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नोटबंदी: गुजरात के कोऑपरेटिव बैंकों के जरिए भाजपा ने करोड़ों रुपया पुराने से नया किया

चारू कार्तिकेय | Updated on: 7 January 2017, 12:15 IST

अब यह साफ होता जा रहा है कि जब आम नागरिक नोटबंदी के कारण अपनी पसीने की कमाई पाने के लिए अंतहीन मुश्किलों का सामना कर रहे थे तब भाजपा ने सत्ता में होने का फायदा अपने पैसे को ठिकाने लगाने के लिए कई तरीके से उठाया. नोटबंदी के तुरंत बाद और अब तक इस तरह की कई खबरें आ चुकी हैं, जिनको देखते हुए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भाजपा ने सारे इंतजामों और जांच को धता बताते हुए अपने सैकड़ों करोड़ रुपये के पुराने नोटों को नई करेंसी में बदला है.

सबसे पहले रिपोर्ट आई कि भाजपा के नेताओं को नोटबंदी की जानकारी पहले से हो गई थी. इसके बाद कैच ने ही एक खबर का खुलासा किया कि भाजपा ने कई राज्यों में बड़ी मात्रा में जमीनें खरीदी हैं. अब इस बात के प्रमाण मिल रहे हैं कि भाजपा ने अपने नेताओं द्वारा चलाए जा रहे कोऑपरेटिव बैंकों का इस्तेमाल अपने पैसों को सुरक्षित जमा करवाने के लिए किया.

हिंदुस्तान टाइम्स अखबार द्वारा की गई एक जांच में यह पाया गया है कि पूरे देश के 285 जिला कोऑपरेटिव बैंकों में 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा के एक सप्ताह के अंदर ही उनकी नकद जमा में 6 गुना तक वृद्धि हुई थी.

भाजपा नेता संघानी के एजेएमएसबीएल बैंक की नकद जमा में 200 गुना के लगभग वृद्धि पांच दिन में दर्ज की गई

इन कोऑपरेटिव बैंकों में नकद जमा की इस अविश्वसनीय वृद्धि में सबसे अव्वल जो बैंक था उसका नाम है- अमरेली जिला मध्यस्थ सहकारी बैंक लिमिटेड (एजेएमएसबीएल). इस बैंक की नकद जमा में 200 गुना के लगभग वृद्धि इस अवधि में दर्ज की गई. यह बैंक गुजरात के एक कद्दावर भाजपा नेता दिलीपभाई संघानी का है.

संघानी गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित इस बैंक के चेयरमैन हैं. सिर्फ इतना ही नहीं, ये प्रदेश सरकार की कैबिनेट में मंत्री भी हैं.

संघानी के कोऑपरेटिव बैंक में सात नवंबर को 1.3 करोड़ की नकदी थी. लेकिन अगले चार दिन के अंदर ही यह जमा राशि लगभग 200 गुना बढ़कर 209.15 करोड़ हो गई. यह नकदी के विस्तार में असामान्य बात यह भी है कि पिछली पूरी तिमाही में बैंक में सबसे अधिक जमा राशि का स्तर कभी 6.2 करोड़ से अधिक नहीं गया है.

हिंदुस्तान टाइम्स को दिए अपने बयान में संघानी ने कहा है कि यह सारा पैसा असली ग्राहकों की जमा से आया है, लेकिन 200 गुना तक नकद जमा का बढ़ जाना निश्चित रूप से एक बेहद असामान्य बैंकिंग गतिविधि है. इस पूरे मसले पर संघानी को यह बताना चाहिए कि इतने कम समय में आखिर इतनी अधिक जमा कैसे बढ़ गई और जांच एजेंसियों को भी इसी मुद्दे पर पड़ताल करनी चाहिए.

बैंक का नाम बदला, पर कहानी वही

एक अन्य मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एक अन्य कोऑपरेटिव बैंक में नोटबंदी के सिर्फ तीन दिन के अंदर ही 600 करोड़ की नकदी जमा हुई. इस बैंक का नाम है अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक (एडीसी). टाइम्स ग्रुप के अखबार मुंबई मिरर के मुताबिक अहदाबाद स्थित इस बैंक के बोर्ड आॅफ डायरेक्टर्स में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह खुद शामिल हैं.

इस बैंक का भाजपा से संबंध सिर्फ इतना ही नहीं है. एडीसी बैंक के चेयरमैन हैं अजयभाई एच पटेल, जो कि प्रदेश में स्थित 17 कॉपरेटिव बैंकों की शीर्ष संस्था गुजरात स्टेट कॉपरेटिव बैंक के भी चेयरमैन हैं. अजयभाई पटेल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेहद करीबी माने जाते हैं.

पटेल ने 2009 में शीर्ष कोऑपरेटिव बैंक की कमान संभाली थी जबकि राज्य में अन्य भाजपा नेता भी इन बैंकों के प्रशासन में शामिल हुए थे. इन नेताओं में गुजरात सरकार में राज्य मंत्री शंकर चौधरी, जो कि एडीसी में वाइस चेयरमैन हैं. पोरबंदर से भाजपा सांसद विट्ठल भाई रादादिया, भरुच से भाजपा विधायक अरुण सिंह ए राना तथा खुद अमित शाह शामिल हैं.

पूरी चौकड़ी है ये

इनमें से कुछ लोग भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के खासम-खास माने जाते हैं और उनका नाम शाह के गुजरात के गृहमंत्री रहने के दौरान हुए विवादों में भी आ चुका है. एडीसी के चेयरमैन अजय पटेल का नाम तो सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर मामले में सीबीआई की चार्जशीट में भी आ चुका है. अजय पटेल के साथ एडीसी के निदेशक यशपाल चुडास्मा का नाम भी बतौर आरोपी सीबीआई की चार्जशीट में दर्ज हुआ था.

चुडास्मा, पटेल और शाह पर आरोप थे कि उन्होंने गवाहों को धमकाकर जांच को प्रभावित करने की कोशिश की. इस सारे गठजोड़ को देखते हुए गुजरात के कॉपरेटिव बैंक सेक्टर पर भाजपा का कब्जा साबित होने में और कोई गुंजाइश बाकी नहीं रह जाती है.

गुजरात के एक शीर्ष कांग्रेसी नेता ने कैच से बातचीत में बताया,  'भाजपा ने नोटबंदी के तुरंत बाद कोऑपरेटिव बैंकों पर अपनी पकड़ का इस्तेमाल कर अपने सारे काले-सफेद पैसे को कोऑपरेटिव बैकों में जमा करवाया. इसके लिए आधी-आधी रात को कोऑपरेटिव बैंको को खुलवा कर उनमें भाजपा के लोगों के पैसे जमा करवाए गए.'

कोऑपरेटिव बैंको के जरिए भाजपा के लोगों के पुराने नोटों को बदल कर नए नोट भी जारी हुए. अगर कांग्रेसी नेता की मानें तो आठ नवंबर को नोटबंदी की घोषणा के बाद से लेकर 14 नवंबर तक अहमदाबाद और गुजरात के दूसरे कोऑपरेटिव बैंकों में ओवरटाइम काम करके भाजपा के लोगों के पैसे जमा करवाए गए.

14 नवंबर का तिलिस्म

14 नवंबर की तारीख इस मामले में बहुत अहमियत रखती है. इसी दिन रिजर्व बैंक ने एक नए बदलाव की घोषणा करते हुए कहा कि उन्हें कोऑपरेटिव बैंकों के जरिए काले धन को सफेद करने की शिकायतें मिल रही है लिहाजा अब से कोऑपरेटिव बैंकों में नोटबंदी वाली करेंसी जमा नहीं होगी.

इससे कई बाते स्पष्ट होती हैं. एक तो गुजरात के कोऑपरेटिव बैंकों में सारा पैसा इन्हीं चार-पांच दिनों में जमा हुआ. साथ ही एक सवाल भी खड़ा होता है कि क्या गुजरात के कोऑपरेटिव बैंकों को पांच दिन का यह विंडो जानबूझकर सरकार ने दिया था जिसके सर्वेसर्वा भाजपा के नेता से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तक हैं?

अगर ऐसा हुआ है तो सवाल यह भी खड़ा होता है कि जांच एजेंसियों ने इतने पुख्ता और स्पष्ट सबूत होने के बाद भी अब तक इसकी जांच शुरू क्यों नहीं की? अगर जांच हुई है तो ऐसा क्यों कि इस मामले में कोई जानकारी मीडिया के सामने नहीं आई जैसा कि पूरे देश में डाले गए दूसरे छापों तथा गिरफ्तारियों के सिलसिले में हुआ. समय आ गया है कि जांच एजेंसियों को अथवा भाजपा को अब इन सवालों का जवाब देना चाहिए.

First published: 7 January 2017, 12:15 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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