विडंबना ही है कि एक कानून और सरकारी उदासीनता ही यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि भारत की ऐतिहासिक धरोहर की लूट जारी रहे.

First published: 23 April 2016, 12:25 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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