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यूपी का मोर्चा संभालकर राहुल को करनी चाहिए कांग्रेस की 'सर्जरी'

मनोज पंत | Updated on: 27 May 2016, 8:23 IST
(कैच)
QUICK PILL
  • ताजा विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस अब केवल छह राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में ही सत्ता में बची है. जिनमें देश की करीब सात प्रतिशत आबादी रहती है.
  • राहुल को उत्तर प्रदेश के सीएम पद का उम्मीदवार बना कर कांग्रेस वापसी की दिशा में एक साहसिक लेकिन जरूरी कदम उठा सकती है.

पांच विधानसभा चुनावों के नतीजों से साफ है कि बीजेपी राष्ट्रीय राजनीति में पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुकी है.

पार्टी ने पहली बार पूर्वोत्तर में सरकार बनाई है, वहीं दक्षिण भारत में उसने कर्नाटक के बाद केरल में भी अपना खाता खोल लिया है. वहीं कांग्रेस पहले से ज्यादा सिकुड़ गई है. 

मणिशंकर अय्यर जैसे लोगों को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेसी नेता भी मान रहे हैं कि पार्टी 2014 के आम चुनाव से ही अभूतपूर्व गिरावट के दौर से गुजर रही है.

पढ़ें: पश्चिम बंगाल में कांग्रेस विधायकों ने खाई वफादारी की कसम

कांग्रेस का मानना है कि अभी भी उसकी पहुंच अखिल भारतीय है. हालांकि ताजा विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस अब केवल छह राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में ही सत्ता में बची है. जिनमें देश की करीब सात प्रतिशत आबादी रहती है.

कांग्रेस की मौजूदा हालात को देखते हुए पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता पहले ही 'बड़ी सर्जरी' की जरूरत बता चुके हैं.

भारत जैसे देश में केंद्र में मजबूत विपक्ष का होना लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है. 

चूंकि तीसरा मोर्चा बनाने का प्रयास देश में अब तक विफल रहा है इसलिए जरूरी है कि कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति में मजबूती से वापसी करे. लेकिन कैसे?

स्पष्ट जनादेश

2014 से लेकर अब तक जितने भी चुनाव हुए हैं जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया है. 

मतदाताओं ने ज्यादातर उन गठबंधनों को वोट दिया जिनका एक मजबूत आधार था. एनडीए में बीजेपी, बिहार में नीतीश-लालू, तमिलनाडु में एआईएडीएमके और डीएमके. मतदाताओं ने बाकी पार्टियों को नकार दिया. 

पढ़ें: कांग्रेस अब देश और सत्ता की स्वाभाविक पार्टी नहीं है

अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि मजबूत केंद्र के बिना कोई भी गठबंधन क्षणभंगुर होता है. 

यही वजह है कि पश्चिम बंगाल में वोटरों ने लेफ्ट और कांग्रेस को नकार दिया. मतदाताओं को इस बात का यकीन नहीं था कि ये गठबंधन पुराने लेफ्ट गठबंधन जितना स्थायी नहीं होगा.

इसी तरह असम में वोटरों ने बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ को नकार दिया. 

गठबंधन की मजबूत धुरी

साल 2014 के चुनाव से भ्रष्टाचार आज भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. कांग्रेस की आम चुनावों में हार में भ्रष्टाचार के आरोपों की बड़ी भूमिका रही थी. 

केरल में कांग्रेसनीत यूडीएफ की हार के पीछे भी भ्रष्टाचार एक अहम मुद्दा है. वरना सभी विकास सूचकांकों के सकारात्मक रहने के बावजूद पार्टी की हार को और किस तरह समझा जाए?

ध्यान देने की बात है कि कांग्रेस का वोट लेकर ही बीजेपी का वोट शेयर (अकेले 11% और गठबंधन को 15%) बढ़ा है. अगर बीजेपी का आधा भी वोट यूडीएफ को मिल जाता तो वो सत्ता में आ जाती.

क्षेत्रीय दलों का उभार

1991 में शुरू हुए आर्थिक सुधारों के साथ ही भारत में क्षेत्रीय पार्टियों का उभार तेज हुआ है. नौजवान मतदाता केंद्र के अनजान नेताओं की बजाय अपने करीबी नेताओं पर ज्यादा भरोसा दिखा रहे हैं. 

बिहार और दिल्ली चुनाव में बीजपी को मिली हार का एक प्रमुख कारण ये भी था कि पार्टी ने किसी स्थानीय क्षेत्रीय नेता नेता को अपना चेहरा नहीं बनाया. 

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वहीं असम और दूसरे क्षेत्रों में बीजेपी की सफलता में स्थानीय नेताओं की अहम भूमिका रही. 

14वें वित्त आयोग की रिपोर्ट भी दिखाती है कि राज्यों को ज्यादा फंड मिलने से उनकी आर्थिक स्वायत्तता बढ़ी है.

वोट ट्रांसफर

पिछले कुछ चुनावों के परिणाम से साफ है कि मजबूत क्षेत्रीय दल अपना वोट अपने साझीदार को दिलाने में कामयाब रहते हैं. 

बंगाल में कांग्रेस की मिली सफलता इसका अच्छा उदाहरण है, जहां पार्टी सबसे बड़ा विपक्षी दल बन गई है. बिहार में भी कांग्रेस की मिलीसफलता यही दर्शाती है.

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दूसरी तरफ राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस अपना वोट अपने साझीदार को दिलाने में अब तक विफल नजर आ रही है. मसलन, तमिलनाडु में वो डीएमके को अपने वोट दिलाने में नाकामयाब रही. 

हालिया चुनाव में डीएमके को एआईएडीएमके से केवल एक प्रतिशत कम वोट मिले. अगर कांग्रेस उसे अपने वोट दिलवा देती तो चुनाव परिणाम अलग हो सकते थे. कांग्रेस को भविष्य में इसका ध्यान रखना चाहिए.

आगे का रास्ता

कांग्रेसी को स्थानीय नेताओं को बढ़ावा देना होगा. 2013 में कर्नाटक में सिद्धारमैया को सीएम बनाकर इसकी शुरुआत कर भी चुकी है. 

उस समय दिल्ली में बैठे पार्टी के कई नेता खुद को सीएम पद का ज्यादा योग्य उम्मीदवार बता रहे थे लेकिन पार्टी ने उनकी नहीं सुनकर अच्छा किया.

उसी तरह असम में तरुण गोगोई पर, पंजाब में अमरिंदर सिंह पर और उत्तराखंड में हरीश रावत पर भरोसा करना समझदारी भरा फैसला रहा.

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असम में पार्टी को खराब आर्थिक स्थिति की वजह से हार मिली. कांग्रेस के 15 साल के शासन के बाद आज भी असम पूर्वोत्तर के सबसे गरीब राज्यों में एक है. 

जबकि 1990 के दशक की शुरुआत में असम पूर्वोत्तर के सबसे समृद्ध राज्यों में एक था.

स्थानीय नेता की जरूरत

आर्थिक मोर्च पर अच्छा प्रदर्शन करने वाले क्षेत्रीय नेता भविष्य में पीएम पद के उम्मीदवार हो सकते हैं

कांग्रेस को अब दूसरे राज्यों में भी स्वीकार्य स्थानीय नेताओं को आगे बढ़ाना चाहिए. मोदी के उभार से भी क्षेत्रीय नेताओं का महत्व समझा जा सकता है. 

दूसरे क्षेत्रीय नेताओं द्वारा पेश की जा रही दावेदारियों से भी साफ है कि आर्थिक मोर्च पर अच्छा प्रदर्शन करने वाले क्षेत्रीय नेता पीएम पद के उम्मीदवार हो सकते हैं.

कांग्रेस को लगता है कि गांधी परिवार पार्टी की एकता को थामे रखने वाला सूत्र है. अगर ऐसा है तो राहुल गांधी को पीएम उम्मीदवार बनने से पहले खुद को क्षेत्रीय नेता के रूप में साबित करना होगा.

राहुल को उत्तर प्रदेश के सीएम पद का उम्मीदवार बनाना इस दिशा में एक साहसिक लेकिन जरूरी कदम हो सकता है. 

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यूपी में कांग्रेस के पास कोई मजबूत स्थानीय नेता नहीं है, ऐसे में राहुल को किसी तरह के स्थानीय विरोध का भी सामना नहीं करना होगा.

मुलायम सिंह यादव और मायावती दोनों की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को देखते हुए उनका गठबंधन करना संभव नहीं दिखता. 

ऐसे में राहुल की सीएम उम्मीदवारी वो 'बड़ी सर्जरी' हो सकती है जिसकी जरूरत वरिष्ठ कांग्रेसी नेता बता रहे हैं.

पंजाब का प्रयोग

पंजाब में सत्ता विरोधी लहर के चलते कांग्रेस के पास जीत का अच्छा मौका है. हालांकि आम आदमी पार्टी उसका खेल बिगाड़ भी सकती है. 

लेकिन पंजाब में पार्टी अगर जीत भी जाती है तो इससे राहुल गांधी की राजनीतिक क्षमता पर उठे सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे. 

पार्टी को यूपी में राहुल को और दूसरे प्रदेशों में नए युवा नेताओं को आगे बढ़ाना ही होगा. 

एक सदी पुरानी कांग्रेस पार्टी ने कुछ बड़े फैसले नहीं लिए तो 2018 तक वो भारत के राजनीतिक नक्शे से पूरी तरह गायब हो सकती है. 

2019 के आम चुनाव का ये सोच कर इंतजार करते रहना कि एनडीए खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेगी, कांग्रेस के लिए घातक साबित हो सकता है.

First published: 27 May 2016, 8:23 IST
 
मनोज पंत @catchhindi

लेखक जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली स्थित अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं विकास केंद्र में प्रोफेसर हैं

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